Adani Case Explained: भारत में रिश्वत, US में कार्रवाई, केन्या में कॉन्ट्रैक्ट रद्द, अडानी से अमेरिका का बदला?

Adani Case: न्यूयॉर्क में अमेरिकी प्रॉसीक्यूटर्स ने अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी और सात अन्य लोगों पर भारत में बिजली आपूर्ति कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को 250 मिलियन डॉलर से ज्यादा की रिश्वत देने की योजना बनाने का आरोप लगाया है।

साथ ही, अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने भी गौतम अडानी, उनके भांजे और अडानी ग्रीन एनर्जी के वरिष्ठ कार्यकारी सागर अडानी और एज्योर पावर के सिरिल सेबेस्टियन डोमिनिक कैबनेस- जो एक फ्रांसीसी नागरिक हैं, उनके खिलाफ जूरी ट्रायल और सजा की मांग करते हुए अदालत का रुख किया है।

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लिहाजा, सवाल उठ रहे हैं, कि अगर अडानी के खिलाफ भारत में आरोप लगे हैं, तो फिर अमेरिका में कार्रवाई क्यों की गई है, क्या ये कोई बड़ी साजिश है, क्या भारतीय कारोबारियों को 'नापने' का ये नया तरीका है, और मुख्य सवाल यह है, कि अमेरिकी अधिकारी भारत में हजारों मील दूर एक कथित रिश्वतखोरी योजना में इतनी गहरी दिलचस्पी और कार्रवाई क्यों कर रहे हैं?

एक्सपर्ट आखिर क्या कह रहे हैं, आइये समझते हैं।

SEC शिकायतों और अभियोग में बताए गए कारण मुख्य रूप से कंपनियों की गतिविधियों और अमेरिका में मौजूदगी और उनमें अमेरिकी निवेशकों का शामिल होना है। यानि, प्रॉसीक्यूटर्स का कहना है, कि अमेरिकी निवेशकों के निवेश से अडानी ने भारतीय अधिकारियों को रिश्वत दिए हैं और उनका कहना है, कि अमेरिका का कानून, किसी भी कारोबारी को अमेरिकी पैसों का इस्तेमाल रिश्वत देने के लिए करने की इजाजत नहीं देता है।

अडानी समूह के साथ संबंध मुख्य रूप से 2021 में अडानी ग्रीन कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने से संबंधित है, जिसमें अमेरिकी निवेशक शामिल थे। जहां तक Azure का सवाल है, भले ही यह मुख्य रूप से एक सहायक कंपनी के माध्यम से भारत में कारोबार करता था, लेकिन इसकी सिक्योरिटीज (प्रतिभूतियों) न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) में लिस्टेड थीं।

अमेरिका का कानून क्या कहता है, समझिए

अमेरिकी कानून, मुख्य रूप से विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम (FCPA), कुछ वर्गों के व्यक्तियों और संस्थाओं को व्यवसाय प्राप्त करने या बनाए रखने वाले विदेशी सरकारी अधिकारियों को भुगतान करने से रोकता है। दूसरे शब्दों में, ऐसे व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए दूसरे देशों के सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देना, देने का वादा करना या देना गैरकानूनी है। व्यक्तियों और संस्थाओं के इन वर्गों में अमेरिका में प्रतिभूतियों के कुछ विदेशी जारीकर्ता और वे कंपनियां शामिल हैं, जिनके शेयर अमेरिकी शेयर बाजारों में सार्वजनिक रूप से कारोबार किए जाते हैं।

SEC का कहना है, कि इसकी शिकायतों में जिन लोगों के नाम हैं, उन्होंने रिश्वतखोरी योजना के बारे में एक-दूसरे से संवाद करने के लिए "(अमेरिकी) अंतरराज्यीय वाणिज्य के साधनों" का भी इस्तेमाल किया है। ईमेल, टेक्स्ट मैसेज या फैक्स जैसे विभिन्न तरीकों का उपयोग करके अमेरिका में या अमेरिका से संचार करना FCPA के अंदर अमेरिकी अंतरराज्यीय वाणिज्य के दायरे में आता है।

