OBOR के जरिए दुनिया का बादशाह बनने को बेताब चीन, यूरोपियन देशों में फैला डर

जेनेवा। चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग का प्रोजेक्‍ट वन बेल्‍ट वन रोड (ओबीओआर) ने अब यूरोप के कई देशों को चिंताएं बढ़ा दी हैं। यूरोप के कई देशों की मानें तो यूरोपियन मार्केट पर चीन ने अपने कब्‍जे के लिए दरअसल एक छिपे हुए एजेंडे को ही आगे बढ़ाया है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्‍स स्थित साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम की ओर से यह बात यूनाइटेड नेशंस के यूएन ह्यूमन राइट्स काउंसिल (यूएनएचआरसी) के 39वें सेशन के दौरान कही गई। फोरम ने चीन के ओबीओर प्रोजेक्‍ट के साथ ही उसके वर्चस्‍व पर भी चिंता जताई। बहस में शामिल पैनेलिस्‍ट की मानें तो चीन की कर्ज जाल में फंसाने की नीति यूरोप के बाजारों को प्रभावित करने वाली है।

दुनिया पर कब्‍जा चाहता है चीन

दुनिया पर कब्‍जा चाहता है चीन

फोरम के रिसर्च डायरेक्‍टर सिएग‍फ्राइड ओ वोल्‍फ कहते हैं, 'चीन दरअसल दुनिया पर अपना कब्‍जा करना चाहता है। वे ग्‍लोबल लीडर बनना चाहते हैं। यूरोप के लिए यह समस्‍या है क्‍योंकि चीन हमें बाजार से बाहर करना चाहता है। उदाहरण के लिए सेंट्रल एशिया-अगर चीन हमें नए इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट्स के लिए फंड देता है तो उनका प्रभाव भी काफी होगा।' उन्‍होंने आगे कहा कि अगर चीन कोई रेल ट्रैक यहां पर बिछाता है तो जर्मनी या फ्रांस के प्रोजेक्‍ट्स ही नहीं होंगे। सिर्फ चीन की ही ट्रेन उन ट्रैक्‍स पर दौड़ेंगी। वोल्‍फ के मुताबिक इसी तरह से टेली-कम्‍युनिकेशन है, जिस पर ज्‍यादा बहस ही नहीं की गई है। डिजिटल रूट वह रास्‍ता है जिसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। चीन सैटेलाइट्स को लॉन्‍च करने के लिए फाइबर ऑप्टिक केबल्‍स बिछा रहा है और अपना खुद का जीपीएस भी ला रहा है। यह चीन को वित्‍तीय हितों के अलावा अतिरिक्‍त निर्भरता प्रदान करेगा।

जिनपिंग का प्रोजेक्‍ट कोई नियम नहीं मानता

जिनपिंग का प्रोजेक्‍ट कोई नियम नहीं मानता

ओबीओआर चीन के राष्‍ट्रपति जिनपिंग का प्रोजेक्‍ट है और इसे पुराने समय में प्रयोग होने वाली सिल्‍क रोड का जवाब माना जा रहा है। इसमें कई इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉरीडोर हैं जो करीब 60 देशों से होकर गुजरते हैं। इन देशों में एशिया और यूरोप के कई देश शामिल हैं। चीन ने इन प्रोजेक्‍ट्स के दौरान सामाजिक, मानवाधिकार और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने में असफल रहा है। यूरोप के कई विशेषज्ञों का मानना है कि ओबीओआर का मकसद चीन के प्रभुत्‍व को दुनिया पर कायम करना है। यूरोपियन संसद की पूर्व सदस्‍य और साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के एग्जिक्‍यूटिव डायरेक्‍टर पाउलो कास्‍का के मुताबिक यूरोप के कई देशों को अब चीन की कर्ज नीति समझ आ गई है। चीन ने पहले ही श्रीलंका से उनका एक बंदरगाह हासिल कर लिया है क्‍योंकि श्रीलंका कर्ज नहीं चुका पाया। पाउला के मुताबिक साउथ चाइना सी पर चीन अंतरराष्‍ट्रीय कानून को नहीं मानता है।

खुद की ताकत साबित करने की कोशिश

खुद की ताकत साबित करने की कोशिश

ओबीओर, जिनपिंग का वह प्‍लान है जिसके जरिए वह चीन के सपने को पूरा करना चाहते हैं और साल 2050 तक चीन को ग्‍लोबल पावर के तौर पर देखना चाहते हैं। चीन ने अपनी कर्ज नीत को साउथ एशिया पर थोंप दिया है। यूरोप को चीन की कई नीतियों पर खासी चिंता है। हंगरी के पूर्व विदेश मंत्री इस्‍तवान सेजेंट इवानाई के मुताबिक यूरो‍पियन देशों का मानना है कि चीन बहुत ही शांतिपूर्ण देश और कभी भी पर्यावरण के लिए खतरा नहीं बना है। लेकिन अब चीन की विदेश नीति में परिवर्तन आया है जोकि वाकई दुर्भाग्‍यपूर्ण है। उन्‍होंने कहा कि ओबीओआर एक बड़ा संकेत है कि चीन सिर्फ डेवलपमेंट प्‍लान को ही नहीं बल्कि खुद को ताकतवर देश के तौर पर स्‍थापित करने के अपने प्‍लान को आगे बढ़ा रहा है।

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