ममता बनर्जी की TMC पर किसका हक? ओम बिरला के फैसले पर टिकी निगाहें, बागियों की पार्टी NCPI का नया 'बॉस' कौन?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अंदरूनी संकट अब संसद से लेकर चुनावी कानूनों की बहस तक पहुंच गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC से अलग हुए सांसदों के समूह और पार्टी के आधिकारिक गुट के बीच टकराव लगातार गहरा रहा है।

अब इस पूरे मामले की नजर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अगले कदम पर टिकी हुई है, क्योंकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें उनके सामने रखने की तैयारी में हैं। इस बीच जिस नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया ( NCPI) में TMC के बागी सांसद शामिल होने की बात कह रहे हैं, उसने भी नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया है। इससे राजनीतिक घटनाक्रम और तेज हो गया है।

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अब फैसला लोकसभा अध्यक्ष के पाले में?

पीटीआई के मुताबिक लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के मुताबिक स्पीकर ओम बिरला इस मामले को बिना किसी जल्दबाजी के और पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से निपटाना चाहते हैं। यही वजह है कि उन्होंने बागी सांसदों के साथ-साथ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल दल को भी अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया है। लेकिन इस बुलावै को लेकर सोमवार को दिल्ली से कोलकाता तक भारी ड्रामा देखने को मिला।

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लोकसभा अध्यक्ष के दफ्तर से सोमवार दोपहर करीब 2 बजे एक ईमेल मिला जिसमें उन्हें शाम 4 बजे ही मिलने के लिए कहा गया। उस वक्त अभिषेक बनर्जी कोलकाता में प्राथमिक स्कूल भर्ती घोटाले की जांच के सिलसिले में ईडी (ED) के दफ्तर में मौजूद थे और उनसे पूछताछ चल रही थी।

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इसके बाद टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने स्पीकर दफ्तर को सूचित किया कि अभिषेक बनर्जी जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहे हैं और वह ईडी दफ्तर में व्यस्त हैं। इसके बाद कीर्ति आजाद ने खुद स्पीकर से मुलाकात कर स्थिति स्पष्ट की। बताया जा रहा है कि अभिषेक बनर्जी आधी रात को ईडी दफ्तर से बाहर निकले। टीएमसी का आरोप है कि जानबूझकर इतने कम समय का नोटिस दिया गया ताकि पार्टी अपना पक्ष मजबूती से न रख सके।

NCPI को मिला नया अध्यक्ष लेकिन अपनों को ही भनक नहीं! (NCPI Announces Jyotiprakash Chatterji as New President)

इस बगावत की सबसे दिलचस्प कड़ी वह छोटी सी पार्टी है जिसके कंधे पर बंदूक रखकर बागी सांसद अपनी संसद सदस्यता बचाना चाहते हैं। बागी गुट की प्रमुख चेहरा काकोली घोष दस्तीदार ने मंगलवार को एलान किया कि ज्योतिप्रकाश चटर्जी को NCPI का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इससे पहले पार्टी की संस्थापक शेवली कुंडू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद कयास लग रहे थे कि खुद काकोली घोष कमान संभाल सकती हैं।

मगर चौंकाने वाली बात यह है कि इस नई नियुक्ति की भनक खुद NCPI के पुराने और जमीनी नेताओं को भी नहीं है। पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव शांतनु डे ने मीडिया के सामने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें नहीं पता कि ज्योतिप्रकाश चटर्जी कौन हैं।

उन्होंने कहा, "जिस पार्टी के लिए मैंने इतनी मेहनत की उसमें क्या हो रहा है मुझे अंधेरे में रखा जा रहा है। बड़े नेताओं के आने से मैं खुश हूँ लेकिन हमसे कोई संपर्क नहीं किया गया।" बता दें कि जनवरी 2023 में रजिस्टर्ड हुई इस पार्टी का पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल का है और इसका चुनाव चिन्ह पेन की निब है।

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अगर बगावत को मिली मंजूरी तो संसद में बदल जाएगा पूरा गणित

