क्या चीन और भारत पर मंडरा रहे हैं संकट के बादल?

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इसी हफ़्ते ब्रिक्स देशों- ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका का वार्षिक शिखर सम्मेलन चीन के शियामेन शहर में शुरू होने जा रहा है.

बहुत लंबा वक़्त नहीं हुआ है जब कहा जा रहा था कि ब्रिक्स भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था का अग्रदूत साबित होगा. हालांकि अब कई वजहों से कहा जा रहा है कि ब्रिक्स अपनी चमक खो रहा है. हम इन्हीं हक़ीक़तों की पड़ताल यहां कर रहे हैं.

एक तिहाई दुनिया तक ब्रिक्स का फैलाव

ब्रिक्स या तकनीकी रूप से ब्रिक देशों (दक्षिण अफ़्रीका इसमें 2010 में शामिल हुआ था) की कहानी गोल्डमन सैक्स के चीफ़ अर्थशास्त्री जिम ओ नील के साथ शुरू होती है. 2001 में उन्होंने कहा था कि ये उभरते हुए सुपरस्टार हैं जो 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था के अग्रदूत होंगे.

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इन पांच देशों के पास दुनिया की 40 फ़ीसदी आबादी है. इसके साथ ही इन पांच देशों के पास दुनिया की 25 फ़ीसदी ज़मीन है. इन तथ्यों के देखते हुए ऐसा लगता था कि आसमान भी इनकी सीमा से बाहर नहीं है.

इन देशों की जीडीपी 11 फ़ीसदी के हिसाब से वर्ल्ड जीडीपी के क़रीब 30 फ़ीसदी तक पहुंच गई. 2015 के आख़िर में गोल्डमन सैक्स ने ब्रिक्स में निवेश बंद कर दिया. ऐसा उसने अपनी पूंजी के मूल्य में 88 फ़ीसदी की गिरावट के बाद किया था. यही 2010 में यह अपने उच्चतम स्तर पर था.

मोटे तौर पर कहा गया कि ब्रिक्स दो समूहों में टूट सकता है. इसमें एक तरफ़ भारत और चीन हैं जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल होकर ग्लोबल सप्लाई चेन का फ़ायदा उठा रहे हैं. दूसरी तरफ़ ब्राज़ील, रूस और दक्षिण अफ़्रीका हैं जो अपनी प्रचुर प्राकृतिक संपदा को वैश्विक मार्केट में बेच रहे हैं.

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चीन और भारत में मध्यवर्ग का उभार

चीन और भारत की सफलता की कहानी में ग्लोबल सप्लाई चेन की शुरुआत की बड़ी भूमिका रही है. जीडीपी के मामले में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. आने वाले वक़्त में वह अमरीका को पीछे छोड़ सकता है. 1990 में वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में चीनी उत्पाद की मौजूदगी तीन फ़ीसदी से भी कम थी.

2015 तक आते-आते चीनी उत्पाद की मौजूदगी क़रीब 25 फ़ीसदी हो गई. मैन्युफैक्चरिंग में चीन की भूमिका बढ़ती गई और मध्य वर्ग के उभार का दायरा भी बढ़ता गया.

1990 में वैश्विक मध्य वर्ग में चीन की भागीदारी ज़ीरो फ़ीसदी थी जो 2015 में 16 फ़ीसदी हो गई. उम्मीद की जा रही है कि 2030 तक 35 करोड़ और चीनी वैश्विक मध्य वर्ग में शामिल हो जाएंगे.

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भारत की भी कहानी कुछ ऐसी ही है. हालांकि भारत का ध्यान अब भी मैन्युफैक्चरिंग पर ही है. भारतीय अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर की भी अहम भूमिका है. आज की तारीख में भारत की जीडीपी में सर्विस सेक्टर का योगदान 61 फ़ीसदी है. इसमें ख़ासकर आईटी सबसे अव्वल है. भारत का आईटी सेक्टर 108 अरब डॉलर का है.

भारत दुनिया के आईटी सर्विस मुहैया कराने वाले देशों में सबसे आगे है. भारत के मध्य वर्ग में उभार की कहानी भी चीन की तरह ही है. 1990 में वैश्विक मध्य वर्ग में भारतीय नागरिकों की भागीदारी महज एक फ़ीसदी थी, जो 2015 तक आठ फ़ीसदी हो गई. उम्मीद है कि 2030 तक 38 करोड़ और भारतीय वैश्विक मध्य वर्ग में शामिल हो जाएंगे.

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वस्तुओं की कीमतों में के गिरावट ब्रिक्स देशों के लिए ख़तरा

ब्रिक्स देशों की तस्वीर विविध है. इसमें के कई देश अपनी विपुल प्राकृतिक संपदा पर निर्भर हैं. ब्राज़िल सोयाबीन, लौह अयस्क और कच्चा तेल विश्व बाज़ार में बेचता है. 2003 से 2014 के बीच ब्राज़ील ने भारी वित्तीय मुनाफा और रचनात्मक योजनाओं के ज़रिए 2.9 करोड़ लोगों को ग़रीबी से निकाला था.

