Diplomacy: भारत को क्यों छोड़ना पड़ा अपना एकमात्र इंटरनेशनल Ayni Airbase? बदलती विदेश नीति या कूटनीतिक ब्लंडर?
Diplomacy: हाल ही में भारत ने ताजिकिस्तान के आयनी एयरबेस में अपनी एकमात्र विदेशी सैन्य उपस्थिति समाप्त कर दी थी। यह कदम द्विपक्षीय समझौते की समाप्ति के बाद उठाया गया और यह साफ दिखाता है कि मध्य एशिया में भू-राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं व भारत अपनी प्राथमिकताएं रीसेट कर रहा है। लेकिन अब एक और खबर आ रही है के
सोवियत पतन के बाद आयनी कैसे बना भारत के लिए अहम
आयनी एयरबेस, जिसे जिस्सार सैन्य हवाई पट्टी भी कहते हैं, USSR के टूटने के बाद खराब स्थिति में था। रूस आर्थिक संकट में था और सैनिकों का वेतन तक नहीं दे पा रहा था। ऐसे समय में भारत, जो रूस का भरोसेमंद पार्टनर था, को इस बेस को विकसित करने की अनुमति मिली।

कारगिल युद्ध के बाद आयनी का महत्व और बढ़ा
1999 के कारगिल युद्ध ने भारत के लिए नई रणनीतिक जरूरतें पैदा कर दी थीं। पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के लिए अफगानिस्तान और चीन के नज़दीक स्थित यह एयरबेस भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया।
आयनी एयरबेस - तीन देशों के बीच स्थित एक सुपर-स्ट्रैटेजिक लोकेशन
यह एयरबेस ताजिकिस्तान की अफगानिस्तान और चीन सीमा के पास था। मादक पदार्थों की तस्करी, चरमपंथी घुसपैठ और अफगान संघर्ष के कारण यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा रणनीति का बड़ा हिस्सा था। यह वाखान कॉरिडोर से सिर्फ 20 किमी दूर है और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर व चीन के शिनजियांग के भी बेहद करीब।
भारत ने $70 मिलियन से बनाया हाई-टेक एयरबेस
भारतीय वायुसेना और BRO ने लगभग $70 मिलियन (लगभग 629 करोड़ भारतीय रुपए) लगा कर इस बेस को अपग्रेड किया-
• 3,200 मीटर लंबा रनवे
• नया ATC सिस्टम
• ईंधन डिपो
• सुखोई-30MKI और हेलीकॉप्टरों की तैनाती
यह सब मिलकर आयनी को भारत की विदेशों में एकमात्र सक्रिय सैन्य लोकेशन बनाता था।
फरखोर में भारतीय सैन्य अस्पताल- भारत की सॉफ्ट पावर
भारत ने ताजिकिस्तान के फरखोर में एक मिलिट्री हॉस्पिटल भी शुरू किया था, जहां उत्तरी गठबंधन के सदस्यों का इलाज किया जाता था। इससे भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ी और यह क्षेत्र में भारत की मानवीय मौजूदगी का बड़ा प्रतीक बन गया।
2021 में अफगानिस्तान से निकासी में आयनी की बड़ी भूमिका
तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद, भारत ने अपने नागरिकों और अधिकारियों को सुरक्षित निकालने के लिए इसी एयरबेस का उपयोग किया था। तब इस बेस की उपयोगिता और भी बढ़ गई थी।
वापसी की वजह - रूस और चीन का बढ़ता दबाव
भारत के आयनी एयरबेस छोड़ने के पीछे ताजिकिस्तान पर रूस और चीन का बढ़ता दबाव एक बड़ा कारण माना जा रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद उत्तरी गठबंधन को दिया जाने वाला भारत का समर्थन भी कम हो गया था, जिससे बेस का स्ट्रेटेजिक उपयोग घटने लगा था। हालांकि डिफेंस एक्सपर्ट आयनी से वापसी को भारत के लिए रणनीतिक चूक बता रहे हैं। क्योंकि यह पाकिस्तान के सिर पर मौजूद है।
