इस समुद्री देश में भारत उखाड़ रहा है चीन की जड़ें, जयशंकर की इस डिप्लोमेसी को देख करेंगे गर्व
India Vs China in Maldives: मई 2023 में, भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीनी प्रभाव का मुकाबला करने के लिए, मालदीव के साथ भारत के रक्षा सहयोग को और गहरा करने के लिए इस द्वीप देश की तीन दिनों की यात्रा की थी। भारत और मालदीव तब अपने रक्षा संबंधों को मजबूत कर रहे हैं, जब साल 1972 से ही मालवीद के चीन के साथ मधुर राजनयिक संबंध रहे हैं।
मौजूदा वक्त में कई ऐसे संकेत मिल रहे हैं, जिनसे पता चलता है, क एस. जयशंकर की डिप्लोमेसी की वजह से मालदीव में चीन के पैर उखड़ने लगे हैं और चीन चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है।

चीन के लिए कितना महत्व रखता है मालदीव
मालदीव के साथ मजबूत संबंध बनाकर चीन, हिन्द महासागर में अपनी समुद्री कम्युनिकेशन लाइन को मजबूत रख सकता है, हिंद महासागर में अपना दखल बढ़ा सकता है और हिंद महासागर में भारत की मौजूदगी को चुनौती दे सकता है।
मालदीव की पहले की सरकारों ने अकसर देश के विकास, खासकर आर्थिक क्षेत्र, पर्यटन, निवेश के लिए चीन की तरफ देखा है और भारत के मुकाबले, चीन की मदद को स्वीकार किया है। लेकिन, धीरे धीरे मालदीव की सरकारों को चीन की नियत में खोट आने लगा और चीन के साथ संबंधों में सीमा रेखा का निर्माण होने लगा। हालांकि, मालदीव ने फिर भी चीन को नाराज नहीं किया।
लेकिन, अब हालात बदल गये हैं।
मालदीव में इस साल सितंबर महीने में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं, ऐसे में चीन के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। सत्तारूढ़ मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) में फूट पड़ चुकी है, जबकि मालदीव का विपक्ष नेता विहीन हो चुका है। वहीं, भारत ने मुख्यधारा की पार्टियों के भीतर अपने संबंधों का विस्तार किया है, जिससे चुनाव से पहले ही चीन, इस द्वीप देश में अपनी राजनीतिक पूंजी को लुटता हुआ देख रहा है।
मालदीव के सत्तापक्ष के साथ साथ विपक्ष के भी कई बड़े नेता, खुलकर भारत के समर्थन में बयान दे रहे हैं।

मालदीव में बड़ी मेहनत से बनी थी चीन की पकड़
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मौमून गयूम (1978-2008) ने अपने शासनकाल में मालदीव-चीन संबंधों की नींव रखी थी और भारत समर्थक विदेश नीति बनाए रखने के बावजूद, वह 1984 में और फिर 2006 में चीन का दौरा करने वाले मालदीव के पहले राष्ट्रपति थे।
हालांकि, उनके शासनकाल के दौरान द्वीपसमूह में चीनी उपस्थिति और प्रभाव काफी हद तक सीमित था। दोनों देशों के संबंध तकनीकी और आर्थिक सहयोग, वीज़ा प्रावधानों और परियोजनाओं पर केंद्रित रहा।
उस दौरान बीजिंग ने आवास परियोजनाओं और सड़क परियोजनाओं में लगभग 46 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था, और दोनों देशों के बीच व्यापार भी 2018 तक सिर्फ 2.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था।
लेकिन, 2008 में जब पहली बार मालदीव में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव करवाए गये, तो एमडीपी के नेता मोहम्मद नशीद राष्ट्रपति चुने गये और उन्होंने चीन के साथ सहयोग करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति मौमून गयूम की खुलेआम आलोचना की।
मोहम्मद नशीद ने पहली बार मालदीव की विदेश नीति में 'इंडिया फर्स्ट' की नीति को रखा और कहा, कि मालदीव भारत के हितों की रक्षा और सम्मान करेगा।
मोहम्मद नशीद की इस नीति की वजह से दो घटनाएं हुईं।
एमडीपी और ताजा लोकतांत्रिक देश बने मालदीव ने भारत को अपने आदर्श के रूप में देखना शुरू कर दिया और और दूसरा, सुरक्षा, रक्षा, अर्थव्यवस्था और विकास के लिए अब मालदीव ने चीन की जगह भारत पर निर्भर होना शुरू कर दिया।
भारत सरकार ने भी मालदीव को गले लगाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मालदीव की एमडीपी सरकार ने अन्य देशों को भी मालदीव के बंदरगाहों और हवाई अड्डों जैसी रणनीतिक संपत्तियों में निवेश करने से रोक दिया। इतना ही नहीं, ये पहली बार था, जब मोहम्मद नशीद ने बीजिंग के साथ संबंधों को न्यूनतम रखा। हालांकि, इस दौरान चीन में माले में अपना दूतावास खोल लिया।
लेकिन, साल 2012 में मोहम्मद नशीद को घरेलू वजहों से अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और पहली बार मालदीव में चीन को बहुत बड़ी कामयाबी मिल गई।