कहा जाता है कि पश्चिमी गोलार्ध में वैश्वीकरण का सबसे ज़्यादा फ़ायदा ब्राज़ील को मिला है लेकिन फिर भी वह ग़रीब है.

दक्षिण अफ़्रीका भी प्राकृतिक संपदाओं पर निर्भर है. दक्षिण अफ़्रीका में सोने, हीरे और प्लेटिनम प्रचुर मात्र में हैं और वह इनका इस्तेमाल अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए करता है. 1990 में दक्षिण अफ़्रीका ने 27 अरब डॉलर की वस्तुओं का निर्यात किया था. 2011 में इस आंकड़े में पांच गुना की बढ़ोतरी हुई.

1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद से रूस ख़ुद को मजबूत बनाने में लगा है. रूस के पास खनिज संपदाओं की भरमार है. कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और धातु रूस के पास पर्याप्त मात्रा में हैं. सोवियत संघ के पतन के बाद रूस को इन प्राकृतिक संसाधनों के ज़रिए संभलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा था.

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2000 में 29 फ़ीसदी रूसी ग़रीबी रेखा के नीचे रहते थे, जो 2012 में 11 फ़ीसदी हो गए. लेकिन हाल के वर्षों में वस्तुओं की कीमतों में गिरावट के कारण इन तीनों देशों के गहरा झटका लगा है. 2005 से 2007 के बीच ब्राज़ील की औसत जीडीपी वृद्धि दर 4.41 फ़ीसदी रही थी.

पिछले तीन सालों से उसकी औसत वृद्धि दर -2.29 फ़ीसदी रही है. इसी दौरान दक्षिण अफ़्रीका की भी वृद्धि दर में भी गिरावट आई. दक्षिण अफ़्रीका में वृद्धि दर 5.41 फ़ीसदी से 1.09 फ़ीसदी पहुंच गई. रूस की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर भी 7.69 फ़ीसदी से -0.77 फ़ीसदी पहुंच गई है.

ब्रिक्स देशों में भ्रष्टाचार बड़ी समस्या

ब्रिक्स के सभी पांच देश भ्रष्टाचार से जूझ रहे हैं. सभी ब्रिक्स देश भ्रष्टाचार की समस्या से अपने-अपने तरीक़े से लड़ रहे हैं. ब्राज़ील में भ्रष्टाचार की लड़ाई में राष्ट्रपति को भी कुर्सी गंवानी पड़ी है. लातिनी अमरीकी देश में ब्राज़ील की न्यायपालिका ने भ्रष्टाचार से लड़ाई के मामले में मिसाल कायम की है.

दक्षिण अफ़्रीका की सत्ताधारी पार्टी एएनसी और राष्ट्रपति जैकब ज़ुमा के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं. इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में इन मामलों की सुनवाई होनी है. रूस में भी विपक्षी नेता अलेक्सेई भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं.

एक सर्वे के मुताबिक 47 फ़ीसदी रूसी मानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है. हालांकि रूस में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद ना के बराबर है. भारत और चीन में भी भ्रष्टाचार पर काबू पाने की कोशिश जारी है.

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भारत में तो रातोंरात 500 और 1000 के दो सबसे बड़े नोटों को रद्द कर दिया गया था. भारत ने अपनी कुल मुद्रा का 80 फ़ीसदी हिस्सा रद्द कर दिया था. प्रधानमंत्री मोदी का कहना था कि ऐसा ब्लैक मनी और टैक्स चोरी से बचने के लिए किया गया है.

चीन में भी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान जारी है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के मामले में 2015 में कम्युनिस्ट पार्टी के तीन लाख पदाधिकारियों को सज़ा दी थी.

जो विजेता है वो भी संकट में

कहा जा सकता है कि भारत और चीन ब्रिक्स देशों के विजेता हैं. दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत और चीन की अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से विकसित हो रही है. इन देशों के नागरिक अपने भविष्य को लेकर आशान्वित हैं. लेकिन एक दूसरा पक्ष यह भी है कि भारत की 50 फ़ीसदी आबादी बेहद ख़राब ज़िंदगी बसर कर रही है.

दूसरी तरफ़ चीन की अर्थव्यवस्था भी धीमी हुई है. दोनों देश तकनीकी स्तर पर संक्रमण काल से गुजर रहे हैं. लोगों की जगह मशीनें काम करने लगी हैं. विश्व बैंक का कहना है कि भारत में 68 फ़ीसदी नौकरियों पर संकट है क्योंकि आने वाले वक्त में इनकी जगह मशीनें लेंगी. चीन में यह आंकड़ा 77 फ़ीसदी है.

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