गौतम अडानी और सागर अडानी के खिलाफ अपनी शिकायत में, SEC ने आरोप लगाया है, कि सितंबर 2021 में अडानी ग्रीन ने अपने कॉरपोरेट बॉन्ड के खरीदारों को $750 मिलियन मूल्य के बारे में बताया - जिसमें यूएस में निवेशकों के लिए $175 मिलियन से ज्यादा शामिल हैं - कि कंपनी के किसी भी निदेशक या अधिकारी ने सरकारी अधिकारियों को रिश्वत नहीं दी या देने का वादा नहीं किया या उन अधिकारियों को अनुचित रूप से प्रभावित करने का प्रयास नहीं किया।

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SEC ने आरोप लगाया है, कि लेकिन यह सच नहीं है, और कहा है, कि इन अभ्यावेदनों को करने से पहले के महीनों और हफ्तों में, गौतम अडानी और सागर अडानी "भारतीय राज्य सरकार के अधिकारियों को सैकड़ों मिलियन डॉलर के बराबर रिश्वत देने या देने का वादा करने में व्यक्तिगत रूप से शामिल थे"।

इस बॉन्ड जारी करने के अलावा, अभियोग में कहा गया है, कि अडानी ग्रीन और उसकी शाखाओं ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और यूएस-आधारित निवेशकों वाले ऋणदाता समूहों से 2 अरब डॉलर से ज्याद के डॉलर-मूल्यवान ऋण जुटाए।

न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी ब्रियोन पीस ने अभियोग की घोषणा करते हुए कहा, कि "जैसा कि आरोप लगाया गया है, प्रतिवादियों ने अरबों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए, भारतीय सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए एक योजना बनाई थी और गौतम एस. अडानी, सागर आर. अडानी और विनीत एस. जैन (अडानी ग्रीन के प्रबंध निदेशक) ने रिश्वतखोरी के बारे में झूठ बोला, क्योंकि वे अमेरिकी और अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों से पूंजी जुटाना चाहते थे।"

कैबनेस के खिलाफ अपनी शिकायत में, अमेरिकी प्रतिभूति बाजार नियामक (SEC) ने फ्रांसीसी नागरिक पर अडानी समूह के साथ कथित रिश्वतखोरी योजना में शामिल होकर एफसीपीए का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है, जबकि वह एक ऐसी कंपनी के बोर्ड में कार्यरत था, जिसका स्टॉक अमेरिकी शेयर बाजार में लिस्टेट था। कैबनेस ने कंपनी के सबसे बड़े शेयरधारक- कनाडा स्थित पेंशन फंड कैस डे डेपोट एट प्लेसमेंट डु क्यूबेक (CDPQ) के प्रतिनिधि के रूप में एज़्योर पावर ग्लोबल के बोर्ड में डायरेक्टर के रूप में काम किया।

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अडानी के ऊपर सबसे सनसनीखेज आरोप क्या हैं?

एज़्योर मॉरीशस के कानूनों के तहत संगठित एक सीमित कंपनी है, जिसका मुख्य व्यवसाय भारत है। SEC का दावा है, कि कथित रिश्वतखोरी योजना 2020 से 2024 के बीच बनाई गई थी, और इस दौरान एज़्योर स्टॉक, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में कारोबार करता रहा। नवंबर 2023 में इसे "आयोग (SEC) के साथ रिपोर्ट दाखिल करने में नाकामी" के कारण डीलिस्ट कर दिया गया था।

अभियोग में आरोप लगाया गया है, कि 2020 और 2024 के बीच, "प्रतिवादियों ने आकर्षक सौर ऊर्जा आपूर्ति कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को 250 मिलियन डॉलर से ज्यादा की रिश्वत देने पर सहमति जताई थी", जिससे अरबों डॉलर का मुनाफा होने का अनुमान था।

