Diplomacy in 2025: युद्ध में फंसी दुनिया, मुश्किलों का अंबार; भारत की डिप्लोमेसी में क्या चुनौतियां आएंगी?
Diplomacy in 2025: दुनिया में चल रहा दो युद्ध पिछले साल भी जारी रहा, पश्चिम एशिया में शासन परिवर्तन हुआ और 2024 में डोनाल्ड ट्रंप पूरी शक्ति के साथ अमेरिका की सत्ता में लौट आए, और इन घटनाक्रमों ने 2025 के जियो-पॉलिटिक्स को काफी दिलचस्प बना दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी मेरे जैसे जियो-पॉलिटिकल पत्रकारों के लिए काफी दिलचस्पी भरा है, क्योंकि ट्रंप 2.0 सबसे बड़ा एक्स-फैक्टर है, क्योंकि अगले चार वर्षों के लिए रोलर कोस्टर की सवारी की उम्मीद में दुनिया की राजधानियों में सीट बेल्ट बांधी जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप, किस वक्त क्या फैसला लेंगे, या कम से कम क्या घोषणा करेंगे, ये हम जैसे पत्रकारों के लिए हर वक्त खबरों की थाली पेश करने जैसा होगा।

लिहाजा, जानना जरूरी हो जाता है, कि नई दिल्ली के लिए साल 2025 में डिप्लोमेसी कैसी होने वाली है, क्या चुनितियां सामने आएंगी और भारत की प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है?
साल 2025 में भारत के सामने डिप्लोमेटिक चुनौतियां क्या होंगी? (India's Diplomacy in 2025)
भारत के सामने साल 2025 में कई उम्मीदें और कई चुनौतियां दिख रही हैं। इस साल की शुरूआत में ही भारत क्वाड (QUAD Summit) की मेजबानी करेगा और इसके अलावा, भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी इस साल भारत में ही होने की संभावना है।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी SCO शिखर सम्मेलन के लिए चीन की यात्रा कर सकते हैं, और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लेकर पहले ही घोषणा हो चुकी है, कि वो साल की शुरूआत में भारत आएंगे। एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए डोनाल्ड ट्रंप के भारत आने की संभावना है, लेकिन मोदी और ट्रंप के बीच की द्विपक्षीय बैठक इस साल के अंत में होने की संभावना है।

डोनाल्ड ट्रंप 2.0 (Donald Trump)
अमेरिका में पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने कमला हैरिस को हरा दिया। डोनाल्ड ट्रंप की चार साल बाद सत्ता में वापसी हो रही है और ट्रंप 2.0 का चेहरा काफी अलग दिखने वाला है। ट्रंप एक ब्रेक के बाद वापस आए हैं, और ज्यादा आत्मविश्वास से भरे हुए और शायद पिछले कार्यकाल के मुकाबले काफी ज्यादा समझदार हो चुके हैं। और उन्होंने 20 जनवरी को शपथ ग्रहण दिवस से बहुत पहले ही सभी प्रमुख नियुक्तियों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।
उन्होंने शपथ ग्रहण से पहले कनाडा और चीन के खिलाफ भारी भरकम टैरिफ लगाने की घोषणा करके और संकेतों में भारत के खिलाफ टैरिफ लगाने की धमकी देकर जियो-पॉलिटिक्स में हलचल मचा चुके हैं। लिहाजा, इस साल हेडलाइंस में डोनाल्ड ट्रंप छाने वाले हैं।
भारत के सामने पड़ोसी देशों की चुनौतियां
साल 2024 में भारत के कुछ महत्वपूर्ण पड़ोसी देशों में सरकारें बदल चुकी हैं।
बांग्लादेश:- लगातार कई हफ्तों तक सड़कों पर चले विरोध प्रदर्शनों ने शेख हसीना को 16 साल बाद सत्ता से बाहर कर दिया और उन्हें भारत भागने पर मजबूर कर दिया। मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में नई सरकार ने नई दिल्ली से उन्हें वापस भेजने के लिए कहा है, जबकि उनकी अंतरिम सरकार खुद संघर्षरत अर्थव्यवस्था और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में नाकाम रहने के कारण आलोचनाओं का सामना कर रही है।
