Explained: भारतवंशी नेताओं पर दांव, हिंदू वोट बैंक पर नजर! US Election में भारतीयों का भाव कैसे बढ़ गया है?

India's Impact in US Election: डोनाल्ड ट्रंप ने 5 नवंबर को होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए जब जेडी वेंस को अपना उपराष्ट्रपति उम्मीदवार चुना, तो कई दक्षिण एशियाई, खासकर भारत के लोग काफी खुश हो गये। इसलिए नहीं, कि 39 साल के ओहियो सीनेटर जेडी वेंस, दक्षिण एशियाई समुदाय के प्रति ज्यादा लगाव दिखाते हैं, बल्कि इसलिए, कि वेंस की पत्नी 38 साल की उषा, भारतीय अप्रवासियों की बेटी हैं।

और यह सिर्फ उषा वेंस की बात नहीं है। बल्कि, इस चुनाव में दक्षिण एशियाई मूल के तीन राजनेता व्हाइट हाउस के लिए प्रतिस्पर्धा करते देखे गए हैं। और अभी जब चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ लिया है, तो दोनों ही पार्टियों ने भारतीय नेताओं की फौज उतार दी है, ताकि ताकतवर भारतीय मूल के लोगों को अपने साथ किया जा सके।

indian voters in us election

डोनाल्ड ट्रंप का जेडी वेंस को चुनने के फैसला के पीछे भी एक गणित ये था, क्योंकि जेडी वेंस अपने साथ कंजर्वेटिव वोट लाएंगे और उनकी पत्नी भारतीय वोट। और जब रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन में ऊषा को बोलने का मौका मिला, तो उन्होंने कई बार भारत का जिक्र किया और हर किसी को कहानी सुनाई, कि उनसे शादी करने के लिए जेडी वेंस ने कैसे उनकी भारतीय मां को भारतीय खाना अपने हाथों से बनाकर खिलाया।

जाहिर है, ऊषा वोटों के लिए अपने भारतीय संबंध से लोगों को परिचित करवा रही हैं।

ऊषा के अलावा दक्षिण कैरोलिना की पूर्व गवर्नर निक्की हेली और मशहूर कारोबारी विवेक रामास्वामी, इन दोनों ने रिपब्लिकन प्राइमरी के दौरान राष्ट्रपति चुनाव का टिकट हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा की थी, जबकि उपराष्ट्रपति कमला हैरिस, राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ दूसरे कार्यकाल के लिए रेस में शामिल हो चुकी हैं और ये सभी नाम भारतीय हैं।

जब यह घोषणा की गई कि जेडी वेंस ट्रंप के रनिंग मेट (उप-राष्ट्रपति) होंगे, तो हर जगह यह बताया गया, कि कैसे उषा के हिंदू धर्म ने वेंस को अपनी आध्यात्मिक और प्रोफेशनल यात्रा में मदद की। अमेरिकी मीडिया में बार बार लिखा गया, कि ऊषा की वजह से जेडी वेंस पर काफी प्रभाव पड़ा और जेडी वेंस हिंदू धर्म की आध्यात्म को आत्मसात करते हैं और पत्नी ऊषा को अपना 'गुरु' मानते हैं।

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रिपब्लिकन हिंदू गठबंधन के संस्थापक, रिपब्लिकन नेशनल कमेटी के हिंदू और भारतीय गठबंधन के अध्यक्ष शलभ "शाली" कुमार ने CNN से कहा, कि "हिंदुओं ने एक लंबा सफर तय किया है। और अब हिंदुओं का समय आ गया है।"

चूंकि उषा वेंस अब चुनावी रेस में शामिल हो गई हैं, तो आइए इस बात पर एक नजर डालते हैं, कि पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी राजनीति में दक्षिण एशियाई, खासकर भारतीय लोगों का वर्चस्व कैसे बढ़ा है और अमेरिका की राजनीति में अब भारत-भारत का चर्चा हर जगह कैसे होने लगा है।

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भारतवंशी नेताओं से सजी अमेरिका की चुनावी राजनीति

2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दक्षिण एशियाई समुदाय का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व देखने को मिला है। प्राइमरी के दौरान, ट्रम्प को दक्षिण एशियाई समुदाय की तिकड़ी से प्रतिस्पर्धा करना पड़ा। सबसे पहले निक्की हेली, दक्षिण कैरोलिना की पूर्व गवर्नर और संयुक्त राष्ट्र में ट्रम्प की पहली राजदूत थीं। भारतीय प्रवासियों की 51 साल की बेटी ने दूसरे नंबर पर आने के बाद रेस से बाहर आने की घोषणा कर दी। और उन्होंने मंगलवार रात रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन के दूसरे दिन औपचारिक रूप से ट्रम्प का समर्थन कर दिया।

