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iPhone: भारत में Apple का रिकॉर्ड कारोबार, $10 अरब से ज्यादा के बिके आईफोन्स, दुनिया की नई फैक्ट्री बनेंगे हम?

iPhone exports: भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में एक प्रमुख खिलाड़ी बनाने के मोदी सरकार ने कई तरह की योजनाओं को लागू किया है और उन योजनाओं का जबरदस्त असर दिखने लगा है। इस कोशिशों में सबसे बड़ा नाम जो सामने आता है, वो है एप्पल का, जिसका कारोबार में भारत में दोगुना से ज्यादा हो गया है।

iPhone बनाने वाली कंपनी एप्पल, जो अभी तक अपने प्रोडक्शन के लिए पूरी तरह से चीन पर निर्भर थी, उसने अपने मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का एक बड़ा आधार भारत में ट्रांसफर कर लिया है और अब उसके कारोबार को लेकर जो रिपोर्ट आई है, उसने भारत के बाजार को लेकर दुनियाभर की कंपनियों को उत्साह से भर दिया है।

iPhone exports double to 10 billion

एप्पल का रिकॉर्ड कारोबार

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने 2023-24 में लगभग 15 अरब डॉलर के स्मार्टफोन का निर्यात किया है, जिसमें iPhones का योगदान 65 प्रतिशत या लगभग 10 बिलियन डॉलर का है, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 5 अरब डॉलर से ज्यादा है।

जबकि दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉन्ट्रेक्ट मैन्युफैक्चरर, ताइवान की फॉक्सकॉन, भारत में iPhones असेंबल करने का काम करती है। वहीं, पहली बार एक भारतीय कंपनी, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने भी iPhones असेंबल करने का कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है।

एप्पल भारत में अपने असेंबली कारखानों में एक प्रमुख नौकरी देने वाली कंपनी भी बन गई है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा महिलाओं का है।

द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में भारत के केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, कि "Apple वर्तमान में सीधे तौर पर 1.5 लाख लोगों को रोजगार देता है और आगे चलकर यह संख्या काफी बढ़ जाएगी।" आईटी मंत्रालय के अधिकारियों का अनुमान है, कि अगले तीन सालों में सप्लाई चेन का पारिस्थितिकी तंत्र इतना विस्तारित हो जाएगा, कि लगभग 5 लाख व्यक्तियों को रोजगार मिलेगा।

एप्पल से दुनिया को संदेश

एप्पल कंपनी ने भारत में जिस तरह का विस्तार हासिल किया है, उसने दुनियाभर की कंपनियों को उम्मीदों से भर दिया है, खासकर उन कंपनियों को, जो भारत में फैक्ट्री लगाने से हिचकिचाती रही हैं।

एप्पल कंपनी के विस्तार ने इसके कई विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को भी भारत में अपनी दुकानें लगाने के लिए उत्साहित किया है। अश्विनी वैष्णव ने कहा, कि "कंपोनेंट सप्लाई चेन इको सिस्टम में हर प्रमुख इकाई, चाहे वह कैमरा मॉड्यूल हो, कम्युनिकेशन हो, बिजली आपूर्ति या डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग के लिए हो, सक्रिय रूप से भारत में एक आधार स्थापित करना चाह रही है।"

एप्पल जैसी कंपनी का विस्तार ऑटोमेटिक उन क्षेत्रों में एक इको सिस्टम का निर्माण करता है और एक बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करता है, जिसे ऐसे समझा जा सकता है, कि जब इंफोसिस ने अपनी कंपनी बंगलुरू में खोली थी, उस वक्त बंगलुरू कैसा था और अब कैसा है।

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से करीब 40 किमी दूर एप्पल का मुख्य मैन्युफैक्चरिंग आधार श्रीपेरंबुदूर में है, जहां फॉक्सकॉन के दो बड़े आईफोन असेंबली प्लांट हैं। यहां पर दो विशाल शयनगृह बनाए गये हैं, मुख्य रूप से महिला श्रमिकों के लिए। इस जहग का इको सिस्टम धीरे धीरे चीन के आईफोन शहर, झेंग्झौ की तर्ज पर विकसित होना शुरू हो चुका है।

ब्लूमबर्ग के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 24 में वैश्विक स्तर पर बिकने वाले सात में से एक iPhone भारत में बना था। सरकार को उम्मीद है, कि 2028 तक सभी iPhone का एक चौथाई हिस्सा भारत में बनाया जाएगा और इसके कुछ सहायक उपकरण, जैसे AirPods भी देश में असेंबल किए जाएंगे। अगले दो-तीन वर्षों में Apple भारत में अपने iPhone उत्पादन को प्रति वर्ष 5 करोड़ यूनिट से ज्यादा तक बढ़ाना चाहता है।

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एप्पल के सामने अभी भी क्या चुनौतियां हैं?

