एक्सक्लूसिवः एक अफसोस लेकर पद से विदा होंगी अंगेला मैर्केल
वॉशिंगटन, 08 नवंबर। अंगेला मैर्केल जा रही हैं. चांसलर पद पर उनके आखिरी दिन चल रहे हैं. 16 साल लंबे अपने कार्यकाल के बारे में जब डॉयचे वेले के समाचार प्रमुख माक्स हॉफमन से उन्होंने बर्लिन के चांसलर कार्यालय में बातचीत की तो एक तनाव मुक्त मुस्कुराहट लगातार उनके चेहरे पर बनी रही. इस बातचीत में उन्होंने अपनी दो सबसे बड़ी चुनौतियों, निराशाओं और अपने संभावित उत्तराधिकारी ओलाफ शॉल्त्स के बारे में विस्तार से चर्चा की.

अक्टूबर में यूरोपीय संघ के नेताओं की अपनी आखिरी बैठक में मैर्केल पर आरोप लगा कि वह 'समझौते करने वाली मशीन' हैं. मैर्केल कहती हैं, "बेशक मैं मशीन नहीं हूं, लेकिन इंसान तो हूं."
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में नीतिनिर्माण को लेकर अपने रवैये के बारे में वह कहती हैं, "ऐसी बातचीत में मैं हमेशा खुले दिमाग से शामिल होती हूं." मैर्केल ने यह भी बताया कि ऐसे नेताओं से बात करते वक्त वह क्या सोचती हैं, जिनके मूल्य उनसे अलग हैं. वह कहती हैं, "मैं यह जरूर कहना चाहूंगी कि अगर कोई दुनिया को आपसे एकदम भिन्न तरीके से देखता है तो भी आपको उसकी बात सुननी चाहिए. अगर हम एक दूसरे को सुनेंगे ही नहीं तो हम कभी हल भी नहीं खोज पाएंगे."
मिसाल बने जर्मनी
बातचीत के दौरान कार्यवाहक चांसलर ने उन बातों पर जोर दिया जिन्हें लेकर उन्हें गर्व है, जैसे कि अपने सहयोगियों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखना या फिर जर्मनी में कोयले की विदाई की शुरुआत करना. लेकिन वह उन मुद्दों पर बात करने से भी नहीं झिझकीं, जो उन्हें लगता है कि अलग तरह से हो सकती थीं.
पर्यावरण के लिए उठाए गए कदमों पर मैर्केल ने कहा, "अन्य देशों से तुलना की जाए तो हम जर्मनी में ठीकठाक कर रहे हैं लेकिन हम ओद्यौगिकीकरण के अगुआ देशों में से हैं और यह जर्मनी की जिम्मेदारी है कि नई तकनीक व वैज्ञानिक सूझबूझ के साथ उदाहरण बनकर नेतृत्व करे."
वैसे मैर्केल ने यह भी कहा कि जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था ऐसी है कि नेता को नया कानून लाने से पहले आम सहमति बनानी पड़ती है. वह कहती हैं, "हमें अपने फैसलों के लिए हमेशा बहुमत की जरूरत होती है. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर मैं पर्यावरण कार्यकर्ताओं के साथ बार-बार बात करती हूं. वे कहते हैं कि ऐसा तो आपको अभी करना होगा. और मैं कहती हूं कि मुझे बहुमत तो जुटाना ही होगा. समाज की बहुत सारी अपेक्षाए हैं, बहुत सारे भय हैं. मैं इसके लिए प्रतिबद्ध रही, फिर भी मैं आज ऐसा नहीं कह सकती कि नतीजे संतोषजनक रहे."
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ग्लासगो के जलवायु सम्मेलन के बारे में वह कहती हैं कि वहां बहुत से नतीजे हासिल किए गए हैं लेकिन युवाओं के नजरिए से देखा जाए तो प्रक्रिया बहुत धीमी है.
अफगानिस्तान पर निराशा
अंगेला मैर्केल को लगता है कि अफगानिस्तान में नतीजा अलग रहता तो अच्छा होता. वह कहती हैं, "बेशक, हम इस बात को लेकर बेहद निराश हैं कि जो हम हासिल करना चाहते थे वो नहीं कर पाए. खास तौर पर अपने पैरों पर खड़ा हो सकने वाली एक राजनीतिक व्यवस्था, एक ऐसी व्यवस्था जिसमें लड़कियां स्कूल जा सकें, महिलाएं अपनी इच्छाएं पूरी कर सकें और शांति स्थायी तौर पर बनी रहे."
अफगानिस्तान पर बात करते वक्त वह कुछ देर के लिए गंभीर हो जाती हैं. वह कहती हैं, "बातचीत के दौरान अक्सर मैं पूछती हूं कि क्यों इतने सारे अफगान लड़के यहां आना चाहते हैं जबकि हमारे सैनिक वहां तैनात हैं. फिर भी, हमें यह तो स्वीकार करना ही होगा कि सदिच्छाओं के बावजूद हम वैसी व्यवस्था नहीं बना पाए जैसी हम वहां देखना चाहते थे. इसका इल्जाम अकेले जर्मनी के सिर पर नहीं है. अफगान भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए. बस यह बहुत अफसोस की बात है."
