‘एस जयशंकर से करेंगे तुर्की की शिकायत’, विदेशमंत्री की यात्रा पर साइप्रस का बयान, जानें क्या है मामला
विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर गुरुवार को साइप्रस की तीन दिवसीय यात्रा पर रवाना होंगे। इस दौरान वह अपने साइप्रस समकक्ष इयोनिस कसौलाइड्स के साथ बातचीत करेंगे।

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर गुरुवार को साइप्रस की तीन दिवसीय यात्रा पर रवाना होंगे। इस दौरान वह अपने साइप्रस समकक्ष इयोनिस कसौलाइड्स के साथ बातचीत करेंगे। भारत और साइप्रस के बीच व्यापार से लेकर कनेक्टिविटी तक कई मुद्दों पर संबंध है। इस बीच साइप्रस के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वह तुर्की के उकसावे वाली कार्रवाइयों की भारत से शिकायत करेंगे।

15 साल बाद हो रही यात्रा
भारतीय विदेश मंत्री यह साइप्रस के यात्रा डेढ़ दशक के बाद हो रही है। इससे पहले मई 2007 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस यूरोपीय देश की यात्रा की थी। यह यात्रा ऐसे वर्ष में हो रही है जब भारत, साइप्रस राजनयिक संबंधों के 60 वर्ष पूरे कर रहे हैं। साइप्रस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक दोनों देशों के विदेश मंत्री एक दूसरे के साथ भारत के साथ आर्थिक संबंधों, ईयू के साथ भारत के रिश्तों पर बात करेंगे। मंत्री जयशंकर और उनके समकक्ष मंत्री इयोनिस के बीच यह तीसरी बैठक होगी। दोनों इससे पहले इस साल जून में किगाली, रवांडा में CHOGM 2022 के मौके पर और सितंबर में न्यूयॉर्क में 77वें UNGA के मौके पर मिले थे।

कई समझौते पर होंगे हस्ताक्षर
दोनों विदेश मंत्री गुरुवार को बातचीत करेंगे और रक्षा और सैन्य सहयोग पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे और साइप्रस को भारत मुख्यालय वाले अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन में शामिल करने के लिए एक समझौता करेंगे। वे आप्रवास और गतिशीलता पर एक समझौते पर बातचीत शुरू करने के इरादे की घोषणा पर भी हस्ताक्षर करेंगे। इस समझौते के तहत दोनों देशों के यात्रियों को एक दूसरे देशों की यात्रा करने में सहूलियत होगी। भारत ने इससे पहले जर्मनी के साथ ऐसे ही कई समझौते किए हैं। इसके साथ ही साइप्रस ने कहा है कि वह भारत के साथ तुर्की की उसके खिलाफ की जा रही उकसावे वाली कार्रवाई पर भी बात करेगा।

तुर्की और साइप्रस के बीच कई वर्षों से है विवाद
आपको बता दें कि साइप्रस के साथ तुर्की का लंबे समय से विवाद चल रहा है। इसकी शुरुआत 1974 में तब हुई जब तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया था। दरअसल साइप्रस पहले अंग्रेजों की कॉलोनी हुआ करता था। 1960 में साइप्रस को ब्रिटेन से आजादी मिली। लेकिन जल्द ही देश में सत्ता के लिए खींचतान शुरू हो गई। कुछ सालों बाद 1974 में वहां सेना ने तख्तापलट दिया। साइप्रस की सेना को ग्रीस का समर्थन हालिल था। ग्रीस का दुश्मन रहे तुर्की ने बेहद नाराज हो गया और उसने सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों को धत्ता बताते हुए साइप्रस पर हमला कर दिया।

तुर्की के हिस्से पर साइप्रस का कब्जा
उत्तरी साइप्रस पर कब्जे के बाद तुर्की ने उसे टर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस का नाम दे रखा है। इस देश भले ही किसी और देश ने मान्यता न दे रखी हो मगर तुर्की का कब्जा इतने सालों बाद भी यहां बरकरार है। साइप्रस के 36 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र पर तुर्की का अवैध कब्जा है। यहां के ईसाईयों को हटाकर तुर्की ने अपने यहां से मुसलमानों को लाकर बसा दिया है। तुर्की, का भारत विरोधी रवैया जगजाहिर है ऐसे में साइप्रस, भारत का खुला समर्थन करता है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान तुर्की ने भारत को कश्मीर पर घेरने की कोशिश की थी। इसके बाद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी साइप्रस के मुद्दे को छेड़ दिया था।












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