पूर्व उपराष्ट्रपति सालेह ने बताया- तालिबान के कब्जा करने से पहले 15 अगस्त को काबुल में क्या हुआ था?

काबुल ,सितंबर 04: तालिबान ने अफगानिस्तान के अधिकतर इलाकों पर भले ही कब्जा कर लिया है, लेकिन पंजशीर प्रांत अभी भी उसकी पहुंच से बाहर है। इसकी सबसे अहम वजह अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह हैं। अमरुल्ला सालेह पंजशीर में रेजिस्टेंस फोर्स का नेतृत्व कर रहे हैं। 15 अगस्त को काबुल के पतन के बाद के दिनों में क्या हुआ? अमरुल्ला सालेह ने यह डेली मेल के लिए विस्तृत तौर पर लिखा है।

 Amrullah Saleh written a detailed what happened in days leading to fall of Kabul on August 15

अमरुल्ला सालेह ने लिखा, अफगानिस्तान का पतन न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए बल्कि पूरी पश्चिमी सभ्यता के लिए शर्मनाक है क्योंकि हर कोई जानता है कि पाकिस्तान शो चला रहा है। उन्होंने दोहराया कि वह तालिबान के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे और उनके सुरक्षा गार्ड ने उन्हें दो बार सिर में गोली मारने की शपथ दिलाई है, क्योंकि वह तालिबान के सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे।

यह बायन ऐसे समय आया है जब तालिबान ने दावा किया है कि उन्होंने पंजशीर प्रांत पर कब्जा कर लिया है, जो देश का एकमात्र तालिबान मुक्त प्रांत है। घाटी में अभी भी जारी भीषण संघर्ष में मौत से बचने के लिए पंजशीर के निवासी अपने घरों से भाग रहे हैं और तालिबान शासित अन्य प्रांतों को चुन रहे हैं। सालेह ने आगे कहा कि, तालिबान के प्रवक्ता को हर घंटे पाकिस्तानी दूतावास से निर्देश मिलते हैं। यह पाकिस्तानी हैं जो एक औपनिवेशिक शक्ति के रूप में नियंत्रण में हैं।

सालेह ने आगे लिखा कि, तालिबान का उदय के पाकिस्तान के मजबूत समर्थन के चलते हुआ था। जिसका जिक्र पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अपने आखिरी फोन कॉल के दौरान किया था। सालेह ने लिखा था कि तालिबान पाकिस्तान दूतावास से निर्देश प्राप्त कर रहे थे। तालिबान के प्रवक्ता को पाकिस्तानी दूतावास से हर घंटे निर्देश मिलते हैं... पश्चिम द्वारा अफगानिस्तान के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया गया है। आपके राजनेता जानते हैं कि पाकिस्तान शो चला रहा है। वे जानते हैं कि अल कायदा वापस सड़कों पर है। तालिबान में सुधार नहीं हुआ है। वे काबुल में अपने आत्मघाती जैकेट प्रदर्शित कर रहे हैं

सालेह ने बताया कि, काबुल पर तालिबान का कब्जा होने से एक रात पहले जेल के अंदर विद्रोह हुआ था और तालिबानी कैदी भागने की कोशिश कर रहे थे। तत्कालीन उपराष्ट्रपति को सूचित किया गया था। उन्होंने गैर-तालिबान कैदियों से संपर्क करने की कोशिश की और जवाबी विद्रोह का सामना किया। अगले दिन अमरुल्ला सालेह सुबह 8 बजे उठे, परिवार, दोस्तों के कई कॉल आए। उन्होंने कहा कि उन्होंने रक्षा मंत्री और आंतरिक मंत्री और उनके डिप्टी से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

उन्होंने आगे बताया कि, काबुल के पुलिस प्रमुख ने उन्हे सूचित किया कि वह एक घंटे तक मोर्चा संभाल सकते हैं। सालेह ने लिखा, लेकिन उस एक हताश घंटे में, मुझे शहर में कहीं भी अफगान सैनिक नहीं मिले। मैंने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को यह कहने के लिए मैसेज किया कि हमें कुछ करना है। मुझे किसी से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। और 15 अगस्त की सुबह 8 बजे तक काबुल में घबराहट का माहौल था।

जैसे ही तालिबान ने काबुल पर अपनी पकड़ मजबूत की, सालेह ने अहमद मसूद को संदेश भेजा जो काबुल में ही थे। सालेह ने लिखा, मैंने फिर अपने घर में जाकर अपनी पत्नी और बेटियों की तस्वीरें नष्ट कर दीं। मैंने अपना कंप्यूटर और कुछ सामान इकट्ठा किया। मैं तालिबान के सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहता। सालेह ने बताया, मुझे भी काबुल के पतन से पहलेभागने की पेशकश की गई थी। लेकिन उन्होंने उन राजनेताओं में से एक होने से इनकार कर दिया जो 'लोगों को धोखा देते हैं' और फिर विदेशों में पॉश होटलों से एक ट्विटर या फेसबुक पोस्ट करते हैं।

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