डिप्रेशन का लक्षण है ? स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है- Study
वैज्ञानिकों ने एक नया शोध किया है कि डिप्रेशन से पीड़ित लोगों को स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। डिप्रेशन के जितने ज्यादा लक्षण होते हैं, स्ट्रोक का खतरा उतना ही ज्यादा हो सकता है।

डिप्रेशन भी भविष्य में पड़ने वाले स्ट्रोक का संकेत हो सकता है। डिप्रेशन के जितने ज्यादा लक्षण होंगे, स्ट्रोक का जोखिम उतना ही बढ़ जाता है। यह बात एक रिसर्च में सामने आई है, जो आयरलैंड में हुई है। शोध में पाया गया है कि जो लोग किसी ना किसी रूप में अवसाद से पीड़ित थे उनकी तुलना में जिनमें अवसाद के कोई लक्षण नहीं थे, उन्हें स्ट्रोक का खतरा कम था। यह शोध हर आयु वर्ग के लोगों और दुनिया भर की आबादी पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने उम्मीद जाहिर की है, अब अगर कोई चिकित्सक किसी के डिप्रेशन का उपचार करेंगे तो उन्हें स्ट्रोक की रोकथाम के उपायों पर भी अपने इलाज को फोकस करना चाहिए।

स्ट्रोक का डिप्रेशन से भी कनेक्शन- शोध
जो लोग डिप्रेशन या अवसाद से पीड़ित हैं, उनमें स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ जाता है। एक नए शोध में यह जानकारी सामने आई है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि ऐसे लोगों को स्ट्रोक के बाद इसके प्रभावों से उबरने में बहुत मुश्किल हो सकती है। इस शोध के ऑथर आयरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ गॉलवे के रॉबर्ट पी मर्फी ने कहा है, 'डिप्रेशन पूरी दुनिया में लोगों को प्रभावित कर रहा है और व्यक्ति के जीवन में व्यापक असर डाल सकता है।' उन्होंने कहा, 'हमारा शोध डिप्रेशन के बारे में एक विस्तृत तस्वीर उपलब्ध कराता है, जो प्रतिभागियों के लक्षणों, जीवन विकल्पों और एंटीडिप्रेसेंट के इस्तेमाल समेत कई फैक्टर्स को देखते हुए स्ट्रोक के जोखिम से इसका संबंध बताता है।'

32 देशों के लोगों पर हुआ शोध
मर्फी के मुताबिक, 'हमारे नतीजे दिखाते हैं कि डिप्रेशन के लक्षण स्ट्रोक के बढ़े हुए जोखिम से संबंधित थे और विभिन्न आयु वर्ग और पूरी दुनिया में जोखिम समान था।' इस शोध का परिणाम जर्नल न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इस शोध में इंटरस्ट्रोक स्टडी के 26,877 व्यस्कों को शामिल किया गया था। इसमें यूरोप, एशिया, उत्तर और दक्षिण अमेरिका, मध्य पूर्व के अलावा अफ्रीका के 32 देशों के लोगों को शामिल किया गया था। न्यूरोलॉजी के मुताबिक इंटरस्ट्रोक स्टडी एक अंतरराष्ट्रीय, बहु-केंद्रित केस-कंट्रोल स्टडी है, जो कि घातक स्ट्रोक से संबंधित जोखिम कारकों को लेकर सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय शोध है।

डिप्रेशन के मरीजों को स्ट्रोक का ज्यादा खतरा-रिसर्च
शोध में पता चला है कि भागीदारों में जिन लोगों को स्ट्रोक हुआ था, उनमें 18 फीसदी ऐसे लोग थे, जिनमें डिप्रेशन के लक्षण थे। जबकि, 14 फीसदी लोगों को स्ट्रोक नहीं हुआ था। शोध में पाया गया कि उम्र, लिंग, शिक्षा, शारीरिक गतिविधि और बाकी लाइफस्टाइल फैक्टर्स पर विचार करने के बाद जिन लोगों में स्ट्रोक से पहले डिप्रेशन के लक्षण थे, उनमें उनकी तुलना में जिनमें कोई डिप्रेशन के लक्षण नहीं थे, स्ट्रोक का खतरा 46 फीसदी ज्यादा था।

डिप्रेशन के ज्यादा लक्षण तो स्ट्रोक का ज्यादा खतरा-रिपोर्ट
शोध में यह भी पता चला है कि जिन भागीदारों में डिप्रेशन के ज्यादा लक्षण मौजूद थे, उनमें स्ट्रोक का खतरा उतना ही ज्यादा था। जिन भागीदारों में डिप्रेशन के पांच या उससे ज्यादा लक्षण थे, उनमें उनकी तुलना में जिनमें डिप्रेशन के कोई लक्षण नहीं थे, स्ट्रोक का खतरा 54 फीसदी अधिक था। शोध से पता चला है कि जिन लोगों में डिप्रेशन के तीन से चार लक्षण थे,उनमें 58 फीसदी और जिनमें एक या दो लक्षण थे, उनमें 35 फीसदी स्ट्रोक का खतरा ज्यादा था।

डिप्रेशन के मरीजों को ज्यादा घातक स्ट्रोक नहीं, लेकिन..... शोध
इस शोध के कई चौंकाने वाले नतीजे भी देखने को मिले हैं। जैसे कि वैज्ञानिकों ने पाया है कि डिप्रेशन के लक्षण वाले लोगों को ज्यादा घातक स्ट्रोक की संभावना नहीं पाई गई। लेकिन, साथ ही साथ उनमें इस बात की संभावना ज्यादा थी कि रिकवरी के एक महीने बाद, उनकी तुलना में जिनमें डिप्रेशन के लक्षण नहीं थे, उन्हें ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं। मर्फी का कहना है कि 'इस शोध में हमें इस बात की ज्यादा पुख्ता जानकारी मिली है कि कैसे डिप्रेशन के लक्षण स्ट्रोक के कारण बन सकते हैं।' उनका कहना है, 'हमारे नतीजे बताते हैं कि डिप्रेशन के लक्षण मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है, लेकिन स्ट्रोक के खतरे को भी बढ़ा सकता है।'
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वैज्ञानिकों ने चिकित्सकों की दी खास सलाह
मर्फी का कहना है कि 'चिकित्सकों को डिप्रेशन के लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए और इन सूचनाओं का इस्तेमाल स्ट्रोक से बचाव के उपायों पर केंद्रित करना चाहिए।' 26,877 भागीदारों में से 13,000 से ज्यादा को स्ट्रोक आया था। इस शोध को उन 13,000 से ज्यादा लोगों की रिपोर्ट से मेल कराया गया गया, जिन्हें स्ट्रोक नहीं आया था, लेकिन उम्र, लिंग, नस्ली या जातीय पहचान एक जैसी थी। शोध के मुताबिक भागीदारों से पूछा गया कि क्या उन्होंने पिछले 12 महीनों में लगातार दो या दो से अधिक हफ्तों तक उदासी, निराशा या अवसादग्रस्त महसूस किया था। (इनपुट पीटीआई) (तस्वीरें- सांकेतिक)












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