क्यों अफगानिस्तान में तालिबान का कहर नहीं रूक पा रहा?
नई दिल्ली। अमेरिका की सेना ने 9/11 हादसे के बाद 2001 में आतंकवादियों का सफाया करने के नाम से अफगानिस्तान में प्रवेश किया। अफगान जमीन पर अमेरिकी घुसपैठ के बाद यह मुल्क और ज्यादा बर्बाद और अस्थिर हो गया। अफगानिस्तान में करीब 18 सालों से अमेरिकी सेना है, लेकिन शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो जहां तालिबान का वर्चस्व नहीं है। अफगानिस्तान में अमेरिका के लिए उनके इतिहास की अब तक की सबसे लंबी लड़ाई साबित हो रही है, जहां संघर्ष दिन-ब-दिन खतरनाक होता जा रहा है। पिछले कुछ महीनों की घटनाओं पर नजर डालने से पता चलता है कि अफगानिस्तान में तालिबान के हमले अधिक बड़े, ज्यादा घातक और व्यापक स्तर पर बढ़े हैं।

बड़े प्रांतों पर तालिबान का कब्जा
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लेकर जलालाबाद, कांधार और हैरात प्रांतों में तालिबान ने अपना कब्जा जमाया हुआ है। कुछ सालों पहले हेलमंड (दक्षिण में स्थित अफगानिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत) और हैरात में अमेरिका, ब्रिटेन समेत और अन्य विदेशी सैनिकों का कब्जा था, लेकिन अब तालिबान ने इन सभी का अब यहां से सफाया कर दिया है। पिछले कुछ सालों में इन दोनों प्रांतों से अमेरिकी और दूसरे देशों के सैकड़ों सैनिकों की मौत हुई है और अब यह पूरी तरह से तालिबान के कंट्रोल में है। यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में 10,000 लोग मारे गए, लेकिन 2018 में मौत का आंकड़ा और भी ज्यादा भयानक होने वाला है। पिछले एक दशक में अफगानिस्तान में हर साल हमलों और मौत की संख्या लगातार बढ़ी है।

ट्रंप की नीतियां नाकाम
डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद अफगानिस्तान में तालिबान और ज्यादा खतरनाक और बर्बर हुआ है। अमेरिकी के राष्ट्रपति ट्रंप की पॉलिसी 'फाइट टू विन' के बाद तालिबान ने खतरनाक कहर बरपाया। अफगानिस्तान में ट्रंप की पॉलिसी मैक्सिमम मिलिट्री प्रेशर, तालिबान के फाइनेंशियल सोर्स पर अटैक, धार्मिक संगठनों से बातचीत और पाकिस्तान पर दबाव बनाने जैसी तमामों कोशिशों के बाद भी कोई समाधान नहीं निकल पाया है। यहां तक कि हालात अब और ज्यादा बदतर हो गए हैं। अमेरिकी सेनाओं ने तालिबान के कई ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं, जिसमें कई आतंकी समेत इनके कमांडरों की मौत हुई है। लेकिन, तालिबान फिर से जमीनों पर हथियाने में सफल रहा है।

तालिबान क्यों लड़ाई नहीं छोड़ रहे?
इस्लामिक विद्वानों ने इंडोनेशिया और सऊदी अरब समेत कई मुस्लिम देशों बैठकें की हैं, जहां अफगानिस्तान में हिंसा की निंदा करते हुए तालिबान को अफगान सरकार के साथ शांति वार्ता में प्रवेश करने के लिए कहा गया। लेकिन, तालिबान ने स्पष्ट किया है कि उनकी लड़ाई अमेरिका से है। तालिबान ने अमेरिका के युद्ध को न्यायसंगत बनाने के लिए अपने आप को 'अमेरिकी प्रक्रिया' का हिस्सा माना है। हाल ही में रूस में अफगानिस्तान में शांति वार्ता पर बात करने के लिए तालिबान राजी हो गया था, लेकिन अचानक मास्को ने मीटिंग को कैंसिल कर दिया।

किस ओर जा रहा अफगान वॉर?
दोनों ही पक्ष (तालिबान-सुरक्षाबल) अभी तक किसी भी सेटलमेंट तक नहीं पहुंच पाए हैं। प्रत्येक पक्ष अपने प्रभाव को बढ़ाने और ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों पर कब्जा करने में लगे हैं। 2001 से अमेरिकी रणनीति की प्रभावशीलता और नीति स्पष्टता की कमी के बारे में कई बार सवाल खड़े हुए हैं। इस दौरान हजारों तालिबान लड़ाकों की हत्या या प्रांतों पर कब्जा करना चलता आ रहा है, लेकिन विद्रोही कमजोर साबित नहीं हुए हैं। बीबीसी के अनुसार, एक दशक पहले अमेरिका और अफगान सरकारों ने अनुमान लगाया था कि अफगानिस्तान में लगभग 15,000 विद्रोहियों थे। आज, अफगानिस्तान में इनकी संख्या 60,000 से अधिक है। तालिबान ने पिछले कुछ महीनों में चुन-चुन कर सुरक्षाबलों को मौत के घाट उतारा है। वहीं, रोज मर रहे नागिरकों की मौत का अनुमान लगाना भी मुश्किल हो रहा है। यह गौर करने वाली बात है कि जब भी अमेरिका ने पाकिस्तान, ईरान और रूस से रिश्तें बिगाड़े हैं, तब उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव सीधा अफगानिस्तान पर पड़ा है। अफगान सरकार का आरोप है कि तालिबान को रूस, ईरान और पाकिस्तान जैसे देशों से हथियारों की सप्लाई हीती हैं। वही, अब अफगानिस्तान में आईएस (इस्लामिक स्टेट) ने भी दस्तक दे दी है।












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