काकोली घोष दस्तीदार ने संसद परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल उनके साथ 20 सांसद हैं लेकिन बहुत जल्द यह संख्या बढ़कर 22 हो सकती है। यानी ममता बनर्जी के पास 28 में से सिर्फ 6 सांसद रह जाएंगे। बागियों ने साफ कर दिया है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में एनडीए (NDA) सरकार का हिस्सा बनकर काम करेंगे।

अगर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस गुट के NCPI में विलय को हरी झंडी दे देते हैं तो देश की संसद का गणित पूरी तरह बदल जाएगा। लोकसभा में बीजेपी के पास अपने 239 सदस्य हैं। बागियों के आने के बाद NCPI अचानक 20 से 22 सांसदों के साथ एनडीए (NDA) का दूसरा सबसे बड़ा घटक दल बन जाएगी।

यह पार्टी टीडीपी (TDP - 16 सांसद) और जेडीयू (JDU - 12 सांसद) को भी पीछे छोड़ देगी। हालांकि काकोली घोष ने यह भी साफ किया कि दिल्ली के इन सांसदों का बंगाल के बागी विधायकों से कोई लेना-देना नहीं है और दोनों अलग-अलग ग्रुप हैं।

'गद्दार टीम' बनाम 'दीदी की सेना' और कानूनी जानकारों की राय

ममता बनर्जी के वफादार खेमे ने इस बागी गुट के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने कहा कि संसद में अब दो टीमें हैं-एक ममता बनर्जी की 'TMC टीम' जिसका निशान जोड़ा फूल है और दूसरी नरेंद्र मोदी की 'गद्दार टीम' जिसका निशान अब पेन की निब बन गया है।

कीर्ति आजाद और रचना बनर्जी जैसी सांसदों के बीच भी जुबानी जंग जारी है। हालांकि बागी सांसद रचना बनर्जी का कहना है कि उनकी ममता दीदी से कोई निजी दुश्मनी नहीं है और उनके पुराने रिश्ते हमेशा वैसे ही रहेंगे। बागी नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने संकेत दिए हैं कि वे जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होने वाले मानसून सत्र से पहले सारे कागजी काम पूरे कर लेंगे लेकिन असली फैसला कोर्ट में ही होगा।

संसद के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने इस पूरे 'मर्जर' पर एक बड़ा कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने संविधान की 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 का हवाला देते हुए कहा, कानून के मुताबिक केवल एक मूल राजनीतिक दल ही दूसरे दल में विलीन हो सकता है। सिर्फ सांसद या विधायक अपनी मर्जी से किसी दूसरी पार्टी में जाकर उसे विलय का नाम नहीं दे सकते।

अगर मूल पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व किसी दूसरी पार्टी से हाथ मिलाता है और तब सदन के दो-तिहाई सदस्य उसका समर्थन करते हैं तभी उसे दलबदल कानून से छूट मिलती है। यहां तो मूल दल (ममता बनर्जी) विलय के खिलाफ है। चुनाव आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने भी इसे कानून की कमियों का फायदा उठाने का एक ऐसा 'अनोखा प्रयोग' बताया है जिसका जिक्र न तो दलबदल कानून में है और न ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल सभी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी हैं। यदि स्पीकर बागी सांसदों की मांग स्वीकार करते हैं तो संसद में शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है। वहीं यदि मांग खारिज होती है, तो मामला अदालतों तक पहुंचने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। स्पष्ट है कि टीएमसी का यह संकट अब सिर्फ बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद, चुनावी कानून और गठबंधन राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

टीएमसी के भीतर जारी यह संघर्ष आने वाले दिनों में और दिलचस्प मोड़ ले सकता है। एक तरफ ममता बनर्जी का संगठनात्मक नियंत्रण है, तो दूसरी तरफ बागी सांसद संसद में नई पहचान की तलाश में हैं। अंतिम फैसला अब लोकसभा अध्यक्ष और संवैधानिक प्रक्रियाओं के हाथ में है, जो तय करेगा कि बंगाल की राजनीति का यह सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल आखिर किस दिशा में जाएगा।

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