भारत या पाकिस्तान... चीन को किसके नजदीक होना चाहिए? क्या सोचते हैं नागरिक, जानिए दिलचस्प जवाब
भारत और चीन के बीच के संबंध हालिया महीनों में काफी तनावपूर्ण रहे हैं और पश्चिमी देश एशिया में भारत को चीन का प्रमुख प्रतिद्वंदी मानते हैं, हालांकि भारत कई बार ऐसी सोच को नकार चुका है।

China India Relation: 1947 में मिली आजादी के बाद जब भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे और चीन की कमान माओत्से तुंग के हाथ में थी, उस वक्त दोनों देशों के बीच संबंध काफी मजबूत थे और 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे दिए गये थे। लेकिन, 1962 में भारत पर चीन का हमला हो गया और उसके बाद से दोनों देशों के बीच के संबंध कभी भी सामान्य नहीं रहे हैं। खासकर पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच का तनाव काफी बढ़ा ही है। हालात तो युद्ध की दहलीज तक पहुंच चुके हैं, लिहाजा ये जानना जरूरी हो जाता है, कि आखिर चीन के लोग भारत को लेकर क्या सोचते हैं? भारत को लेकर चीनी नागरिकों के मन में क्या रहता है? चीनी सोशल मीडिया पर भारत को लेकर क्या लिखा जाता है? बीजिंग में रहने वाले पत्रकार Mu Chunshan ने चीनी सोशल मीडिया और लोगों से बातचीत के आधार पर जानने की कोशिश की है, कि आखिर चीन के मन में भारत को लेकर क्या विचार हैं और उनकी रिपोर्ट को द डिप्लोमेट ने प्रकाशित की है। आइये जानते हैं।

भारत पर क्या सोच रखता है चीन?
Mu Chunshan ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, कि उनका चीनी सोशल मीडिया वीबो पर अकाउंट है, जहां वो विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर टिप्पणी करते रहते हैं, लिहाजा चीनी सोशल मीडिया के जरिए भारत को लेकर बनने वाले विचारों को समझने का एक मौका बनता है। उन्होंने लिखा है, कि हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप ने अनुमान लगाया है, कि चीन रूस को हथियार प्रदान करेगा, जिससे कई सामान्य चीनी लोगों में असंतोष पैदा हो गया है। लिहाजा, चीनी सोशल मीडिया पर इसकी काफी चर्चा हो रही है और दिलचस्प और अप्रत्याशित रूप से, कई चीनी नागरिक इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए अमेरिकी आरोपों का खंडन करने के लिए भारत का उदाहरण दे रहे हैं। चीन के कई नागरिकों का कहना है, कि "भारत और रूस के बीच एक उच्च-स्तरीय संबंध है, जिसे "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" कहा जाता है, और यह कि भारत और रूस के बीच चीन और रूस की तुलना में अधिक हथियार सौदे हुए हैं"। इसलिए, चीनी नागरिकों ने सवाल पूछा, कि आखिर संयुक्त राज्य अमेरिका को संदेह क्यों नहीं है, कि भारत, यूक्रेन युद्ध में रूस को हथियार प्रदान करेगा? चीनियों की नजर में, यह एक और सबूत है कि संयुक्त राज्य अमेरिका यूक्रेन युद्ध में चीन और भारत के लिए "दोहरा मानदंड" अपना रहा है।