वहीं, कारोबारी विवेक रामास्वामी ने भी फरवरी में बाहरी व्यक्ति के रूप में अमेरिकी रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद की रेस में प्रवेश किया था और उन्होंने अपने लिए भारी समर्थन जुटाया। हालांकि, जनवरी में आयोवा कॉकस में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उन्होंने अपना कैम्पेन खत्म कर दिया। लेकिन, एक्सपर्ट्स के मुताबिक, उनकी नजर अगले राष्ट्रपति चुनाव पर है और इस बार उन्होंने नाम बनाने के लिए जोर-आजमाइश की थी।

माना जा रहा है, कि अगले राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी में मुख्य मुकाबला विवेक रामास्वामी और निक्की हेली के बीच होगा।

इन दोनों के अलावा हर्षवर्धन सिंह नाम के एक इंजीनियर भी थे, जो "अपने देश को वापस लेने और नागरिकों को प्राथमिकता देने" के लिए भीड़ भरे अमेरिकी राष्ट्रपति पद की रेस में शामिल हुए थे।

लेकिन, सबसे बड़ा सरप्राइज का अभी आना बाकी है।

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कमला हैरिस चौंकाएंगी?

जो बाइडेन 82 साल उम्र होने और यादाश्त की समस्या की वजह से लगातार अपनी दावेदारी वापस लेने का दवाब झेल रहे हैं और अब जाकर उन्होंने अपने जिद्दी बयानों में थोड़ी नरमी दिखाई है। जो बाइडेन, जो अब तक कहते आ रहे थे, कि भगवान भी आकर कहें, तभी उम्मीदवारी वापस लेंगे, अब उन्होंने कहा है, कि अगर डॉक्टर उन्हें अक्षम बताते हैं, तो वो रेस से पीछे हट सकते हैं।

और अगर बाइडेन रेस से बाहर निकलते हैं, तो फिर कमला हैरिस ही एकमात्र डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बच जाएंगी और अगले महीने होने वाले डेमोक्रेटिक कन्वेंशन में कमला हैरिस को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

कमला हैरिस की मां चेन्नई की रहने वाली थीं और अमेरिका जाकर बस गईं थीं। कमला हैरिस ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में अपनी भारतीयता को काफी भुनाया था और भारतीय मूल के लोगों के बीच कमला हैरिस की वजह से जो बाइडेन को भारी समर्थन मिला था और उसे देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने जेडी वेंस को अपना उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया है, ताकि उनकी पत्नी भारतीय वोटों को रिपल्बिकन पार्टी की तरफ मोड़ सकें।

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अमेरिका की राजनीति में भारतीयों का कितना वर्चस्व?

2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति कैम्पेन में दक्षिण एशियाई लोगों के प्रतिनिधित्व के अलावा, अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व भी तेजी से बढ़ा है। 2013 में, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (अमेरिकी संसद) में एक भी भारतीय-अमेरिकी सदस्य नहीं था। और राज्य विधानसभाओं में 10 से भी कम भारतीय-अमेरिकियों को चुना गया था। कोई भी सीनेट के लिए नहीं चुना गया था। कोई भी राष्ट्रपति पद के लिए नहीं लड़ा था।

लेकिन, 2023 में यह संख्या काफी बढ़ गई है। फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एशियाई अमेरिकी, अमेरिकी संसद में एक प्रतिशत से ज्यादा हो गये हैं। कैलिफोर्निया के सांसद और डेमोक्रेटिक नेता एमी बेरा - जिन्हें अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में सेवा देने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी होने का गौरव प्राप्त है, उन्होंने कहा, कि "चीजें काफी बदल गई हैं।"

भारतीय-अमेरिकी वकालत समूह इम्पैक्ट के कार्यकारी निदेशक नील मखीजा ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया, कि "सरकार के कुछ हिस्सों में, हम सचमुच बिना किसी के होने से लेकर समानता के करीब पहुंच गए हैं।"

लेकिन इस उछाल के कारण क्या है?