भारत में नई iPhone इकाई की दक्षता अभी भी चीन में कारखानों के साथ मेल नहीं खा पा रही है। विदेशों से संचालित होने वाली कंपनियों के प्रति नई दिल्ली का प्रतिकूल रुख और कंपोनेंट एक्सपोर्ट के लिए हाई टैरिफ दरें भी भारत में आधार बनाने की योजना बना रहे Apple के आपूर्तिकर्ताओं के सामने आने वाली बाधाएं हैं।

यानि, दूसरे देशों में बने एप्पल के कंपोनेंट जब भारत मंगाए जाते हैं, तो उसके ऊपर आयात शुल्क काफी होता है, जिससे भारत में बने आईफोन की कीमत ज्यादा हो जाती है।

इसके पीछे भारत सरकार की ये सोच है, कि हर कंपनी भारत में आकर कंपनी लगाए और अगर कोई कंपनी, किसी और देश में सामान बनाकर भारत में बेचना चाहती है, तो फिर उसके लिए आयात शुल्क चुकाए।

2023 के लिए Apple की सप्लायर लिस्ट के मुताबिक, मुख्य भूमि चीन में लगभग 157 कॉन्ट्रेक्टर नये बने थे, जो पिछले वर्ष 151 से ज्यादा है। लेकिन, भारतीय सप्लायर्स की संख्या अभी भी 14 पर स्थिर बनी हुई है, जो भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में तकनीकी दिग्गजों की बढ़ती उपस्थिति को चीन पर कम निर्भरता में तब्दील करने में अब तक सीमित सफलता का संकेत देती है।

लेकिन, स्मार्टफोन प्रोडक्शन के लिए भारत सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (PLI) योजना के तहत सरकारी सब्सिडी, अमेरिका और चीन के बीच बिगड़ते रिश्ते और बीजिंग के सख्त कोविड -19 प्रतिबंधों ने ऐप्पल को आईफोन असेंबली का एक सम्मानजनक हिस्सा भारत में ट्रांसफर करने के लिए प्रेरित किया है।

एप्पल जैसी कंपनी आने से कैसे बढ़ता है रोजगार?

ऐप्पल के कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर फॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन और विस्ट्रॉन (जिसे पिछले साल अक्टूबर में टाटा ने अधिग्रहित किया था) वो PLI योजना के तहत भारत सरकार से भुगतान हासिल करने के लिए आवश्यक बिक्री और निवेश सीमा को पूरा करने में कामयाब रहे हैं।

हालांकि, सरकार व्यक्तिगत संस्थाओं के लिए भुगतान का विवरण साझा नहीं करती है, लेकिन यह समझा जाता है, कि सैमसंग और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता डिक्सन के साथ तीन एप्पल असेंबलरों को अपने FY23 पीएलआई लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 4,500 करोड़ रुपये से ज्यादा की इंसेटिव मिली होगी।

फॉक्सकॉन, जिसके पास भारत में सबसे बड़ा iPhone असेंबली ऑपरेशन की जिम्मेदारी है, उसने वर्तमान में तमिलनाडु में अपने संयंत्रों में 40,000 से ज्यादा लोगों को काम पर रखा है। पेगाट्रॉन का ऑपरेशन फिलहाल अपेक्षाकृत छोटा है और इसमें लगभग 10,000 कर्मचारी कार्यरत हैं। वहीं, टाटा ने जो हाल ही में कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है, उसके विंस्ट्रॉन प्लांट में 27,000 लोग काम कर रहे हैं।

Apple के विस्तार ने भारत में फोन असेंबल करने में Google जैसी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। वहीं, भारत में भी ऐसी घरेलू कंपनियां का उदय होना शुरू हुआ है, जो ऐसी कंपनियों से कंपोनेंट निर्माण के लिए कॉन्ट्रैक्ट हासिल करना चाहते हैं।

टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, डिक्सन, वीवीडीएन और कायन्स ने विदेशी स्मार्टफोन निर्माताओं के सर्विस असेंबली ऑर्डर के लिए कदम बढ़ाए हैं। भारत में असेंबली ऑपरेशन की इस सीरिज में भारी संख्या में काम करने के लिए लोगों की जरूरत होती है, जिससे रोजगार में इजाफा होता है।

