भारत के साथ संबंधों को लेकर अमेरिका ने दिया बड़ा बयान, अब पहले जैसे नहीं रहे रिश्ते
वॉशिंगटन, 23 मार्च। यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध के ऐलान के बाद से ही तमाम पश्चिमी देश रूस पर अलग-अलग तरह के आर्थिक प्रबंध लगा चुके हैं, तमाम कंपनियों ने रूस में अपना बिजनेस बंद कर दिया है। युनाइटेड नेसंश में भी रूस को अलग-थलग करने की कोशिश जारी है। लेकिन इन तमाम सियासी उठापटक के बीच भारत ने इस पूरे मुद्दे पर तटस्थ रुख अख्तियार कर रखा है। भारत के इस रूख से अमेरिका ने नाराजगी भी जाहिर की है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि अमेरिका के लिए भारत अब अलग-अलग मुद्दों पर पसंद का साथी है।

भारत पसंद का साथी
नेड प्राइस ने कहा कि साझा हितों की बात आती है तो अमेरिका भारत का सहयोगी है, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं, अब अमेरिका के लिए भारत पसंद का साथी है। गौर करने वाली बात है कि इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी रूस को लेकर भारत के रुख पर बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए लेकिन भारत का इस पूरे मामले में रूख काफी हद तक अस्थिर रहा है। बाइडेन ने कहा कि क्वाड में जापान और ऑस्ट्रेलिया ने राष्ट्रपति पुतिन के खिलाफ आक्रमणकारी रवैया दिखाया और उनका रुख काफी सख्त रहा। लेकिन भारत एक अपवाद के रूप में रहा और उसका इस पूरे मुद्दे पर ढुलमुल रवैया रहा है।

ऑस्ट्रेलिया के बयान के बाद कही ये बात
नेड प्राइस ने कहा कि जब स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक की बात आती है तो हमने इस क्षेत्र में साझा रुप से रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में काफी कुछ निवेश किया है। लिहाजा ऐतिहासिक संबंधों की बात करें तो भारत के साथ अब हम पसंद के साथी हैं जैसा कि हमारा रिस्था दुनिया के कई अन्य कई देशों के साथ है। क्वाड की बात करें तो भारत इसका अहम साथी है, क्वाड में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को स्वतंत्र रखना और खुला रखना ही इसकी नीति का केंद्र है। अमेरिका का यह बयान ऐसे समय आया जब क्वाड के सदस्य ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन ने कहा था कि रूस के परिपेक्ष्य में भारत की स्थिति को हम समझते हैं।

भारत की नीति पर सवाल
यूक्रेन-रूस के बीच तनाव के बीच जिस तरह से भारत ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए तटस्थता की नीति को अपनाई है उसको लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। पहला सवाल यह कि क्या नैतिक रूप से भारत को यूक्रेन के खिलाफ रूस की सैन्य कार्रवाई की आलोचना नहीं करनी चाहिए, वो भी तब जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और खुद चीन की उपनिवेशिक नीति का शिकार है।

देश का हित सर्वोपरि
लेकिन यहां अहम बात यह है कि भारत रूस का काफी पुराना साथी है और रक्षा के साथ व्यापार के क्षेत्र में भी दोनों देश अहम सहयोगी हैं। तकरीबन 70 फीसदी रक्षा उपकरण भारत रूस से आयात करता है, यही नहीं कई अन्य क्षेत्रों में भी भारत के लिए रूस महत्वपूर्ण सहयोगी है। लिहाजा भारत के लिए रूस का विरोध करना उसके व्यक्तिगत हितों के खिलाफ जा सकता है। ऐसे में कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव की स्थिति में सबसे पहले अपने हितों का खयाल रखता है।












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