ज्यादातर लोग इसके लिए कई फैक्टर्स को जिम्मेदार मानते हैं, जिनमें उनकी संपत्ति और उच्च शिक्षा का स्तर शामिल है। इम्पैक्ट के सह-संस्थापक और कंसास के पूर्व राज्य विधायक राज गोयल ने कहा, कि "यह वास्तव में सभी फैक्टर मिलकर काम कर रहा है। यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति भी है, भारतीय समाज अमेरिका में ज्यादा स्वीकार्य है, और इसे संभव बनाने के लिए जानबूझकर राजनीतिक रणनीति बनाई गई है।"

इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट के कार्यकारी निदेशक चिंतन पटेल ने एशियाई अमेरिकियों के प्रतिनिधित्व की प्रशंसा करते हुए सीएनएन को बताया, कि इससे "हमारे समुदाय के लिए क्या संभव है, इसकी पुनः कल्पना करने में मदद मिलती है।"

अमेरिका में कितना बड़ा वोट बैंक बन रहे भारतवंशी?

भारतीय-अमेरिकी भी अमेरिका में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मतदाता समूह बन गये हैं। प्यू रिसर्च सेंटर के विश्लेषण में कहा गया है, कि दक्षिम एशियाई, संयुक्त राज्य अमेरिका में मतदाताओं का सबसे तेजी से बढ़ने वाला नस्लीय या जातीय समूह हैं। शोध से पता चलता है, कि पिछले चार वर्षों में उनकी संख्या में 15 प्रतिशत यानि करीब 20 लाख मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। जबकि इसके बाद हिस्पैनिक मतदाताओं की संख्या थी, जिनका प्रतिशत 12 था।

भारतीय-अमेरिकी गुट की प्रासंगिकता 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में स्पष्ट रूप से दिखाई दी थी। मतदान के बाद यह पता चला था, कि 72 प्रतिशत एशियाई मतदाताओं ने डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन को वोट दिया था।

इस चुनाव में भारतवंशी किसे कर सकते हैं वोट?

अभी तक के रूझानों से पता चलता है, कि इस चुनाव में कई एशियाई-अमेरिकियों ने अपना समर्थन डोनाल्ड ट्रंप को दे दिया है। पिछले बुधवार को जारी एशियाई अमेरिकी मतदाता सर्वेक्षण (AAVS) से पता चला है, कि नवंबर 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में 46 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी बाइडेन को वोट देना चाहेंगे, जबकि 2020 में यह संख्या 65 प्रतिशत थी।

हालांकि, पूर्व राष्ट्रपति और रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप को सिर्फ दो प्रतिशत का फायदा हुआ है। 2020 में 28 प्रतिशत से 2024 में 30 प्रतिशत, बावजूद इसके कि भारतीय अमेरिकियों में बाइडेन के समर्थन में रिकॉर्ड 19 प्रतिशत की गिरावट आई है।

भारतवंशियों के लिए मुख्य मुद्दे क्या-क्या हैं?

वे कौन से मुद्दे हैं जिनके बारे में भारतीय-अमेरिकी मतदाता सबसे ज़्यादा चिंतित हैं? दक्षिण एशियाई-अमेरिकी मतदाता सर्वेक्षण के मुताबिक, इस चुनाव चक्र में एशियाई अमेरिकियों के लिए अर्थव्यवस्था, शिक्षा, मुद्रास्फीति और आव्रजन "अत्यधिक महत्वपूर्ण" मुद्दे हैं। कई भारतीय-रिपब्लिकन मतदाताओं के लिए आव्रजन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि लाखों हिंदू और भारतीय अमेरिकी ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं।

इसके अलावा, बाइडेन प्रशासन ने जिस तरह से अपने कार्यकाल के आखिरी साल में भारत विरोधी खालिस्तान को मौन समर्थन दिया है और खालिस्तान के नाम पर भारत सरकार से रार ठाना है, उसने भी भारतीय-अमेरिकियों को नाराज किया है और इस चुनाव में इसका भी असर दिखेगा। कनाडा में खालिस्तान समर्थक ज्यादा हैं, जिससे जस्टिन ड्रूडो को फायदा हो जाता है, लेकिन अमेरिका में हिंदू मतदाता ज्यादा हैं और प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय-अमेरिकियों को फिर से भारत से कनेक्ट किया है और इसी वजह से भारतीयों के बीच बाइडेन का वोट बैंक 19 प्रतिशत गिर गया है।

हालांकि यह देखना बाकी है कि दक्षिण एशियाई समूह इस चुनाव में किस तरह से मतदान करता है, लेकिन जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल अमेरिकी कांग्रेस को दिए अपने संबोधन में कहा था, कि "मुझे बताया गया है कि समोसा कॉकस अब सदन का स्वाद बन गया है। मुझे उम्मीद है, कि यह बढ़ेगा और भारतीय व्यंजनों की पूरी विविधता यहां लाएगा।" तो इस बार के चुनाव में या रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति बने या डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति बने, उनकी जीत का एक मजबूत स्तंभ भारतवंशी वोटर्स बनने जा रहे हैं।

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