दुनिया के मंच पर नये सुपरपावर की एंट्री, शी जिनपिंग का शक्ति प्रदर्शन 2.0 शुरू, अमेरिकी वर्चस्व के दिन लदे?
चीन की कोशिश वैश्विक वर्चस्व कामय करने की है, लेकिन अमेरिका की भूमिका अभी भी कम नहीं हुई है। हालांकि, बाइडेन के कार्यकाल में कई क्षेत्र से अमेरिका के पैर जरूर उखड़ गये हैं।

China Superpower: चीन ने अब खुद को एक वैश्विक महाशक्ति की तरफ देखना और उसी भूमिका में काम करना शुरू कर दिया है। लंबे समय तक खुद को हर संघर्ष से दूर रखने वाला बीजिंग अब वैश्विक मंच पर एक नई मुखरता के साथ सामने आ रहा है और ऐसा लग रहा है, कि शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति बनने के तीसरे कार्यकाल में दुनिया के सुपरबॉस की भूमिका निभानी शुरू कर दी है। लिहाजा, पिछले कुछ महीने में चीन एक के बाद एक वैश्विक गतिविधियों में ना सिर्फ अपनी भूमिका निभा रहा है, बल्कि एक्टिंग बॉस की तरफ व्यवहार कर रहा है, लिहाजा चीन की नई भूमिका को देखते हुए लग रहा है, कि शायद शी जिनपिंग ने दुनिया को एक संकेत दे दिया है, कि "दुनिया को अपने हितों के मुताबिक ढालने के लिए चीन के पास अब पर्याप्त सैन्य और आर्थिक ताकत है।"

सुपरपावर की भूमिका में आया चीन?
इस महीने की शुरुआत में, बीजिंग ने सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव कम करने में मध्यस्थता करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था, क्योंकि मध्य पूर्व की अशांत प्रतिद्वंद्विता के लिहाज से ये एक साहसिक कदम है। और अब शी जिनपिंग यूक्रेन युद्ध में शांतिदूत बनने की भूमिका में हैं। मॉस्को में पुतिन के साथ गर्मजोशी के साथ बैठक करना, यूक्रेन के राष्ट्रपति के साथ फोन पर बात करने की योजना बनाना, उनकी नई भूमिका की तरफ इशारे कर रहा है। कुछ एक्सपर्ट तो ये भी कह रहे हैं, कि हो सकता है चीन की मध्यस्थता की वजह से यूक्रेन में युद्ध समाप्ति की घोषणा रूस कर दे और फिर शी जिनपिंग की वर्ल्ड मंच पर धमाकेदार एंट्री हो। हालांकि, हो सकता है कि शी जिनपिंग के इस कदम से स्थायी कूटनीतिक कामयाबी नहीं भी मिले, क्योंकि रूस के प्रति चीन का झुकाव मॉस्को में देखा गया है और यूक्रेन के मन में चीन को लेकर शक तो पहले से ही रहा है। लेकिन, शी जिनपिंग की ये नई भूमिका, यह एक संदेश भेजता है, कि चीन और उसके मित्र अब अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप होने के लिए बाध्य नहीं हैं, बीजिंग की ये नई कोशिश अमेरिका के लिए एक नई चुनौती पेश करता है, जो अभी तक वैश्विक व्यवस्था को आकार देता आया है और शी जिनपिंग की ये नई भूमिका, लोकतंत्र और निरंकुशता के बीच की रेखा को और मजबूत करता है।

किस नीति पर चलता आया है चीन?
चीन लंबे समय से अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य ताकत को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए समय बिताने और स्थितियों को भांवने की नीति पर चलता रहा है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' से जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के साथ, चीन के आर्थिक और राजनीतिक हितों के दुनिया भर में आने के साथ ही दुनिया में चीन की नई भूमिका को लेकर यह बदलाव शुरू हो गया। इसमें सैकड़ों अरबों डॉलर का निवेश है और दुनिया भर के सामरिक संसाधनों को निगलने की ड्रैगन की भयानक भूख भी है। रूस-यूक्रेन और सऊदी-ईरान संघर्ष में हस्तक्षेप करने के अलावा शी चीन पिछले कुछ हफ्तों में वैश्विक विकास पहल, वैश्विक सुरक्षा पहल और वैश्विक सभ्यता नाम से दुनिया के सामने अपने तीन नजरियों को पेश भी किया है। हालांकि, फिलहाल के लिए सच्चाई ये भी है, कि चीन को सुपरपावर बनाने की शी जिनपिंग की इच्छा फिलहाल पूरी होने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि अमेरिका और उसके सहयोगी देश अभी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था, टेक्नोलॉजी और व्यापार को कंट्रोल करते हैं, लेकिन इतना तय है, कि चीन अब अमेरिका के बराबर में एक नये बॉस की तरह खड़ा हो गया है।

शी जिनपिंग की वैश्विक महत्वाकांक्षा
शी जिनपिंग ने इस महीने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बैठक में कहा था, कि "आधुनिकीकरण को आगे बढ़ाने में, चीन न तो उपनिवेशीकरण और लूट के पुराने रास्ते पर चलेगा और ना ही कुछ देशों द्वारा एक बार मजबूत होने के बाद आधिपत्य हासिल करने के लिए उठाए गए टेढ़े रास्ते पर ही चलेगा"। शी जिनपिंग ने ये बात 'वैश्विक सभ्यता पहल' का अनावरण करते हुए ये बात कही और चेतावनी दी, कि "दूसरे दशों पर अपने स्वयं के मूल्यों या मॉडलों को थोपने से बचना चाहिए।" इसके साथ ही शी जिनपिंग ने इस महीने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल की लगातार तीसरी बार पुष्टि होने के बाद अमेरिका के लिए सीधी चेतावनी भी जारी कर दी, कि चीन को अब दबाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