साल 2012 से 2013 के दौरान मालदीव के राष्ट्रपति रहे मोहम्मद वहीद ने चीन से आवासीय परियोजनाओं के लिए 500 मिलियन डॉलर का ऋण ले लिया और चीन के लिए मालदीव में कदम जमाने के लिए ये ऋण काफी था।
वहीं, साल 2013 में मालदीव में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) की सरकार बनी और राष्ट्रपति बने अब्दुल्ला यामीन (2013 - 2018) और इस दौरान चीन ने मालदीव में अपनी जड़ें इतनी गहरी कर लीं, जिसे उखाड़ने में भारत को काफी पापड़ बेलनी पड़ी।
इसी समय मालदीव, चीन के बेल्ट रोड परियोजना में शामिल हो गया और उसके ऊपर चीन का कर्ज बढ़कर 3 अरब डॉलर का हो गया और ऋण की शर्तों के मुताबिक, चीन के नागरिक अब मालदीव में रहने लगे।
वहीं, अब्दुल्ला यामीन की सरकार के दौरान चीन और मालदीव ने मेगा-बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और निवेश के साथ साथ फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट पर भी हस्ताक्षर किए। वहीं, मालदीव ने पहली बार हिन्द महासागर में चीन को रिसर्च पोस्ट बनाने की इजाजत दे दी। ये भारत के लिए बहुत बड़ा झटका था।
अपने कार्यकाल के दौरान अब्दुल्ला यामीन ने खुले तौर पर भारतीय हितों और संवेदनाओं की कीमत पर चीनी उपस्थिति की वकालत की। मालदीव के भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक वापसी, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी और आपातकालीन घोषणा को चीन ने हवा दी और अब्दुल्ला यामीन ने इस दौरान चीन को काफी फायदा पहुंचाया।
दूसरी तरफ, अब्दुल्ला यामीन को जैसे जैसे चीन का समर्थन मिलता जा रहा था, उतने ही मजबूत संबंध विपक्षी पार्टी एमडीपी के भारत से मजबूत संबंध होते जा रहे थे।
और 2018 में मालदीव में सरकार पलट गई और एमडीपी सत्ता में आ गई और इसके साथ ही, मालदीव ने चीन के साथ फिर से संबंधों को तोड़ना शुरू कर दिया।
2018 में राष्ट्रपति बने इब्राहिम सोलिह ने ना सिर्फ फिर से "इंडिया फर्स्ट" की नीति रखी, बल्कि भारत को मालदीव में सामुदायिक विकास परियोजनाएं, इन्फ्रस्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स देने के साथ साथ भारत के साथ मजबूत डिफेंस एग्रीमेंट भी कर लिए।
हालांकि, इस दौरान एमडीपी ने चीन का विरोध भी नहीं किया। मालदीव की मौजूदा एमडीपी सरकार, भारतीय संवेदनाओं और चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, ऊर्जा क्षेत्र, अलवणीकरण संयंत्र, खेल, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं आदि जैसे मुद्दों पर बीजिंग के साथ सहयोग कर रही है।
लेकिन, अब बदल रहे हैं मालदीव के हालात
2018 से बढ़ती गुटबाजी ने सत्तारूढ़ एमडीपी को दो दलों में विभाजित कर दिया है। 2018 की शुरुआत में, सोलिह और नशीद के बीच संसदीय प्रणाली, नफरत फैलाने वाले हेट स्पीच और भ्रष्टाचार पर नकेल कसने और चुनावी वादों को पूरा करने में असमर्थता जैसे विभिन्न मुद्दों पर खींचतान हुई है।
नशीद ने राष्ट्रपति सोलिह के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया और अपने वफादारों के साथ नई पार्टी बना ली।
दूसरी तरफ, विपक्षी नेता और चीन समर्थक पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को भ्रष्टाचार के केस में जेल की सजा हो चुकी है और उनकी चीन समर्थक प्रगतिशील गठबंधन (पीपीएम और पीपुल्स नेशनल कांग्रेस) के अंदर भारी गुटबाजी बन गई है।
साल 2019 में यामीन को मनी लॉन्ड्रिंग के कई आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। थोड़े समय के लिए बरी होने के बाद, उन्हें दिसंबर 2022 में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया।
हालांकि, जेल जाने के बावजूद, यामीन अकेले ही पिछले चार सालों से विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं और पार्टी पर मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। नतीजतन, उनके वफादारों और वरिष्ठ नेताओं ने आगामी चुनावों के लिए उन पर दांव लगाना जारी रखा है।
हालांकि, पार्टी का दूसरा धड़ा चाहता है, कि पार्टी प्लान-बी पर काम करे और अब्दुल्ला यामीन अब जेल में ही रहें और इसी बात को लेकर पार्टी के अंदर का विभाजन और कड़वाहट बढ़ता जा रहा है।
यहां ध्यान देना जरूरी है, कि मालदीव में चीन को उखाड़ फेंकने के लिए भारत चीन वाली ही राजनीति कर रहा है और नेताओं को अपने पाले में करने के लिए अपनी तरह से कोशिशें कर रहा है।

तो चीन के लिए मुसीबतें क्या हैं?
