चीन के शेयर बाज़ारों में मंदी का डर क्या भारत के लिए खुशख़बरी है?
चीन की सरकार, चीन की बड़ी कंपनियों, वहां के शेयर बाज़ार और दुनिया भर के निवेशकों के बीच तनातनी चल रही है या शतरंज की बाज़ी, कहना मुश्किल है.
अगर आपने चाइनीज़ चेकर्स खेला है तो समझिए वैसा ही कुछ चल रहा है, कब कौन किस तरफ़ से, किसके ऊपर से चाल चल देगा पता नहीं.
एक तरफ़ चीनी सरकार अपनी कंपनियों को टाइट कर रही है. राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने पिछले हफ़्ते कहा कि सरकार को कंपनियों को रास्ता दिखाना चाहिए कि वो कम्युनिस्ट पार्टी की आज्ञा का पालन करें.
उधर, सरकार ने टेक्नोलॉजी कंपनियों में आपसी मुक़ाबले के लिए कड़े नियम लागू कर दिए हैं. एक बड़ी प्रॉपर्टी कंपनी के अफ़सरों को बुलाकर कंपनी का भारी क़र्ज़ घटाने के लिए चेताया है और ख़बरें हैं कि जल्दी ही शराब कंपनियों की भी बारी आनेवाली है.
इससे पहले स्टील, ई कॉमर्स और शिक्षा या ऑनलाइन एजुकेशन के काम में लगी कंपनियों पर कोड़ा फटकारा जा चुका है.
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निवेशकों के मन में चिंता
हालात का अंदाज़ा इससे लगाइए कि टेक्नॉलॉजी कंपनियों को क़ाबू में रखने के इरादे से सरकार ने बच्चों के लिए निर्देश जारी कर दिया है कि वे हफ़्ते में सिर्फ़ तीन दिन यानी शुक्र, शनि और रविवार को एक घंटे ही वीडियो गेम खेल सकते हैं.
इन तमाम ख़बरों का ही असर है कि निवेशकों के मन में चिंता बढ़ रही है और ख़ासकर विदेशी निवेशक चीनी बाज़ार में जमकर बिकवाली कर रहे हैं.
हालांकि गुरुवार को सरकार ने एक नया शेयर बाज़ार खोलने का एलान कर दिया और जिन 66 कंपनियों के शेयर इस एक्सचेंज में कारोबार के लिए शामिल किए जाएँगे उनमें अचानक सोमवार को उछाल भी दिखा है.
लेकिन इससे मंदी की आशंका ख़त्म होनी मुश्किल है क्योंकि यह छोटी और मझोली कंपनियां हैं जबकि इससे पहले जिन कंपनियों में तेज़ गिरावट आई वो देश की ही नहीं दुनिया की जानी मानी कंपनियां हैं और इस वक़्त उनके शेयर कई सालों में सबसे नीचे के स्तर पर पहुँच गए हैं.
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चीन के लिए बड़ा संकट
चीन में आर्थिक विकास की तेज़ रफ़्तार कई सालों से दुनिया को चौंकाती रही है. अमीरों की गिनती करनेवाली हुरुन रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल चीन में अरबपतियों की गिनती 1058 थी जबकि अमेरिका में सिर्फ़ 696.
यहां अरबपति का मतलब कम से कम एक अरब डॉलर की संपत्ति रखनेवाले लोग हैं.
विश्व बैंक ने भी माना है कि 1978 से अब तक चीन ने अस्सी करोड़ लोगों को ग़रीबी के चंगुल से बाहर निकाला है और अब देश की आधी आबादी मिडिल क्लास या मध्य वर्ग में शामिल है.
लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि अभी उस देश में साठ करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीब हैं या वो महीने में क़रीब डेढ़ सौ डॉलर से कम पर ही गुज़ारा करते हैं.
ग़रीब अमीर की खाई चीन के लिए बड़ा संकट बन चुकी है और यह बढ़ भी रही है. अब सरकार जो कर रही है या जो इरादा ज़ाहिर कर रही है उसमें ग़रीबों की मदद के लिए अमीरों की दौलत पर उसकी नज़र साफ़ दिख रही है.