हालांकि, कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंक थोड़ा मुश्किल काम होता है और इसमें हाई क्वालिटी वर्कर्स की जरूरत होती है। इसमें ऐसे लोगों की जरूरत होती है, तो सटीक काम कर सकें। हालांकि, भारत ने पिछले कुछ सालों में कुशल लोगों का एक वर्क तैयार किया है, लेकिन अभी इसमें काफी सुधार की जरूरत है।

कंपोनेंट्स बनाने वाली 11 कंपनियों ने बनाया भारत में बेस

फॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन और टाटा के अलावा जो आईफोन असेंबल करते हैं, 11 अन्य कंपनियां हैं, जिन्होंने फोन बनाने के लिए आवश्यक अलग अलग कंपोनेंट्स की आपूर्ति के लिए भारत में आधार स्थापित किए हैं।

आंध्र प्रदेश स्थित ताइवान की चेंग उई प्रिसिजन इंडस्ट्री कंपनी लिमिटेड की सहायक कंपनी फॉक्सलिंक आईफोन चार्जर के लिए केबल बनाती है। Apple अमेरिका स्थित फ्लेक्स लिमिटेड से बैटरी पैक हासिल करता है, जिसकी पुणे, चेन्नई और बेंगलुरु में फैक्ट्रियां हैं।

चीन स्थित सनवोडा इलेक्ट्रॉनिक कंपनी लिमिटेड का प्लांटर उत्तर प्रदेश में है और ये भी एप्पल को बैटरी मुहैया कराता है। जाबिल, जिसका प्लांट पुणे में है, वो एयरपॉड्स के लिए प्लास्टिक केसिंग और एनक्लोजर बनाता है, जिन्हें चीन और वियतनाम भी भेजा जाता है, जहां अंततः ईयरफोन को असेंबल किया जाता है। Apple अपने चार्जर चीन स्थित Lingyi iTech (गुआंगडोंग) कंपनी से लेता है, जिसका प्लांट चेन्नई में है।

क्या भारत को इंपोर्ट ड्यूटी घटाने की जरूरत है?

हालांकि, कुछ विदेशी कंपनियों ने भारत में कंपोनेंट्स के निर्माण शुरू कर दिए हैं, लेकिन यह संख्या, चीन में एप्पल के आपूर्तिकर्ताओं की तुलना में बहुत कम है। उद्योग जगत का मानना है, कि भारत को आयात शुल्क के मोर्चे पर अपना कदम ठीक करने की जरूरत है।

इस साल की शुरुआत में, इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन ने एक रिपोर्ट में कहा है, कि भारत में स्मार्टफोन कंपोनेंट्स के लिए सबसे ज्यादा टैरिफ लाइनें हैं। भारत में औसत मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) टैरिफ 8.5 प्रतिशत है, जो चीन के 3.7 प्रतिशत से काफी ज्यादा है।

हाई टैरिफ, आम तौर पर घरेलू उद्योग को प्राथमिकता देने के लिए लगाए जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों ने तर्क दिया है, कि स्थानीय उद्योग की गैरमौजूदगी में - जैसा कि भारत में कंपोनेंट्स निर्माताओं के मामले में है - ऐसी उच्च कर दरें देश में कंपनियों के लिए निवेश में बाधा बनती हैं। आईटी मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा है, कि सरकार इन चिंताओं से वाकिफ है और मंत्रालय कई घटकों के लिए टैरिफ दरों को कम करने या हटाने के लिए वाणिज्य मंत्रालय के साथ काम कर रहा है।

अधिकारी ने माना, कि "वैश्विक स्तर पर 2-4 तरह के टैक्स हैं, इसलिए कंपोनेंट्स को लाना काफी आसान हो जाता है, लेकिन भारत में टैक्स क संख्या काफी ज्यादा हैं, जिसे आसान करने के लिए भारत सरकार कई तरह के कदम उठाने जा रही है, ताकि कंपनियों को भारत में आने और प्लांट लगाने से पहले कंपोनेंट्स के आयात के बारे में सोचना ना पड़े।

हालांकि, इसके पीछे भारत सरकार की एक सोच ये भी है, कि भारतीय कंपनियों का विकास हो सके और भारत की कंपनियां कंपोनेंट्स का निर्माण कर सके, लेकिन ट्रेड एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अगर आप विदेशी सप्लायर्स को भारत में लाना चाहते हैं, तो फिर आपको टैरिफ शुल्क में मिश्रण करने की जरूरत होगी।

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