'पश्चिम का पसंदीदा भारत, चीन है निशाना'
चीन के अंदर लोगों के बीच ये एक व्यापक धारणा बन गई है, कि भारत पश्चिमी देशों का पसंदीदा है, जबकि, चीन पश्चिम का लक्ष्य बन गया है। भारत ने इसे कैसे मैनेज किया? भारत के अंतर्राष्ट्रीय मित्रों का दायरा इतना बड़ा क्यों है? इसबात को लेकर भी चीनी सोशल मीडिया पर अकसर चर्चा होती रहती है। चीनी नागरिकों ने इन सवालों को लेकर तर्क दिया, कि "भारत की लोकप्रियता का एक कारण यह है, कि देश इतना मजबूत नहीं है, कि पश्चिमी प्रभुत्व के लिए खतरा पैदा कर सके"। इन नेटिज़ेंस की नजर में, अगर भारत एक दिन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाता है, और उसकी सैन्य ताकत का विकास जारी रहता है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका निश्चित रूप से भारत को दबा देगा, जैसा कि वह अब चीन के साथ कर रहा है।
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'भारत को अविकसित मानते हैं चीनी'
भारत के बारे में चीनी दृष्टिकोण का यह एक पहलू है, कि चीन में भारत को अविकसित राष्ट्र के रूप में देखा जाता है, और चीनियों का मानना है, कि इसलिए भारत, कई देशों के लिए चुनौती और खतरा नहीं है। चीनियों का मानना है, कि पश्चिम भारत को गंभीरता से नहीं लेता है, इसलिए नई दिल्ली वाशिंगटन और उसके सहयोगियों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों का आनंद ले सकती है। चीनियों के मुताबिक, पश्चिम के डरने के लिए चीन काफी मजबूत है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि पश्चिमी सरकारें चीन को उनसे आगे निकलने से रोकने की कोशिश करेंगी। भारत को अविकसित ठहराने के लिए चीनी सोशल मीडिया पर कई उदाहरण दिए जाते हैं। बहुत से चीनी लोग, भारत में बलात्कार के आंकड़ों का जिक्र करते हैं और कई नागरिक सोशल मीडिया पर लिखते हैं, कि कोविड-19 के इलाज के लिए भारतीय गोमूत्र का उपयोग करते हैं। वहीं, इस तरह के लेखों ने चीनी लोगों के बीच भारत के "पिछड़ेपन" की छाप को गहरा किया, और चीनी नागरिकों के अंदर उस विश्वास को बढ़ाया है, कि भारत अपनी बड़ी आबादी के अलावा सभी पहलुओं में चीन जितना अच्छा नहीं है। दूसरे शब्दों में, ज्यादातर चीनी लोग, भारत की तुलना में श्रेष्ठता और आत्मविश्वास की भावना महसूस करते हैं।

'भारत-चीन अभी भी बन सकते हैं दोस्त'
चीनी सोशल मीडिया पर हो रही बातचीत से एक बात का ये भी पता चलता है, कि चीन के लोग भारत और अमेरिका के बीच के करीबी संबंध को नापसंद करते हैं और चीनियों को ये भी लगता है, कि चीन और भारत अभी भी सहयोग कर सकते हैं। लेकिन, चीनियों का ये भी मानना है, कि भारत चीन को पार नहीं कर सकता है, इसलिए चीन के लिए चुनौती नियंत्रणीय है। जिस तरह कई चीनी लोग तर्क देते हैं, कि भारत संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि भारत खतरा बनने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं है। उनका मानना है, कि चीन और भारत समान तर्क का उपयोग करके आपसी सहयोग कर सकते हैं। पत्रकार Mu Chunshan ने लिखा है, कि उन्होंने पिछले हफ्ते चीन में जी20 देशों के मंत्रिस्तरीय बातचीत को लेकर वीबो पर एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोह के उस बयान का हवाला दिया था, जिसमें उन्होंने चीन, भारत और रूस संबंधों की प्रशंसा की थी। इस लेख पर चीन के कुछ नागरिकों का कहना था, कि "चीन, भारत और रूस के बीच सहयोग का मजबूत होना, पश्चिम के दबाव का सामना कर सकता है। आखिरकार, भारत पश्चिम पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता है।"

