रूस के पास नहीं बचा विकल्प, माननी होगी चीन की शर्त.. शी जिनपिंग से मिलने से पहले पुतिन की मजबूरी जानिए
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रूस दौरा आज से शुरू हो रहा है और इससे पहले चीन ने पुतिन के खिलाफ वारंट निकालने को लेकर इंटरनेशनल क्रिमिलन की आलोचना की है।

Xi Jinping Vladimir Putin News: यूक्रेन पर हमले के बाद बीजिंग के पक्ष में खुद को उतार देने वाले रूस ने खुद को चीन के साथ एक 'असमान' रिश्ते में पाया है। यूक्रेन में युद्ध शुरू करने से पहले रूस के पास वो ताकत थी, कि अपनी शर्तों पर चीन के साथ बात कर सकता था, लेकिन अब हालात बदल गये हैं और आज की जियोपॉलिटिक्स में रूस के पास इतनी शक्ति नहीं है, कि वो चीन के साथ अपने हिसाब से समझौते कर सके। चूंकि पश्चिमी देशों ने मास्को पर दर्जनों प्रतिबंध लगाए हुए हैं, लिहाजा दोनों पड़ोसियों के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 190 अरब डॉलर को पार कर गया है, जबकि युआन में किए गए रूसी विदेश व्यापार का अनुपात 0.5 प्रतिशत से बढ़कर 16 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

चीन के सामने क्यों मजबूर हुआ रूस?
इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस की उप मुख्य अर्थशास्त्री एलिना रिबाकोवा ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, कि "रूस के लिए चीन के करीब होना अब काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूस के कई व्यापार मित्र अब नहीं हैं।" रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं और इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है। दोनों नेता, आखिरी बार तब मिले थे, उज्बेकिस्तान के समरकंद में एससीओ शिखर सम्मेलन में शिरकत करने दोनों नेता पहुंचे थे और उससे पहले की मुलाकात उस वक्त हुई थी, जब यूक्रेन में अपना सैन्य अभियान शुरू करने से तीन हफ्ते पहले व्लादिमीर पुतिन ने बीजिंग का दौरा किया था। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के बीच के संबंध ऊर्जा क्षेत्र काफी मजबूत हुए हैं, जिसपर पश्चिमी देशों ने काफी निशाना साधा है। जबकि, इंस्टीच्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस के अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने कहा, कि "चीन और भारत ने यूरोपीय संघ को रूस के सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजार के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया है"।

रूस में चीनी कंपनियों ने जमाए कदम
तुर्की के अलावा चीन और भारत लगातार रूस से तेल का आयात कर रहा है और चौथी तिमाही में रूस ने जितने तेल का उत्पादन किया है, उसका दो तिहाई हिस्सा इन्हीं तीन देशों ने खरीदा है। मॉस्को हायर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक विशेषज्ञ सर्गेई त्सिपलाकोव ने कहा, कि "यूरोपीय कंपनियों ने रूस से बाहर निकलकर जो फ्री स्पेस तैयार किया, उसे अब चीनी कंपनियों ने भर दिया है।" यानि, रूस के ऊपर चीन का दोहरा अहसान हो चुका है। यह रूस के प्रतिष्ठित एमजीआईएमओ विश्वविद्यालय में एक शोध साथी अन्ना किरीवा द्वारा साझा किया गया एक विचार था। किरीवा ने एएफपी को बताया, कि "विशेष रूप से मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, अलग अलग उपकरण, ऑटोमोबाइल और अन्य वाहनों के क्षेत्र में जो रूस में फ्री स्पेस तैयार हुआ था, उस कमी को अब चीन ने भर दिया है।"
पुतिन को जुड़वां भाई बनाएंगे शी जिनपिंग?
उन्होंने कहा, कि हालांकि ज्यादातर बड़ी चीनी कंपनियां, जो पश्चिमी बाजारों में अच्छी तरह से जमी हुई हैं, उन्होंने संभावित प्रतिबंधों के डर से रूस में अपनी गतिविधियों को रोकने का विकल्प चुना। लेकिन, एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्लेषक टिमोथी ऐश का मानना है, कि "पुतिन चीन के साथ एक जुड़वां भाई की तरह समान संबंध चाहते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।" उन्होंने कहा, कि "रूस के पास चीन की ओर रुख करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।" कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के एक साथी तैमूर उमारोव ने कहा, कि रूस की आर्थिक स्थिरता अब "चीन पर निर्भर करती है"। उन्होंने कहा, कि "अब बीजिंग के हाथ में रूस को घरेलू स्तर पर प्रभावित करने का यंत्र लग चुका है और अब चीन रूस को घरेलू स्तर पर प्रभावित कर सकता है।" हालांकि, क्रेमलिन किसी भी असमानता से इनकार करता है। रूसी राष्ट्रपति के सहयोगी यूरी उशाकोव ने पत्रकारों से कहा, कि "रूस और चीन के संबंधों में न तो कोई नेता है और न ही अनुयायी, क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समान रूप से भरोसा करते हैं।"

शी जिनपिंग से सौदा कर पाएंगे पुतिन?
हालांकि, अभी भी कई ऐसे लॉजिस्टिक दिक्कते हैं, जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच व्यापार का विस्तार नहीं हो पा रहा है। रूस के सुदूर पूर्व में रेलवे मार्ग तो हैं, लेकिन किरीवा ने कहा, कि उन्हें अपग्रेड करने में अभी कुछ समय लगेगा। जबकि, जापान के सागर में कोज़मिनो के मुख्य तेल बंदरगाह सहित सुदूर पूर्वी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा भी भीड़भाड़ वाला है। इसके अलावा, बिक्री की मात्रा को बनाए रखने के लिए रूस को चीन और भारत को सामान्य से कम कीमत पर अपना तेल बेचना पड़ रहा है। लिहाजा, रूस का बजट पहले से ही जबरन छूट के परिणामों को महसूस कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा है, कि फरवरी महीने में रूस के तेल निर्यात से जो राजस्व आया है, वो पिछले साल फरवरी के मुकाबले 42 प्रतिशत कम है। जाहिर है, ऐसा तेल की कीमत में डिस्कॉंउट देने की वजह से हुआ है।
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'रूस को कमजोर भी करना चाहता है चीन'
विश्लेषक ऐश ने कहा, कि "बीजिंग रूस को एक ऐसे सहयोगी के रूप में रखने में रुचि रखता है, जो पश्चिम के लिए स्वतंत्र है, जबकि वह रूस को कमजोर करना भी पसंद करता है, ताकि वह उसका शोषण कर सके।" उमारोव ने कहा, कि रूस की चीन पर आर्थिक निर्भरता अभी शुरुआती दौर में है। लेकिन, उन्होंने ये भी कहा, कि "लेकिन अगले कुछ सालों में ये बहुत बड़ा राजनीतिक फायजा लेने का सौदा चीन के लिए बन जाएगा।" लिहाजा, यूक्रेन युद्ध के साए में जब चीन और रूस के राष्ट्रपति की मुलाकात होगी, तो हर किसी की नजर उन व्यापारिक सौदों पर होगी, जो दोनों देश में किए जाएंगे।












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