सबसे ज्यादा मुश्किल वक्त
नेता के तौर पर वे दो सबसे बड़े मरहले क्या रहे, जब उन्हें सबसे ज्यादा संघर्ष करना पड़ा? इस सवाल पर मैर्केल कहती हैं, "दो बड़ी घटनाएं जो निजी तौर पर मुझे बहुत चुनौतीपूर्ण लगीं, वे थीं (2015 में) बड़ी तादाद में यहां शरणार्थियों का आना जिसे मैं संकट कहना पसंद नहीं करती क्योंकि लोग तो लोग होते हैं. एक तो दबाव था कि सीरिया और उसके पड़ोसी देशों से बड़ी संख्या में लोग भाग रहे थे. और अब यह कोविड-19 महामारी. शायद ये वे दो संकट थे जब मैंने देखा कि लोग कैसे एकदम सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे थे, जिंदगियां मुश्किल में थीं. मेरे लिए ये सबसे बड़ी चुनौतियां थीं."
चांसलर कहती हैं कि यूरोपीय संघ को अभी भी माइग्रेशन और शरणार्थियों के बारे में एक साझा व्यवस्था बनाने की जरूरत है. उन्हें लगता है कि जहां से शरणार्थी आते हैं और जहां सबसे पहले पहुंचते हैं, इन देशों के बीच एक स्वतः संभावित संतुलन बनाने की जरूरत है ताकि शरणार्थियों को मदद भी मिले और लोगों के भागने की वजह भी दूर की जा सकें.
2015 में जब शरणार्थी जर्मनी पहुंच रहे थे तो अंगेला मैर्केल का एक बयान बहुत चर्चित रहा था. उन्होंने कहा था, "हम यह कर सकते हैं." आज मैर्केल मानती हैं कि सब वैसा नहीं रहा जैसा होना चाहिए था. हालांकि जर्मनी ने जितनी बड़ी तादाद में शरणार्थियों पनाह दी, उसे मैर्केल एक बड़ी सफलता मानती हैं. उनमें से बहुत से शरणार्थी अब देश में स्थायी तौर पर रहते और काम करते हैं.
वह कहती हैं, "हां ये हमने कर तो दिया. लेकिन यहां हम से अर्थ उन जर्मनों से है जिन्होंने ऐसा करने में मदद की. बहुत से मेयर, बहुत से स्वयंसेवक और वे लोग जो आज भी मदद कर रहे हैं जैसे कि उन लोगों के नए दोस्त, पड़ोसी और सहकर्मी."
उत्तराधिकारी पर भरोसा
अपने उत्तराधिकारी का जिक्र आने पर अंगेला मैर्केल के चेहरे पर एक खास तरह की मुस्कुराहट उभरती है. शॉल्त्स को वह अपने साथ जी20 की बैठक में रोम भी ले गई थीं. हालांकि वह कहती हैं कि ऐसा करने में उनके बड़प्पन जैसी बात नहीं थी क्योंकि वित्त मंत्री होने के नाते शॉल्त्स को यूं भी बैठक में होना ही था. लेकिन यह भी सच है कि मैर्केल शॉल्त्स को बंद दरवाजों के पीछे होने वालीं कई बैठकों में लेकर गईं, जो सद्भावना का एक प्रतीक था.
शॉल्त्स और मैर्केल अलग-अलग राजनीतिक दलों से आते हैं. शॉल्त्स वामपंथी झुकाव वाली सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी से हैं, लेकिन मैर्केल को अपने उत्तराधिकारी पर पूरा भरोसा है. वह कहती हैं, "मुझे लगा कि ओलाफ शॉल्त्स का द्विपक्षीय चर्चाओं का हिस्सा होना एक जरूरी संकेत था. इस तरह मैं कह सकती थी कि वहां जो शख्स बैठा है, अगली बैठक में जर्मन सरकार के मुखिया के रूप में संभवतया आप उससे बात करेंगे. मुझे लगा ये जरूरी था."
वह कहती हैं कि यह संकेत देना भी जरूरी था कि जर्मनी के मौजूदा और भावी चांसलर के बीच अच्छे रिश्ते हैं. उन्होंने कहा, "डगमगाती दुनिया में यह संकेत भरोसा जगाता है. मुझे लगा कि ऐसा करना सही था."
आखिर में चांसलर से पूछा गया कि 16 साल बाद चांसलरी में किसी और को देखना कैसा होगा, तो उनके चेहरे पर वही तनावमुक्त मुस्कुराहट लौट आई. उन्होंने कहा, "आपको इसकी आदत हो जाएगी."
Source: DW
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