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America Vs China: चीन से युद्ध की तैयारी में जुटा अमेरिका? दूसरे विश्वयुद्ध के एयरबेस किए दोबारा एक्टिव

America Vs China: प्रशांत महासागर के दूर-दराज़ द्वीपों पर अमेरिका एक ऐसी सैन्य तैयारी में जुटा है, जिसकी जड़ें सीधे द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी हैं। 70-80 साल पुराने हवाई अड्डों को दोबारा ज़िंदा किया जा रहा है। वजह साफ है-चीन के साथ बढ़ती सैन्य टकराव की आशंका। अमेरिका अब यह मानकर चल रहा है कि भविष्य की जंग लंबी दूरी की मिसाइलों और एयर पावर पर टिकी होगी।

WWII के रनवे फिर से क्यों ज़रूरी हो गए?

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इन्हीं द्वीपों से अमेरिका ने जापान के खिलाफ "आइलैंड हॉपिंग" रणनीति अपनाई थी। अब वही मॉडल चीन के संदर्भ में फिर से उपयोग में लाया जा रहा है। नए एयरबेस बनाना बेहद महंगा है, इसलिए पुराने रनवे को दोबारा उपयोग में लाना एक किफायती और तेज़ समाधान माना जा रहा है।

America Vs China

ACE रणनीति क्या है?

इस पूरी योजना की रीढ़ है Agile Combat Employment (ACE)। इसका मतलब है- बड़े एयरबेस पर निर्भरता कम करना, लड़ाकू विमानों को छोटे, बिखरे हुए ठिकानों से उड़ाना और दुश्मन के लिए सभी ठिकानों को एक साथ निशाना बनाना मुश्किल बनाना होगा।अमेरिकी वायु सेना के मुताबिक, ACE भविष्य की हवाई जंग का आधार है।

गुआम और ओकिनावा अब सुरक्षित नहीं?

अमेरिका का पारंपरिक हवाई गलियारा, हवाई से गुआम और ओकिनावा से होकर गुजरता है। लेकिन चीन की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें अब इन ठिकानों को सीधे खतरे में डाल चुकी हैं। दिसंबर में पेंटागन की रिपोर्ट ने बताया कि चीन की Rocket Force के पास बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। जबकि गुआम और ओकिनावा पर मिसाइल डिफेंस सीमित है। लिहाजा हवाई तक भी हमले का खतरा बढ़ चुका है।

ज्यादा एयरबेस = चीन के लिए ज्यादा टारगेट

अमेरिका की सोच साफ है- अगर 5 बेस होंगे तो चीन आसानी से निशाना बना सकता है। अगर 50 बेस होंगे, तो चीन को ज्यादा मिसाइलें, ज्यादा समय और बड़ी रणनीति बनाना पड़ेगी जिसका फायदा युद्ध के दौरान अमेरिका को मिलेगा।

युद्ध से पहले ही तैयारी क्यों?

अमेरिका अब "Fight starts before war" वाली रणनीति पर काम कर रहा है। मतलब हथियार पहले से तैनात, ईंधन स्टोरेज तैयार, रनवे पहले से मजबूत, 3D प्रिंटिंग से विमान मरम्मत की सुविधा तक सब मुहैया कराएगा। ताकि युद्ध शुरू होते ही ऑपरेशन रुके नहीं।

नॉर्थ फील्ड: WWII का दैत्य फिर जाग रहा

उत्तरी मारियाना द्वीप के टिनियन द्वीप पर स्थित North Field इस रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। 1945 में यह दुनिया का सबसे बड़ा एयरबेस था। जिस पर 4 रनवे, 230+ B-29 बमवर्षक। खास बात ये है कि यहीं से जापान पर हमले हुए। जिसेे अब 80 साल बाद इसे फिर से बनाया जा रहा है।

2027 क्यों है अहम साल?

अमेरिकी अधिकारियों का आकलन है कि 2027 तक ताइवान को लेकर चीन की सैन्य कार्रवाई की संभावना सबसे ज्यादा है। इसीलिए North Field को 2027 तक पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने का लक्ष्य रखा गया है। नॉर्थ फील्ड को ऐसे डिजाइन किया जा रहा है कि वहां F-35 जैसे 5th Gen फाइटर, भारी कार्गो विमान मानवरहित लड़ाकू ड्रोन आसानी से ऑपरेट कर सकें।

नॉर्थवेस्ट फील्ड और टिनियन एयरपोर्ट

गुआम में North West Field को दो 8,000 फुट रनवे के साथ तैयार किया गया जिस पर 27 बड़े विमानों की पार्किंग और नए हथियारों का बंकर है। टिनियन इंटरनेशनल एयरपोर्ट को बैक-अप एयरबेस बनाया जा रहा है। इसके अलावा Yap Island के रनवे अपग्रेड किया जाएगा और Palau के WWII एयरस्ट्रिप का नवीनीकरण होगा ताकि रडार सिस्टम जो चीनी मिसाइलों को पहले पकड़ सके। ये सभी द्वीप Second Island Chain का हिस्सा हैं।

फिलीपींस बना फॉरवर्ड लॉन्च पैड

फिलीपींस में जिन बेस का विस्तार हो रहा है उनमें Clark, Subic Bay, Basa, Mactan जैसे बेस शामिल हैं। यहां युद्ध-क्षतिग्रस्त विमानों की मरम्मत भी की जाएगी। भारत, जापान और सिंगापुर भी इस नेटवर्क से जोड़े जा रहे हैं।

अलास्का: उत्तरी रास्ता खुला

अलास्का को भी ACE नेटवर्क में जोड़ा गया है जिसमें Elmendorf बेस का रनवे 10,000 फीट की गई है और Eielson में 54 F-35 तैनाती की गई है। इसके अलावा Cold Bay और King Salmon WWII एयरफील्ड फिर एक्टिव होंगे। यह रास्ता चीन को उत्तर से घेरने में मदद करेगा।

जापान में Atsugi और Yokota का विस्तार

जापान में युद्ध सामग्री पहले से स्टोर की गई है। इसके अलावा कैरियर-आधारित विमानों के लिए सपोर्ट RED HORSE और Seabees के जरिए बनाए जा रहे हैं।

चीन की प्रतिक्रिया: Cold War Mentality

बीजिंग ने आरोप लगाया कि- "अमेरिका चीन खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।" चीन का कहना है कि- सैन्य शक्ति प्रदर्शन से शांति नहीं आती और Asia-Pacific युद्ध का मैदान नहीं है। चीन के इस बयान पर पलटवार करते हुए अमेरिका ने कहा कि "तैयारी जितनी मजबूत होगी, युद्ध की संभावना उतनी कम होगी।"

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमे कमेंट में बताएं।

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