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Gaza मामले पर आखिर क्यों झुके Netanyahu? ट्रंप नहीं इन 5 घरेलू मजबूरियां ने तोड़ी जिद

Gaza ceasefire Trump Peace Proposal: वर्षों से जारी गाजा संघर्ष में इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का अचानक नरम पड़ना अब वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है। हमास का अंत करने और गाजा पर पूर्ण कब्जे की कसम खा चुके नेतन्याहू के 'सरेंडर' पर मुहर तब लगी, जब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 20-सूत्रीय शांति प्रस्ताव का समर्थन किया।

इस प्लान का मुख्य उद्देश्य तत्काल युद्धविराम और सभी बंधकों की रिहाई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का दबाव अंतिम कारण नहीं है; बल्कि घरेलू प्रदर्शन, ICC में गिरफ्तारी की धमकी, और इजरायल का वैश्विक अलगाव जैसी 5 गंभीर मजबूरियाँ पहले ही उन्हें बैकफुट पर ला चुकी थीं, जिसके बाद उन्होंने इस बड़े समझौते पर सहमति दी।

Gaza ceasefire Trump Peace Proposal

बंधकों के परिवारों का रिकॉर्ड-तोड़ घरेलू आक्रोश

नेतन्याहू पर सबसे भावनात्मक और शक्तिशाली दबाव बंधकों के परिवारों की तरफ से आया। अगस्त 2025 में यह विरोध चरम पर पहुंच गया। 18 अगस्त को तेल अवीव में 400,000 से अधिक लोगों का सड़कों पर उतरना, युद्ध शुरू होने के बाद सबसे बड़ा प्रदर्शन था। इन प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा, 'जीवन बदले से पहले आता है।' नेतन्याहू की सत्ता की लालसा के सामने जब बंधकों के जीवन का मुद्दा आया, तो जनता के इस विशाल आक्रोश ने उन्हें फौरन युद्धविराम पर विचार करने के लिए विवश कर दिया।

रिजर्व सैनिकों का विद्रोह

इजरायल के भीतर ही सेना के रिजर्विस्टों (रिजर्व सैनिकों) ने सेवा देने से इनकार करना शुरू कर दिया। यह किसी भी इजरायली प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ा अपमान है। 28 अगस्त को आयोजित 'डे ऑफ डिसरप्शन' में हाईवे जाम किए गए, जिसने नेतन्याहू को स्पष्ट संकेत दिया कि युद्ध को लंबा खींचने की उनकी रणनीति को अब सैन्य वर्ग का भी समर्थन नहीं रहा। पूर्व पीएम एहुद ओल्मर्ट जैसे दिग्गजों ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि, 'युद्ध खत्म करना ही बंधकों को बचाएगा।'

वैश्विक नरसंहार का आरोप

नेतन्याहू और अन्य शीर्ष इजरायली अधिकारियों पर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) में युद्ध अपराधों के तहत गिरफ्तारी वारंट जारी होने का खतरा बढ़ गया है। यह कानूनी खतरा उनके विदेशी दौरों और वैश्विक छवि के लिए एक बड़ा संकट बन गया था। लंदन, न्यूयॉर्क और पेरिस में भी इजरायली हमलों को 'जेनोसाइड' कहा गया। यूएन के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने गाजा में भुखमरी को 'शुद्ध और सरल' बताया। इस कानूनी और नैतिक संकट ने नेतन्याहू को झुकने के लिए मजबूर किया।

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यूरोपीय संघ की आर्थिक धमकी और कूटनीतिक अलगाव

अमेरिका भले ही इजरायल का मुख्य सहयोगी हो, लेकिन यूरोप ने अपना रुख बदल लिया। यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 10 सितंबर को इजरायल को द्विपक्षीय सहायता रोकने की कड़ी चेतावनी दी। ब्रिटेन, फ्रांस और चीन जैसे देशों ने भी यूएन में इजरायली योजनाओं को 'अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन' बताया। जब आर्थिक सहायता पर तलवार लटकी और इजरायल कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने लगा, तब नेतन्याहू के पास वैश्विक आलोचना को 'झूठों का अभियान' कहकर टालने का विकल्प नहीं बचा।

युद्ध को लंबा खींचने की राजनीतिक मजबूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू युद्ध को जानबूझकर लंबा खींच रहे थे ताकि उनकी चरमपंथी गठबंधन सरकार बची रहे और वह सत्ता में बने रहें। पूर्व खुफिया अधिकारी माइकल मिल्स्टीन ने कहा, नेतन्याहू अपनी कोलिशन बचाने के लिए चरमपंथियों के आगे झुक रहे हैं। लेकिन जनता की घटती लोकप्रियता और विपक्ष के नेता यैर गोलन के हमलों ने उन्हें अहसास करा दिया कि इस रणनीति का अंत उनकी राजनीतिक हार होगी। ट्रंप के प्रस्ताव को स्वीकार करके उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे, आंतरिक और बाह्य दबाव कम किया और अपनी सत्ता को बचाने के लिए एक 'अंतर्राष्ट्रीय समर्थन' हासिल किया।

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