श्रीलंका:- वामपंथी राजनेता अनुरा कुमारा दिसानायके, जो न तो पारंपरिक मुख्यधारा की पार्टियों से संबंधित हैं और न ही राजनीतिक अभिजात वर्ग से, जिसने शुरू से ही श्रीलंका पर शासन किया है, को व्यापक असंतोष के कारण राष्ट्रपति पद पर बिठाया गया, जिसने 2022 में गोटबाया राजपक्षे की सरकार को गिरा दिया था। नया राष्ट्रपति तमिल अल्पसंख्यकों की राजनीतिक आकांक्षाओं से कैसे निपटता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
मालदीव:- मोहम्मद मुइज्जू के भारत विरोधी नारे के साथ सत्ता में आने के लगभग एक साल बाद, अक्टूबर 2024 में नई दिल्ली की उनकी राजकीय यात्रा के बाद दोनों देशों के संबंध पटरी पर लौट आए हैं। मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद जो तनाव का माहौल बना था, वो अब खत्म हो चुका है।
नेपाल:- नेपाल में पिछले साल एक बार फिर से सरकार बदली और अब केपी शर्मा ओली देश के प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत की जगह चीन को चुना था। ओली का रूख एंटी-इंडिया ही रहा है। हालांकि, भारत के हक में बात ये है, कि उनकी सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर टिकी है, जो भारत समर्थक है, लिहाजा ओली के लिए भारत के खिलाफ फैसले लेना मुश्किल होगा।

भारतीय डिप्लोमेसी के सामने अनिश्चितताएं क्या होंगी?
यूक्रेन युद्ध:- राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने संकेत दिया है, कि वह रूस के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन चूंकि युद्ध को शुरू हुए तीन वर्ष हो चुके हैं, इसलिए राष्ट्रपति पुतिन के साथ वार्ता की संभावित शर्तें अस्पष्ट बनी हुई हैं।
शांति की कीमत एक बड़ा सवाल और मुख्य चुनौती होगी, जिस पर अमेरिका, रूस, यूक्रेन और यूरोप के वार्ताकारों को विचार करना होगा। वार्ता में चीन की भूमिका होगी और भारत, रूस और अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के बीच एक तटस्थ स्थल या मध्यस्थ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
लेकिन नई दिल्ली यह मूल्यांकन करेगी, कि क्या वह कोई भूमिका निभाना चाहती है, वह ऐसी क्या बात कर सकती है जो अन्य देश नहीं कर सकते और अगर वह सफल नहीं होती है, तो क्या होगा। वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए पुतिन की भारत यात्रा पर बारीकी से नजर रखी जाएगी।
चीन के साथ क्या सामान रहेंगे संबंध? (India-China Relation)
चीन के साथ सीमा विवाद पर पिछले साल महत्वपूर्ण शांति लौटी है और डी-एस्केलेशन हो चुका है। नई दिल्ली और बीजिंग ने संकेत दिया है, कि वे सीमा मुद्दों और लद्दाख में लगभग पांच साल के गतिरोध से प्रभावित संबंधों को सामान्य करने के लिए कई और कदम उठा रहे हैं। सीमा पर लगभग 50,000-60,000 सैनिक तैनात हैं, और 2025 की गर्मियों में इसमें कमी आ सकती है।
भारत चीनी व्यवसायों पर लगाए गए आर्थिक और वीजा प्रतिबंधों को कम करने से पहले सैनिकों की वापसी और डी-एस्केलेशन के अगले कदमों पर बारीकी से नजर रखेगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा, कि बीजिंग डी-एस्केलेशन सौदे का अपना वादा पूरा करता है या नहीं, और क्या भारतीय सैनिक वास्तव में 2020 से पहले के गश्त बिंदुओं तक गश्त करने में सक्षम हो पाएंगे और स्थानीय ग्रामीण क्या पहले की तरफ चारागाहों तक जा पाएंगे?