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बड़े बदलाव की योजना
जानकारों का कहना है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग देश में एक बड़े बदलाव की योजना बना रहे हैं जिसमें अमीरों से दौलत लेकर उसे देश के सभी लोगों में ज़्यादा बराबरी से बांटने का मक़सद है.
इरादा तो अच्छा है लेकिन अमीरों की नींद उड़ाने के साथ साथ इसने विदेशी निवेशकों का चैन भी हराम कर दिया है. हालांकि चीन की कुछ बड़ी कंपनियों ने तुरंत आगे आकर सरकार की इच्छा को मूर्त रूप देना शुरू भी कर दिया है.
टेन्सेंट ने ग़रीबी हटाने या समृद्धि को बराबरी से बांटने की सरकार की योजना के लिए पंद्रह अरब डॉलर का योगदान देने का एलान कर दिया और उसके बाद अलीबाबा से भी इतनी ही रक़म देने का एलान आया है.
मरता क्या न करता, जिन्हें चीन में धंधा करना है उनके लिए तो अब यही रास्ता बाक़ी है. ख़ुद नहीं देंगे तो शायद सरकार और ज़्यादा ले लेगी. लेकिन विदेशी निवेशकों के लिए तो भागने का रास्ता खुला है. और वो भी पता नहीं कब तक खुला रहेगा? इस डर से निवेशक और तेज़ी से भागते हैं. चीन के बाज़ार पर नज़र रखनेवालों का कहना है कि वहां भगदड़ ही मची हुई है. किसी एक ने शेयर बेचे तो देखादेखी बिकवालों की लाइन लग जाती है.
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शेयरों में भारी गिरावट
कुछ बड़े शेयरों में तो तीस से चालीस परसेंट तक की गिरावट देखी जा रही है. सवाल है कि अगर चीन के बाज़ार से बड़ी रक़म निकलेगी तो क्या वो भारत आ सकती है?
यह सवाल इसलिए भी पूछा जा रहा है क्योंकि भारत और चीन के बाज़ार आम तौर पर उलटी दिशा में चलते हैं जबकि एशिया के बाक़ी कई बाज़ार चीन से कुछ ऐसे जुड़े हुए हैं कि उनकी चाल एक सी ही रहती है.
इस वक़्त भी जहां चीन के शेयर बाज़ार में मंदी का डर दिख रहा है वहीं भारत में बाज़ार आसमान छूने की कोशिश में दिख रहा है.
अंतरराष्ट्रीय निवेश के जानकारों का कहना है कि इसी वजह से चीन से घबराहट में निकलनेवाले पैसे के लिए भारत एक बहुत अच्छा विकल्प बनता है क्योंकि फ़ंड मैनेजरों को यह डर नहीं सताता है कि अगर चीन का बाज़ार गिरा तो भारत का भी गिरेगा.
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चीन के बाज़ार में शेयरों की क़ीमत
बस एक ही दिक़्क़त है. क़रीब-क़रीब महीने भर की बिकवाली के बाद चीन के बाज़ार में शेयरों की क़ीमत काफ़ी आकर्षक हो चुकी है.
पीई यानी कंपनी की कमाई और शेयर के भाव का अनुपात अब वहां काफ़ी कम है, जबकि भारत में यह ऐतिहासिक ऊंचाई पर है.
अब भी बहुत सी विदेशी ब्रोकरेज चीन पर दांव लगाने से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं. लेकिन जिन तर्कों के सहारे वो चीन में पैसा लगा सकती हैं, भारत पर दांव लगाने के लिए उससे ठीक उल्टे तर्क काम आते हैं.
ऐसे में भारत और चीन दोनों एक दूसरे के सामने एकदम विपरीत परिस्थितियों में फ़ायदा देनेवाले मौक़े दिखा रहे हैं. तो चीन का नुक़सान सीधे भारत का फ़ायदा न भी बने तब भी भारत में विदेशी निवेश कम होने के आसार फ़िलहाल तो नहीं दिख रहे हैं.
यह लगातार तीसरा ऐसा साल हो सकता है जब विदेशी निवेशक बाज़ार से पैसा निकालने के बजाय और पैसा लगाकर जाएंगे, और अगर चीन जानेवाली रक़म का कुछ हिस्सा भी भारत की ओर आ जाता है तो यह मामूली बात नहीं होगी.
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