HIV और कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहा था ये शख्स, ऐसे हुआ इलाज और बच गई जान, डॉक्टर भी हुए हैरान
यूरोप में एचआईवी और ब्लड कैंसर दोनों से ही पीड़ित एक व्यक्ति के पूरी तरह से ठीक होने का मामला सामने आया है। रक्त कैंसर के इलाज के लिए स्टेम सेल प्रत्यारोपण करने के बाद लगभग दो वर्षों से यह शख्स एचआईवी संक्रमण से मुक्ति की स्थिति में है।
एचआईवी संक्रमण से मुक्ति के कुछ मामले इससे पहले भी मिल चुके हैं मगर ये पहला ऐसा मामला है जिसमें एक ही व्यक्ति 2 खतरनाक बीमारियों से ग्रसित था।

जर्मनी निवासी 54 वर्षीय मार्क फ्रैंके ने कहा कि उन्हें सबसे पहले 2008 में एचआईवी का पता चला। एंटीरीट्रोवायरल थेरेपी यानी एआरटी के बाद उनकी सेहत में सुधार हुआ।
3 साल बाद मार्क एक बार फिर से बीमार पड़ गए। जांच करने के बाद पता चला कि वे ल्यूकेमिया से पीड़ित हैं। इसके बाद उनका इलाज कीमोथेरेपी से होने लगा। इससे उन्हें कुछ आराम तो मिला लेकिन सिर्फ एक साल बाद अगस्त 2012 में वह फिर से बीमार हो गए।
फ्रैंक के शरीर में ल्यूकेमिया तेजी से फैल रहा था। स्थिति तो इतनी बिगड़ गई कि फ्रैंक के पास इलाज के लिए कुछ ही ऑप्शन बाकी थे। इन्हीं में से एक विकल्प स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का था। हालांकि इसे एक खतरनाक विकल्प माना जाता है।
विकल्प स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह ल्यूकेमिया जैसे घातक किस्म के कैंसर, के मरीजों को ही दी जाती है, जिनपर कीमोथेरेपी का असर नहीं होता है। फ्रैंके इलाज के इस प्रयोग के लिए तैयार हो गए।
इसके बाद CCR5-डेल्टा म्यूटेशन वाले एक व्यक्ति की तलाश शुरू हुई। CCR5-डेल्टा म्यूटेशन वाले व्यक्ति की तलाश इसलिए क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ये लोग एचआईवी के प्रति इम्यून होते हैं क्योंकि वायरस को शरीर में रहने के लिए CCR5 रिसेप्टर से जुड़ना पड़ता है। रिसेप्टर के बिना वायरस जीवित नहीं रह सकता।
जल्दी ही म्यूटेशन वाले एक व्यक्ति का पता चल गया। अंजा प्राउज नाम की एक डोनर मिलीं जो कि जर्मन के उत्तरी इलाके राइन वेस्टफेलिया से थीं। प्राउज के बोन मेरो का उपयोग कर फरवरी 2013 में प्रत्यारोपण शुरू हुआ। इस घटना के एक दशक बीत चुके हैं और फ्रैंके पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
देवघर एम्स में कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉक्टर गौरव का कहना है कि भले ही ऐसे शख्स का इलाज सफल हुआ है, लेकिन ये एक जोखिम वाली प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप कई मामलों में मरीज की मौत हो जाती है।
डॉ गौरव का कहना है कि कैंसर के मामले में स्टेम सेल पर दुनिया के बड़े देशों में बहुत काम चल रहा है। भारत में भी रिसर्च सेंटरों में इस पर काम चल रहा है। अस्पतालों में इसे आना अभी बाकी है। उसके बाद इस पर विस्तार से कुछ कहा जा सकेगा।
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