चीन को लेकर विश्वास की कमी अभी भी बहुत ज्यादा है, और नुकसान की भरपाई करने में लंबा समय लगने के साथ साथ काफी कोशिशें करनी होंगी। SCO शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री मोदी की चीन की संभावित यात्रा इस प्रयास के लिए महत्वपूर्ण होगी। इससे पहले, मोदी जुलाई में ब्राजील में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात कर सकते हैं।
पाकिस्तान के साथ इस साल भी बातचीत नहीं
पाकिस्तान को लेकर 2024 में भी भारत की तरफ से कोई बात नहीं की है। भारत ने अपनी क्रिकेट टीम पाकिस्तान नहीं भेजी। हालांकि, शहबाज शरीफ की सत्ता में वापसी के बाद से सार्वजनिक बयानबाजी शांत हो गई है, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में अभी तक तेजी नहीं आई है। बांग्लादेश के यूनुस ने सार्क को पुनर्जीवित करने का सुझाव दिया है, लेकिन यह विचार बेकार लगता है। नई दिल्ली इस बात पर सख्त रूख रखता है, कि बातचीत और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते, और जम्मू क्षेत्र में हुए हमलों ने उस लाल रेखा को और मजबूत कर दिया है।
यूरोपीय देशों में नये नेताओं के हाथ में कमान
जर्मनी में उथल-पुथल के बीच इस साल नए चुनाव होंगे, जबकि फ्रांस राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, और दक्षिणपंथी विचारधारा का उदय हो चुका है। जर्मनी और फ्रांस में दक्षिणपथी पार्टियों का सत्ता में आना तय है। आव्रजन पर बढ़ती तीखी बहस भारतीयों और यूरोप में अध्ययन, रहने और काम करने के इच्छुक अन्य लोगों पर छाया डालेगी। यह मुद्दा तब उठने की संभावना है, जब भारत और यूरोप एक मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं।
यूनाइटेड किंगडम, जिसने कंजर्वेटिव सरकार के तहत आव्रजन पर एक मजबूत स्थिति अपनाई थी, वह भी भारत के साथ एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिटिश वार्ताकार अड़चनों को संबोधित करते हैं या नहीं। भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन भी चल रहा है।

अफ्रीका में भारत को करनी होगी और कोशिशें
इस वर्ष भारतीय विदेश नीति में अफ्रीका के साथ जुड़ाव एक नया क्षेत्र हो सकता है, और दोनों पक्ष इसके लिए पारस्परिक रूप से सुविधाजनक कार्यक्रम खोजने का प्रयास कर रहे हैं। इस वर्ष इथियोपिया में शिखर सम्मेलन आयोजित करने की कुछ चर्चा है। नई दिल्ली में 2015 का शिखर सम्मेलन, जिसमें अफ्रीका के 40 राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों ने भाग लिया था, एक बड़ी सफलता थी। इस वर्ष जी20 नेताओं के शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री मोदी के दक्षिण अफ्रीका जाने की उम्मीद है।
भारत-कनाडा, भारत-अमेरिका संबंध
खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या, जिसके लिए कनाडा ने भारत को दोषी ठहराया है, उसने संबंधों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है, और अमेरिका के साथ संबंधों के कुछ पहलुओं को भी जटिल बना दिया है। हालांकि अमेरिका के प्रति भारत की प्रतिक्रिया कनाडा के प्रति उसकी प्रतिक्रिया से अलग रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय न्यायेतर हत्या की साजिश रचने के आरोपों ने नियम-आधारित व्यवस्था के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिका में गुरपतवंत सिंह पन्नू को निशाना बनाने की कथित साजिश से भारत की वैश्विक छवि और पश्चिम में भारतीय लोकतंत्र के कई समर्थकों, खासकर उन लोगों के लिए प्रतिष्ठा की कीमत चुकानी पड़ रही है, जो सत्तावादी चीन के मुकाबले भारत को सकारात्मक रूप से देखते हैं। यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब नई दिल्ली को देना होगा और पश्चिमी देशों की चिंताओं को दूर करना होगा।
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