न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी ऑफिस ने एक रिलीज में कहा है, कि "कई मौकों पर गौतम एस. अडानी ने रिश्वतखोरी योजना को आगे बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत रूप से एक भारतीय सरकारी अधिकारी से मुलाकात की और प्रतिवादियों ने रिश्वत देने की योजना बनाने के लिए एक-दूसरे के साथ व्यक्तिगत बैठकें कीं। प्रतिवादियों ने रिश्वतखोरी योजना को आगे बढ़ाने के अपने कोशिशों पर अक्सर चर्चा की, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक मैसेजिंग एप्लिकेशन के माध्यम से भी चर्चा की गई और प्रतिवादियों ने भ्रष्टाचार की इस कोशिशों को डॉक्यूमेंट भी किया था।"

आरोप लगाया गया है, कि कथित रिश्वतखोरी योजना में कथित तौर पर अडानी ग्रीन के अलावा एज़्योर भी शामिल था। एसईसी ने आरोप लगाया, कि दोनों कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भारत में राज्य सरकार के अधिकारियों पर दबाव बनाने और उन्हें रिश्वत देने की योजना बनाई, ताकि राज्य की बिजली वितरण कंपनियों को ज्यादा कीमतों पर सौर ऊर्जा खरीदने के लिए मजबूर किया जा सके। यह आरोप लगाया गया है, कि भुगतान की गई या वादा की गई रिश्वत में एज़्योर का हिस्सा एक तिहाई था, जबकि बाकी दो हिस्सा, अडानी का हिस्सा था।

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अभियोग में यह भी आरोप लगाया गया है, कि कैबनेस और एज़्योर और सीडीपीक्यू से संबंधित तीन अन्य लोगों ने कथित रिश्वतखोरी योजना में ग्रैंड जूरी, संघीय जांच ब्यूरो (FBI) और एसईसी की जांच में बाधा डालने की साजिश रची थी।

सबूतों को मिटाने की कोशिश करने का भी आरोप

न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय ने कहा है, कि "उन चार प्रतिवादियों ने रिश्वतखोरी योजना से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक सामग्रियों को मिटाने पर सहमति जताई थी, जिसमें ईमेल, इलेक्ट्रॉनिक मैसेज और रिश्वतखोरी को लेकर बातचीत शामिल हैं।"

भारतीय एक्सपर्ट्स ने उठाए सवाल

बाइडेन प्रशासन के दौरान गौतम अडानी की कंपनी के खिलाफ अमेरिका से आरोपों को बाढ़ सी आई है, जिसने भारत के इस दिग्गज कारोबारी के कारोबार को काफी नुकसान पहुंचाया है और अकसर, आरोपों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जोड़ा गया है।

भारत के प्रमुख जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने अमेरिका में अडानी के खिलाफ शुरू किए गये इस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, कि "कथित रिश्वतखोरी भारत में हुई, लेकिन अडानी और अन्य पर आरोप लगाते हुए अमेरिका अपने कानूनों के तहत क्षेत्राधिकार से बाहर का दावा कर रहा है, क्योंकि उन्होंने अमेरिकी निवेशकों से पूंजी जुटाई थी। निज्जर और पन्नून मामलों की तरह, ऐसा लगता है कि मोदी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।"

इसके अलावा, भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने लिखा है, कि "बांग्लादेश की तरह ही अमेरिका ने केन्या में भी भारत के हितों को झटका दिया है। परियोजनाओं को रद्द करने की घोषणा पर सांसदों की खुशी आश्चर्यजनक है। चीन के लिए एक बढ़त है।"

आपको बता दें, कि गौतम अडानी पर आरोप लगते ही केन्या की सरकार ने अडानी ग्रुप के साथ किए गये अपने तमाम सौदों को रद्द कर दिया है। केन्या के राष्ट्रपति ने खुद ये घोषणा की है, जिससे साफ पता चलता है, कि ये एक बड़े साजिश का हिस्सा है और सबसे खास बात ये है, कि जब केन्या के राष्ट्रपति डील को रद्द करने की घोषणा कर रहे थे, उस वक्त केन्या संसद के ज्यादातर सदस्य खड़े होकर तालियां बजा रहे थे।

केन्या की मौजूदा सरकार चीन समर्थक है और जाहिर तौर पर, अडानी ग्रुप के साथ डील रद्द होना भारत के लिए एक बड़ा झटका है।

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