तालिबान से भारत के नए रिश्तों के लिए भी यह कदम फायदे का
आयनी को छोड़ने से भारत को तालिबान से संपर्क बढ़ाने में आसानी हुई है। यह भारत की अफगान नीति में बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है।
रूस ने भारत का समर्थन किया, लेकिन चीन ने खेल बदल दिया
रूस ने हमेशा भारत की मध्य एशिया में भूमिका का समर्थन किया।
• उसने भारत को SCO में शामिल करवाया
• आतंकवाद से लड़ने के लिए CSTO के तहत ताजिक-अफगान सीमा पर अपनी सैन्य मौजूदगी रखी लेकिन चीन ने BRI (बेल्ट एंड रोड) के जरिए मध्य एशिया में भारी निवेश कर अपनी पकड़ तेजी से बढ़ाई। उसने ताजिकिस्तान के मुरघाब में सैन्य अड्डा भी बनाया और नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास किए।
चीन का लक्ष्य - "Pax Sinica" युग की मजबूती
चीन सैन्य प्रशिक्षण, टेक्निकल सहायता और सुरक्षा एक्सपैंशन के जरिए पूर्वी व मध्य एशिया में अपनी "Pax Sinica" (चीनी नेतृत्व वाली स्थिरता) को आगे बढ़ा रहा है। हाल के सालों में यह क्षेत्र दुर्लभ खनिज और ऊर्जा का नया केंद्र बन गया है। यूक्रेन युद्ध और रूस पर प्रतिबंधों के बाद मध्य एशियाई देशों ने अपनी विदेश नीति में विविधता लाना शुरू किया है। वे चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं।
EU, US, तुर्की और खाड़ी देशों की बड़ी दिलचस्पी
• EU ने 2024 में $10.6 बिलियन और 2025 में $13.2 बिलियन का निवेश घोषित किया।
• तुर्की तुर्की भाषी देशों के साथ अपनी साझेदारी मजबूत कर रहा है।
• अमेरिका ने C5+1 जैसे मंचों के जरिए नए संबंध बनाने शुरू किए हैं।
अमेरिका की नीति ने भारत को कई बार पहुंचाया नुकसान
अमेरिका ने कभी भारत को चाबहार पर छूट दी, फिर वापस ले ली, फिर छह महीने के लिए बहाल की-इन उतार-चढ़ावों ने मध्य एशिया में भारत की कनेक्टिविटी योजनाओं को धीमा कर दिया।
मध्य एशिया में क्या है रणनीति?
भारत ने पिछले 30 सालों में सैन्य तकनीक, आतंकवाद निरोधक सहयोग और आर्थिक रिश्तों से मध्य एशिया में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। 2010 के बाद मध्य एशियाई देशों ने भी भारत के साथ साझेदारी को रणनीतिक रूप से बढ़ाया है। इसके अलावा मध्य एशियाई देश चाबहार बंदरगाह को चीन के प्रभाव को बैलेंस करने और अपने एक्सपोर्ट बढ़ाने के बड़े अवसर के रूप में देखते हैं।
आयनी से वापसी
हालांकि आयनी एयरबेस छोड़ने से भारत की सैन्य पहुंच थोड़ी सीमित होती है, लेकिन इससे यह साफ होता है कि भारत अपनी विदेशी नीति में सांस्कृतिक, मानवीय और कूटनीतिक साधनों पर ज्यादा भरोसा कर रहा है।
भारत को अब किस चीज़ की जरूरत?
मध्य एशिया में तेज़ी से बदलते हालात के बीच भारत को-
• पारदर्शी और विश्वसनीय कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट
• रणनीतिक साझेदारियां
• कूटनीतिक और बौद्धिक पूंजी का स्मार्ट उपयोग
-पर तुरंत फोकस बढ़ाना होगा ताकि वह इस क्षेत्र में एक भरोसेमंद सहयोगी बना रहे।
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