पश्चिम के लिए काउंटरप्वाइंट बना चीन
शी जिनपिंग की तीखी बयानबाजी, उनके इस विश्वास को दर्शाती है, कि चीन पश्चिम के लिए एक काउंटरप्वाइंट के रूप में काम करने के लिए तैयार हो गया है और लोकतंत्र और निरंकुशता के बीच चीन आने वाले समय में एक तमाशा तैयार कर सकता है। चीन अब खुद को एक अधिनायकवाद की तरफ, जैसा ही राष्ट्रपति बाइडेन आरोप लगाते हैं, शी जिनपिंग चाहते हैं, कि पूरी दुनिया... खासकर ग्लोबल साउथ चीन के तर्क को, चीन की आवाज को, चीन के आर्थिक मॉडल को एक शक्ति की तरह माने। कार्नेगी में चीनी मामलों के विशेषज्ञ पॉल हेनल ने कहा, कि "कोविड से बाहर आकर, चीन को एक अलग रोशनी में सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है, और इसका एक बड़ा हिस्सा चीन और अमेरिका की भूमिकाओं के बीच एक अंतर पैदा करना है।" उन्होंने कहा, कि "वे (शी जिनपिंग) ईमानदारी से मानते हैं, कि उनके पास एक प्रमुख शक्ति होने और दुनिया में अपने प्रभाव को बढ़ाने का एक अलग तरीका है और उनका मानना है कि अमेरिका की भूमिका सुरक्षा केन्द्रित रही है, जिसके लिए वो अपनी सेना का इस्तेमाल करता है।" पॉल हेनल का मानना है, कि अब वैश्विक भूमिका निभाने के लिए चीन रिस्क लेने के लिए भी तैयार हो गया है। उन्होंने कहा, कि "शी जिनपिंग जोखिम उठाने के प्रति किसी की अपेक्षा कहीं अधिक सहिष्णु हैं। और वो अतीत में भी अपनी राजनीति में कई जोखिम उठा चुके हैं।"

अमेरिकी धमकियों का अब असर नहीं
कुछ साल पहले तक, शायद एक दशक पहले तक चीन अमेरिका की घमकियों को गंभीरता से लेता था और अमेरिका के रास्ते में आने से बचने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब चीन ने ऐसा करना बंद कर दिया है। पश्चिमी देशों की निंदा के बावजूद चीन ने हांगकांग, शिनजियांग और साउथ चायना सी में अपनी आक्रामकता को जारी रखा है और इन जगहों पर मिली सफलता ने शी जिनपिंग को काफी उत्साहित किया है। इनमें से कुछ मामलों में चीन को कुछ विकासशील देशों का भी समर्थन हासिल हुआ है, जो अमेरिका के खिलाफ रहे हैं। खासकर शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों के मानवाधिकार के मुद्दे पर एक भी मुस्लिम देश चीन के खिलाफ नहीं गये, जो शी जिनपिंग की उल्लेखनीय कामयाबी है। वहीं, चीन की जोरदार कूटनीतिक कोशिशों का ही असर है, कि मुस्लिम-बहुसंख्यक देशों में चीन की आक्रामकता को लेकर चुप्पी रही है, और सऊदी अरब के साथ साथ ईरान ने भी शी जिनपिंग के लिए रेड कार्पेट बिछाए हैं।

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तो क्या चीन को मिल पाएगी कामयाबी?
चीन को ग्लोबल सुपरपावर की भूमिका में स्वीकार कर पाना अभी काफी मुश्किल है। क्योंकि, चीन के खिलाफ बनने वाला गठबंधन भी मजबूत होता जा रहा है और दक्षिण कोरिया, जापान, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया और भारत सहित देशों की तरफ से आने वाले समय में चीन के लिए गंभीर चुनौती पेश की जाएगी, जिसका नेतृत्व स्वाभाविक तौर पर अमेरिका के पास होगा। इसके साथ ही, यूरोप में पैर जमाने की शी जिनपिंग की अभी तक की सारी कोशिशें नाकाम रही हैं, लिहाजा टकराव की स्थिति में यूरोप का चीन के लिए बंद हो, शी जिनपिंग के लिए हिलाने वाला झटके के समान होगा और अगर उसमें भारत को भी शामिल कर लें, तो उसकी भरपाई करना चीन के लिए संभव नहीं होगा। इसके साथ ही ताइवान के लिए बढ़ते ग्लोबल सपोर्ट ने भी शी जिनपिंग को परेशान किया हुआ है और बिना आक्रमण किए हुए चीन के लिए ताइवान पर कब्जा जमाना असंभव होगा और क्या शी जिनपिंग ताइवान पर हमला कर शी जिनपिंग अपनी अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाएंगे, ये एक बड़ा जुआ होगा। लेकिन, इतना तो तय है कि शी जिनपिंग और जो बाइडेन के सामने खड़े हो चुके हैं और आगे कई सालों तक दोनों देश, एक दूसरे को धक्का देने की कोशिश करते रहेंगे।












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