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क्या चीन ने विदेश मंत्री वांग यी के हाथों भारत को कोई मैसेज भेजा है? नई दिल्ली में बैठकें जारी

इसमें कोई शक नहीं, कि गलवान घाटी संघर्ष के बाद भी भारत और चीन के बीच व्यापार में लेस मात्र भी कमी नहीं आई, बल्कि भारत और चीन का व्यापार ऐतिहासिक 100 अरब डॉलर को पार कर गया।

नई दिल्ली, मार्च 25: हालांकि, भारत और चीन के बीच चलने वाली हाई लेवल बैठकों के जरिए कोई नाटकीय सफलता की उम्मीद नहीं है, लेकिन फिर भी भारतीय पक्ष चीन के विदेश मंत्री वांग यी से द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्जीवित करने के नए प्रस्तावों को सुनना चाहेगा, जिसे दो साल पहले पूर्वी लद्दाख में पीएलए द्वारा एकतरफा आक्रमण के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। चीन के विदेश मंत्री वांग यी नई दिल्ली में हैं और भारतीय एनएसए अजित डोवाल और भारतीय विदेश मंत्री से बैठकें कर रहे हैं।

पटरी पर आ पाएंगे द्विपक्षीय संबंध?

पटरी पर आ पाएंगे द्विपक्षीय संबंध?

इसमें कोई शक नहीं, कि गलवान घाटी संघर्ष के बाद भी भारत और चीन के बीच व्यापार में लेस मात्र भी कमी नहीं आई, बल्कि भारत और चीन का व्यापार ऐतिहासिक 100 अरब डॉलर को पार कर गया, लेकिन चीन द्वारा एक बार फिर से बातचीत की कोशिश किया जाना और अपने विदेश मंत्री को भारत भेजने का फैसला करना, कुछ ना कुछ उम्मीदें तो जताता है। खासकर उस वक्, जब सीमा पर तनाव उसी तरह से बरकरार है और भारतीय विदेश मंत्री ने हालिया समय में कई बार कहा है, कि भारत और चीन के बीच के तनाव में कमी नहीं आई है।

भारत ने दिखाया धैर्य

इसमें कोई शक नहीं है, कि पिछली सरकारों के विपरीत, नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन जैसी बढ़ती वैश्विक शक्ति से निपटने के लिए धैर्य और दृढ़ संकल्प, दोनों का भरपूर प्रदर्शन किया है। पीएम मोदी की सरकार में भारतीय विदेश मत्री एस. जयशंकर और भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल, जो चीन के इतिहास को काफी अच्छे से जानते और समझते हैं, उनके बारे में ये माना जाता है, कि भारत के खिलाफ चीन की गहन कूटनीति को काटने में ये दोनों माहिर हैं और गलवान घाटी संघर्ष के बाद भी इन दोनों ने अपने धैर्य का जबरदस्त प्रदर्शन किया है। माना जा रहा है कि, भारत को लेकर चीन ने नया डिजाइन बनाया है और ऑफर दिया है, कि जून 2020 की घटना को द्विपक्षीय संबंधों के बीच अब नहीं घसीटा जाना चाहिए और बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन भारतीय वार्ताकर चीन की इस चाल को भी समझते हैं और इसकी उम्मीद काफी कम है, कि भारत और चीन के रिश्तों में जो बर्फ जमी है, वो आसानी से पिघलेगी।

1959 लाइन को लागू कर रहा चीन?

1959 लाइन को लागू कर रहा चीन?

चीन के विदेश मंत्री भले ही भारत में हैं, लेकिन सवाल ये उठता है कि, जो चीन लगातार अपने संकल्पों के साथ आगे बढ़ता है, क्या वो एक बार फिर से लद्दाख और अरूणाचल प्रदेश पर अपने 1959 लाइन को लागू कर रहा है, जिसे भारत पहले ही खारिज कर चुका है? वहीं, इस्लामाबाद में इस्लामिक देशों के शिखर सम्मेलन में शामिल हुए चीनी विदेश मंत्री ने कश्मीर पर जो बयान दिया है, भारत ने उसका कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराया हैं। वहीं, चीन के विदेश मंत्री ने अचानक अफगानिस्तान का दौरा किया है और उनके नेपाल जाने का भी प्लान है, लेकिन शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों के नरसंहार पर ओआईसी की बैठक में दुनिया के तमाम 57 देशों ने मुंह पर पट्टी बांधी रखी, लिहाजा ये पूरी तरह से चीन की बढ़ती ताकत के सामने मुस्लिम देशों का आत्मसमर्पण है और निश्चित तौर पर वांग यी को इसका श्रेय जाता है।

अपने एजेंडे पर भारत भी कायम

अपने एजेंडे पर भारत भी कायम

विदेश मंत्री वांग यी लगातार अपने एजेंडे को बढ़ाने की कोशिश पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, लेकिन भारतीय वार्ताकार भी अपने रणनीतिक उद्येश्य में उसी तरह से दृढ़ और सख्त हैं, और अपने एजेंडे के लिए भारतीय वार्ताकार भी चीन के विदेश मंत्री के साथ एक ही पेज पर हैं। वहीं, माना जा रहा है कि, चीन में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की चीन वापसी को लेकर बातचीत हो सकती है, लेकिन दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में अब गति तभी आने की उम्मीद है, जब पीएलए. लद्दाख एलएसी पर अप्रैल 2020 की यथास्थिति को बहाल करेगा। अभी तक लद्दाख में कई प्वाइंट्स पर चीनी सैनिकों के पीछे हटने को लेकर विवाद बना हुआ है।

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