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चीन कर रहा है 'अविश्वसनीय' स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम, कामयाब हुआ तो बन जाएगा अजेय!

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा कई साल पहले अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन बना चुका है और अब चीन अगले साल तक अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन तैयार कर लेगा।

बीजिंग, जून 05: चीन ने पिछले महीने दावा किया था कि उसने अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी में अमेरिका के वर्चस्व को खत्म कर दिया है और वो बहुत जल्द अमेरिका को पीछे छोड़कर निकल जाएगा। चीन का मंगल मिशन कामयाब हो चुका है, लेकिन मंगल ग्रह के साथ दिक्कत की बात ये होती है कि वहां जाने में किसी रॉकेट को महीनों का वक्त लगता है। अमूमन अभी धरती पर जो टेक्नोलॉजी है, उसके मुताबिक किसी स्पेस मिशन को मंगल पर पहुंचने में 6 से 8 महीने का वक्त लगता है, लेकिन चीन एक ऐसे टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है, जो अगर कामयाब होता है तो वो सिर्फ सवा महीने में मंगल ग्रह पर पहुंच सकता है। चीनी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अगर वो कामयाब होता है तो मंगल पर जाने में उसे सिर्फ 39 दिन लगेंगे।

स्पेस स्टेशन में चीन का कमाल

स्पेस स्टेशन में चीन का कमाल

ये तो आप जानते होंगे कि चीन अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन तैयार कर रहा है। अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा कई साल पहले अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन बना चुका है और अब चीन अगले साल तक अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन तैयार कर लेगा। चीन ने अपने इस स्पेस स्टेशन का नाम तियागॉन्ग रखा है और अपने इस स्पेस स्टेशन को चीन ऐसी टेक्नोलॉजी से बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसकी मदद से मंगल ग्रह पर पहुंचना चीन के लिए बाएं हाथ का खेल बन जाएगा। चीन की सरकारी अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक चीन अपने स्पेस स्टेशन से आयॉन थ्रस्टर्स टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकता है। आयॉन वो अविश्वसनीय टेक्नोलॉजी है, जिसकी मदद से मंगल पर पहुंचने में समय और ईंधन दोनों बचाया जा सकता है।

क्रांति है ये टेक्नोलॉजी

क्रांति है ये टेक्नोलॉजी

चीनी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक चीन के इस मॉड्यूल का नाम है तियानहे, जिसे चीन ने 2 महीने पहले अप्रैल में लॉन्च किया था। तियानहे मॉड्यूल चार आयॉन थ्रस्ट के द्वारा संचालित होता है। इसको ऐसे समझिए कि ये टेक्नोलॉजी जैविक ईंधन यानि पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करता है बल्कि ये प्रोपल्शन के लिए इलेक्ट्रिसिटी का उपयोग करते हैं और फिर आयॉन्स को स्पीड काफी ज्यादा बढ़ जाती है। चीनी अखबार ने कहा है कि अगर वो कामयाब हो जाता है तो इस मॉड्यूल के जरिए मंगल ग्रह पर इंसानों के लिए पहुंचना मुमकिन हो जाएगा और चीन इतिहास बना देगा। चीनी वैज्ञानिकों का कहना है कि आयॉन ड्राइव्स टेक्नोलॉजी केमिकल्स प्रोपल्शन से कई गुना बेहतर होते हैं।

ईंधन का होगा बेहद कम इस्तेमाल

ईंधन का होगा बेहद कम इस्तेमाल

चायनीज एकेडमी ऑफ साइंस का का दावा है कि एक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन एक साल तक कक्षा में रहने के लिए करीब 4 टन रॉकेट ईंधन का इस्तेमाल करता है। लेकिन, आयॉन थ्रस्ट टेक्नोलॉजी यहां सबको आश्चर्य में डाल देगा। क्योंकि आयॉन थ्रस्टर एक साल तक स्पेस में रहने के लिए सिर्फ 400 किलो ही ईंधन का इस्तेमाल करेगा। यानि, समझ सकते हैं कि फ्यूल कितना कम खर्च होगा। जाहिर सी बात है कि अगर फ्यूल का कम लोड होगा को किसी भी यान का वजन स्वाभाविक तौर पर कम हो जाएगा। ऐसे में चायनीज एकेडमी ऑफ साइंस ने दावा किया है कि अगर वो इस टेक्नोलॉजी के टेस्ट में पूरी तरह से कामयाब हो जाते हैं तो मंगल ग्रह पर पहुंचने में 6 सा 8 महीने का समय नहीं, बल्कि सिर्फ 39 दिनों में वो मंगल पर अपना कदम रख सकेंगे।

आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी पर 'जुआ'

आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी पर 'जुआ'

रिपोर्ट के मुताबिक चीन पिछले कुछ सालों से लगातार आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी को कामयाब बनाने के लिए कम कर रहा है और वो आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी को लेकर बड़े बड़े दांव भी लगा रहा है। साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक आने वाले वक्त में चीन ना सिर्फ स्पेस स्टेशन के लिए इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहता है बल्कि सैटेलाइट ग्रुप्स को लॉन्च करने के साथ साथ एटमिक पॉवर से चलने वाले स्पेसक्राफ्ट्स के लिए भी आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहता है।

क्या खतरनाक है आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी ?

क्या खतरनाक है आयॉन थ्रस्टर टेक्नोलॉजी ?

ऐसा नहीं है कि आयॉन थ्रस्टर एक नई टेक्नोलॉजी है, बल्कि ये सालों पुरानी टेक्नोलॉजी है लेकिन कई वैज्ञानिक इसे खतरनाक बताकर इसका इस्तेमाल करने से इनकार कर चुके हैं और दुनिया के किसी भी देश में फिलहाल इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। दरअसल, थ्रस्ट एक प्रकार की ऊर्जा होती है, जिसके जरिए किसी एयरक्राफ्ट हवा में उड़ाया जाता है। थ्रस्ट ऊर्जा किसी एयरक्राफ्ट का ईंजन पैदा करती है। लेकिन, वैज्ञानिकों का मानना है कि ईंजन द्वारा उतना ज्यादा थ्रस्ट पैदा करना काफी मुश्किल होगा और पर्याप्त मात्रा में थ्रस्ट उत्पन्न नहीं होने से उस रॉकेट में सवार वैज्ञानिकों की जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी। और यह सैटेलाइट के लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है। लेकिन, पिछले 11 महीने से चायनीज एकेडमी ऑफ साइंस इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है और अखबार का कहना है कि शायद सीएएस ने शायद इसके कोड को ब्रेक कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक मैग्नेटिक फिल्ड के जरिए ये तय किया जाता है कि इसके पार्टिकल्स स्पेसक्राफ्ट इंजन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाए।

बीजिंग एक वैज्ञानिक के मुताबिक स्पेस प्रोजेक्ट काफी बड़े प्रोजेक्ट होते हैं और एक स्पेस मिशन को अंजाम देने के लिए सैकड़ों हजारों लोग लगातार मेहनत करते हैं। लेकिन, अंतरिक्ष में लगातार कंपीटिशन बढ़ता जा रहा है। हालांकि, अभी भी अंतरिक्ष में बहुत कम खिलाड़ी हैं लेकिन फिर भी आगे निकलने की होड़ है और आयॉन थ्रस्ट एक ऐसी टेक्नोलॉजी साबित होने वाली है जो 'शैतानी' शक्ति का विस्तार होगा।

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