बांग्लादेश में कट्टरपंथियों से हिंदू दलित कैसे कर रहे हैं अपनी रक्षा? सड़कों पर उतरने की तैयारी में मतुआ समाज

Bangladeshi Hindu News: बांग्लादेश में रह रहे करीब 30 लाख मतुआ समुदाय पर 53 साल पुराना संकट फिर से गहरा रहा है। इस समाज को आज अपने लोगों और अपने मंदिरों, संपत्तियों की रक्षा के लिए रात-रात जाग कर बितानी पड़ रही है। हिंदूओं पर हो रहे हमले के विरोध में यह समुदाय एक विशाल प्रदर्शन की तैयारी में भी जुट गया है।

नामसूद्र समुदाय से जुड़े मतुआ बांग्लादेशी दलितों/वंचितों का एक समाज है, जो 1971 में भी बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी सेना की वजह से धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हो चुके हैं। बांग्लादेश के ओरकांडी को मतुआ समुदाय का केंद्र माना जाता है और ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को यह समाज हिंदुओं पर हो रहे हमले के खिलाफ ओरकांडी में एक बहुत बड़ा प्रदर्शन करने जा रहा है।

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हिंदुओं पर हमले के विरोध में विशाल विरोध प्रदर्शन करेगा मतुआ समुदाय
मतुआ समुदाय ने इस प्रदर्शन के सिलसिले में 8 सूत्री मांगों की एक सूची तैयार की है, जिसमें बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को रोकने और उन्हें सुरक्षा देने की मांग शामिल है।

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पीएम मोदी भी कर चुके हैं ओरकांडी की यात्रा
ओरकांडी ठाकुर बाड़ी मतुआ महासंघ के संस्थापक श्री श्री हरिचंद ठाकुर की जन्मभूमि के रूप में लोकप्रिय है, जो मतुआओं के लिए एक तीर्थ स्थान भी है। 21 मार्च, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने दो दिवसीय बंग्लादेश दौरे पर यहां पहुंचे थे और हरि मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। इस दौरान उन्होंने हरिचंद ठाकुर के वंशजों से भी मुलाकात की थी।

पूरी रात जाग कर अपनी रक्षा कर रहा है मतुआ समाज
बुधवार को होने वाले प्रदर्शन की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, श्रीधाम ओरकांडी स्थित श्री श्री हरिचंद मतुआ मिशन सेंट्रल कमेटी के अध्यक्ष पद्मनाभ ठाकुर मतुआओं की ओर से आयोजित प्रदर्शन की खुद अगुवाई करेंगे।

एक मतुआ नेता ने बताया है, 'बांग्लादेश में मतुआ-बहुल क्षेत्रों में खुलना, जेसोर, बारीशाल, बागेरहाट और सतखिरा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन सभी इलाकों में मतुआओं ने होने वाले हमलों से खुद की रक्षा के लिए रात्रि जागरण शुरू कर दिया है।'

बांग्लादेश में हिंदू सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे- मतुआ नेता
एक वरिष्ठ मतुआ नेता के मुताबिक, 'बांग्लादेश में हिंदू सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं और मतुआ समुदाय हमलों के निशाने पर है। मंदिरों और पूजा स्थलों में तोड़फोड़ हो जाती है और लूटपाट और जबरन वसूली तो यहां आम बात है।'

53 साल पहले 1971 में बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के समय भी यह समाज कट्टरपंथियों और पाकिस्तानी सेना के निशाने पर आया था, जिसकी वजह से इनकी एक बड़ी आबादी को भारत जाकर शरण लेनी पड़ी थी।

बांग्लादेश में सड़कों पर उतरकर विरोध जता रहा है हिंदू समाज
बांग्लादेश में 5 अगस्त को यहां की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़कर भारत जाने के बाद जिस तरह से हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्ट आ रही हैं, उसके बाद साहस दिखाकर हिंदू संगठनों ने भी सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है, ताकि दुनिया का ध्यान इस संकट की ओर भी खींचा जा सके। ढाका में भी हिंदू संगठनों की ओर से विशाल प्रदर्शनों के वीडियो सामने आ रहे हैं।

'हिंदू एकजुट रहे तभी हमारी आवाज सुनी जाएगी'
एक्स पर अपने एक वीडियो संदेश में इस्कॉन मंदिर के प्रवक्ता राधारमण दास ने कहा है, 'बांग्लादेश के चिटगांव में एकसाथ 7 लाख हिंदुओं ने प्रदर्शन किया। पिछले चार दिनों में एक के बाद एक हिंसा की घटनाओं के बाद, बांग्लादेश में हिंदू प्रदर्शन कर रहे हैं.....मैंने यूनाइटेड नेशन को ई-मेल किया था और यूएन ने इसकी निंदा की है। अगर हिंदू एकजुट रहे तभी हमारी आवाज सुनी जाएगी।'

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