मालदीव की राजनीति में हो रहे बदलाव, देश में चीन की पकड़ पर काफी असर डाल रहे हैं। सत्तारूढ़ दल में विभाजन ने भारत के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने वाली मुख्यधारा की पार्टियों की संख्या में वृद्धि की है और भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों की वकालत करने वाले नेताओं की संख्या में वृद्धि हुई है।
दोनों दलों के नेताओं ने चीन के मुकाबले भारतीय सुरक्षा और संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी है। अतीत में, उन्होंने भारतीय निवेश का बचाव किया है और 'इंडिया आउट' आंदोलन, जिसे चीन हवा दे रहा था, उसकी आलोचना की है, जिसे प्रोग्रेसिव अलायंस चला रहा था।
इस आंदोलन को मालदीव के साथ भारत के बढ़ते प्रभाव और रक्षा सहयोग के खिलाफ चीन अपना समर्थन दे रहा था।
लेकिन, भारतीय डिप्लोमेसी की सबसे खास बात, किसी देश के लोगों से संबंध जोड़ना होता है और मालदीव में भारत ने लोगों के साथ अपने संबंधों को जोड़ लिया। भारत ने मालदीव में स्थानीय लोगों के लिए कई विकास कार्यक्रम चलाए, जिसका मालदीव के लोगों को आर्थिक फायदा हुआ है। लिहाजा, मालदीव की प्रमुख पार्टियों के लिए भारत के समर्थन की बात करना अनिवार्य बन गया है।
दूसरी तरफ, मालदीव के लोग श्रीलंका और पाकिस्तान का हाल देखकर भी डर गये हैं और उन्हें भारत के साथ संबंध जोड़ना सुरक्षित लग रहा है, जबकि चीन को अब शक की निगाहों से देखा जा रहा है।
एमडीपी ने अपने घोषणा पत्र में कहा है, कि वो अगर जीतती है, कि भारतीय परियोजनाओं का मालदीव में विकास किया जाएगा। एमडीपी की चुनावी राजनीति मजबूत हो रही है और चीन अब मालदीव में बेचैन हो रहा है।
वहीं, डेमोक्रेट पार्टी, जिनके वैचारिक सिद्धांत एमडीपी से विकसित हुए हैं, उसने भविष्य में भी भारत का समर्थन करना जारी रखने की घोषणा की है।
पिछले कुछ वर्षों में, यामीन के लिए चीन के समर्थन और उसकी अलोकतांत्रिक कार्रवाई के प्रति उसकी अनदेखी ने, पूर्व स्पीकर नशीद को चीन का एक मजबूत आलोचक बना दिया है। उन्होंने अक्सर चीन पर ऋण जाल में फंसाने और गैर-लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, निवेश और ऋण देने को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
वह विपक्ष के 'इंडिया आउट' अभियान को अतार्किक बताते हुए उसकी आलोचना करते रहते हैं और लगातार भारत के साथ मजबूत रिश्ते पर जोर देते रहे हैं।
दूसरी तरफ, चीन समर्थक प्रगतिशील गठबंधन के नेतृत्व संकट और गुटबाजी ने चीन को और नुकसान में डाल दिया है।
यामीन की गैर-मौजूदगी से विपक्षी गठबंधन के पास एक मजबूत नेता की कमी है और इसके और अधिक टूटने का खतरा है। लिहाजा, उनकी कोशिश नशीद की डेमोक्रेट पार्टी से गठबंधन करने की है, लेकिन नशीद की पहली शर्त ये है, कि उन्हें 'इंडिया ऑउट' कैम्पेन छोड़ना पड़ेगा। लिहाजा चीन को फिलहाल चैन नहीं आने वाली है और भारत, इस साल होने वाले चुनाव से पहले अपनी राजनीति को और तेजी से बढ़ा रहा है, ताकि मालदीव की धरती से चीन को जड़ से उखाड़ फेंका जा सके।












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