ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार जीतने का सपना टूटा, जानें क्यों नहीं मिला Nobel Peace Prize?
Donald Trump Nobel Peace Prize: वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को इस वर्ष (2025) का प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। नोबेल समिति ने उन्हें तानाशाही के बीच लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने और लोकतंत्र की मशाल जलाने के उनके अथक संघर्ष के लिए सम्मानित किया है। एक तरफ जहाँ मचाडो को उनके सार्थक प्रयासों के लिए यह सम्मान मिला।
वहीं दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में लगातार इस पुरस्कार को पाने की कोशिश कर रहे थे। ट्रंप और उनके समर्थक उन्हें अब्राहम समझौते और गाजा संघर्षविराम प्रयासों जैसे कार्यों के लिए योग्य मानते थे।

ट्रंप को क्यों नहीं मिला नोबेल?
डोनाल्ड ट्रंप के इस बार पुरस्कार न जीत पाने का सबसे बड़ा कारण नामांकन की टाइमलाइन है। 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 31 जनवरी थी। ट्रंप ने 20 जनवरी को शपथ ली थी, जिसका अर्थ है कि उनके पास नामांकन के लिए केवल 11 दिन का समय था। इतने कम समय में शांति के लिए कोई बड़ा और प्रमाणित योगदान दे पाना असंभव था।
नोबेल कमेटी के नियम कहते हैं कि नामांकन की प्रक्रिया पारदर्शी लेकिन गोपनीय होती है। हर साल 31 जनवरी तक ही नामांकन दाखिल किए जा सकते हैं। इस वर्ष 338 लोग या संगठन नामित हुए हैं, जिनकी सूची 50 साल तक गुप्त रहेगी।
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कमेटी की स्वतंत्रता और पात्रता के मानक
नामांकन की अंतिम तिथि के बाद, नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी पाँच सदस्यों के साथ मिलकर लिस्ट को शॉर्टलिस्ट (Shortlist) करती है। यह प्रक्रिया फरवरी में शुरू होती है, जिसके बाद विशेषज्ञों (Experts) से लंबी-चौड़ी गोपनीय रिपोर्टें (Confidential Reports) मंगवाई जाती हैं। कमेटी अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार, शांति, भाईचारे और निशस्त्रीकरण के लिए दीर्घकालिक योगदान को प्राथमिकता देती है।
ट्रंप के दावे, जिनमें गाजा या यूक्रेन में उनकी भूमिका शामिल है, अक्सर झूठे साबित किए गए हैं या वे आखिरी वक्त की कोशिशें थीं जो कारगर नहीं हुईं। कमेटी पर कोई राजनीतिक दबाव काम नहीं करता है, जैसा कि नॉर्वे के वित्त मंत्री के साथ ट्रंप की बातचीत के बाद कमेटी ने स्पष्ट किया था। नोबेल कमेटी लंबी समय तक शांति के लिए काम करने वालों को तरजीह देती है, न कि छोटी-मोटी राजनीतिक डील करने वालों को।
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