भारत या पाकिस्तान, किसके नजदीक हो चीन?
बीजिंग के पत्रकार Mu Chunshan ने लिखा है, कि उन्हें अभी भी लगता है, कि भारत और चीन आपसी सहयोग को मजबूत कर सकते हैं। उन्होंने लिखा है, कि "वास्तव में, मैंने 2014 में द डिप्लोमैट के लिए एक लेख लिखा था, जिसमें यह सवाल पूछा गया था, कि क्या चीन को भारत या पाकिस्तान के करीब होना चाहिए? उस समय मेरा जवाब था भारत। पिछले नौ वर्षों के तथ्यों ने साबित कर दिया है, कि चीन और भारत के बीच सहयोग की काफी गुंजाइश है। उदाहरण के लिए, भारत के साथ चीन का व्यापार प्रति वर्ष 115 अरब डॉलर का हो गया है, जबकि पाकिस्तान के साथ चीन का व्यापार महज 30 अरब डॉलर का ही है"। उन्होंने लिखा है, कि "बेशक चीन को पाकिस्तान को नहीं भूलना चाहिए, लेकिन कई चीनी नेटिज़ेंस दो दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बारे में यथार्थवादी दृष्टिकोण रखते हैं। तर्क बहुत गंभीर है, कि भारत को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान का उपयोग करने का विचार अब काफी अवास्तविक होता जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान और भारत के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है"। उन्होंने लिखा है, कि कुल मिलाकर, मेरी धारणा यह है, कि अधिकांश चीनी लोग भारतीय समाज से अपरिचित हैं, लेकिन वे जिज्ञासु हैं। उदाहरण के लिए, सामान्य चीनी भारतीय जाति व्यवस्था और इसकी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के बारे में उत्सुक हैं। चीनी सोशल मीडिया पर दोनों की खूब चर्चा हो रही है।

चीनी सोशल मीडिया पर पीएम मोदी का उपनाम
पत्रकार Mu Chunshan ने लिखा है, कि इन बातों के अलावा, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीनी इंटरनेट पर एक असामान्य उपनाम है, मोदी लाओक्सियन (莫迪老仙)। Laoxian उपनाम, कुछ अजीब क्षमताओं वाले बुजुर्ग के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस उपनाम का तात्पर्य है, कि चीनी नेटिज़ेंस सोचते हैं, कि पीएम मोदी दुनिया के अन्य नेताओं की तुलना में अलग और आश्चर्यजनक हैं। वे उनके पहनावे और शारीरिक रूप-रंग दोनों की ओर इशारा करते हैं, जिसे लाओक्सियन-जैसी और उनकी कुछ नीतियों के रूप में देखा जाता है, जो भारत की पिछली नीतियों से अलग हैं। उन्होंने लिखा है, की चीनी सोशल मीडिया पर लोग कहते हैं, कि "मोदी के नेतृत्व में भारत, दुनिया के प्रमुख देशों के बीच संतुलन बनाए रख सकता है। चाहे वह रूस हो, संयुक्त राज्य अमेरिका, या वैश्विक दक्षिण देश, भारत उन सभी के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का आनंद ले सकता है, जो कुछ चीनी नेटिज़न्स के लिए बहुत सराहनीय है। इसलिए "लाओक्सियन" शब्द मोदी के प्रति चीनी लोगों की जटिल भावना को दर्शाता है, जिसमें जिज्ञासा, विस्मय और शायद सनक का एक संयोजन है"।

सीमा विवाद पर क्या सोचते हैं चीनी नागरिक?
पत्रकार Mu Chunshan ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि "मैं लगभग 20 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में रिपोर्ट लिख रहा हूं और चीनी नेटिज़ेंस के लिए किसी विदेशी नेता को उपनाम देना एक दुर्लभ मामला है। मोदी का उपनाम अन्य सभी से ऊपर है। स्पष्ट रूप से उन्होंने चीनी जनता की राय पर अपना भारी प्रभाव डाला है"। उन्होंने लिखा है कि, "मेरा एक निष्कर्ष यह है, कि कुल मिलाकर चीनियों के मन में भारत के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है और विवाद की बस एक बात है, सीमा विवाद। एक बार जब सीमा विवाद का जिक्र आता है, तो अधिकांश चीनी नागरिक बहुत नाराज हो जाते हैं। धारणा यह है, कि भारत ने पश्चिम के समर्थन से चीन को घेर लिया है और उसी उद्देश्य से क्वाड में शामिल हो गया है"। चीनी पत्रकार का कहना है, कि "भारतीय मीडिया को चीन के संदर्भ में भारत का खुला पक्ष रखना चाहिए, ताकि चीन के नागरिक भारत को करीब से देख सकें, क्योंकि वो भारत के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं और अगर ऐसा किया जाता है, तो निश्चित तौर पर दोनों देशों के नागरिकों के मन में एक दूसरे के प्रति सार्थक विचार उत्पन्न होंगे"।












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