1984 आधुनिक भारतीय इतिहास के 'सबसे काले' वर्षों में शामिल, 38 साल बाद अमेरिकी संसद में क्यों उठी ये बात ?
वाशिंगटन, 2 अक्टूबर: 1984 के सिख-विरोधी दंगों के जिम्मेदार लोगों को अभी तक पूरी तरह से जवाबदेह नहीं ठहराए जाने का मुद्दा अमेरिकी संसद में भी गूंज उठा है। एक अमेरिकी सांसद ने तो यहां तक का कहा है कि यदि भविष्य में दुनियाभर में कहीं भी, मानवाधिकारों का उल्लंघन रोकना है तो सबसे पहले 1984 का इतिहास मुड़कर देखना होगा और गुनहगारों को कानून के शिकंजे में लाकर उनके अंजाम तक पहुंचाना होगा। दरअसल, सिख समुदाय में सेवा की भावना और सर्वधर्म समभाव की जो उनकी विचारधारा है, उसका जिक्र करते हुए उनके साथ खड़े होने की बात की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

अमेरिकी संसद में उठा 1984 का मुद्दा
1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे भारत में भड़के सिख-विरोधी दंगे का मुद्दा 38 साल बाद अमेरिकी संसद में उठाया गया है। एक अमेरिकी सीनेटर ने सीनेट में उस घटना को आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे काले वर्षों में से एक बताया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सिखों पर हुए अत्याचार को याद रखने की आवश्यकता है, ताकि उसके लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठराया जा सके। सीनेट के फ्लोर पर दिए अपने अपने भाषण में सीनेटर पैट टूमे ने यह मुद्दा बहुत ही गंभीरता से उठाया है।

'1984 आधुनिक भारत के सबसे काले वर्षों में शामिल'
सीनेटर पैट टूमे ने कहा, '1984 आधुनिक भारत के सबसे काले वर्षों में शामिल है। विश्व ने देखा भारत में जातीय समूहों के बीच विभिन्न हिंसक घटनाएं भड़कीं, जिसमें कई बड़े चेहरे सिख समुदाय को निशाना बना रहे थे।' वो बोले- 'आज हम यहां उस त्रासदी को याद कर रहे हैं, जो दशकों तक पंजाब प्रांत के सिखों और भारत की केंद्र सरकार के बीचतनाव के बाद 1 नवंबर, 1984 को हुई थी।' पेंसिल्वेनिया के सीनेटर ने कहा कि अक्सर ऐसी घटनाओं में आधिकारिक अनुमान से पूरी कहानी बयां होने की संभावना नहीं रहती है। लेकिन, अनुमानों के मुताबिक पूरे भारत में भीड़ द्वारा 30,000 से अधिक सिख पुरुष, महिला और बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाया गया, बलात्कार किया, काट डाला और उन्हें विस्थापित कर दिया।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़की थी हिंसा
1984 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिखों के खिलाफ हिंसा भड़की या 'भड़काई' गई थी। दिल्ली के सिख सबसे ज्यादा हिंसक भीड़ के निशाने पर थे। इंदिरा गांधी को 31 अक्टूबर, 1984 को उनके सरकारी आवास में ही उनके सिख बॉडीकार्डों ने ही गोलियों से भून डाला था। इसके बाद देशभर में जो हिंसा भड़की उसमें 3,000 सिखों का कत्लेआम हो गया, लेकिन सिख-विरोधी दंगे का केंद्र राजधानी दिल्ली बन गई। हिंसा भड़काने में उस समय के कुछ दिग्गज कांग्रेस नेताओं का नाम भी आया।

'सिखों के खिलाफ हुए अत्याचारों को याद करना होगा'
अमेरिका सांसद ने अपने संसद के सामने दलील दी है कि 'भविष्य में मनावाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए हमें निश्चित तौर पर उसके पिछले स्वरूपों को समझना होगा। हमें निश्चित तौर पर सिखों के खिलाफ हुए अत्याचारों को याद करना होगा, ताकि उसके लिए जो जिम्मेदार थे, उन्हें जवाबदेह बनाया जाए और भविष्य में सिख समुदाय या किसी दूसरे समुदायों के खिलाफ दुनिया भर में इस तरह की त्रासदी दोहरायी नहीं जा सके। '

'अमेरिका में सिखों की 7,00,000 आबादी'
सीनेटर टूमे अमेरिकन सिख कांग्रेसनल कॉकस के सदस्य हैं। उनका कहना है कि सिख धर्म का इतिहास करीब 600 साल पुराना भारत के पंजाब क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इसके दुनिया भर में 3 करोड़ अनुयायी हैं और दुनिया के एक प्रमुख धर्म में शामिल इस धर्म के 7,00,000 लोग अमेरिका में हैं। उन्होंने हर धर्म के लोगों के प्रति सिखों के सेवा भाव की तारीफ करते हुए कहा, 'कोविड-19 महामारी के समय में पेन्सिलवेनिया समेत पूरे अमेरिका भर में सिख समुदाय हजारों परिवारों को ग्रोसरी का सामान, मास्क और अन्य चीजों की सप्लाई पहुंचाने एकजुट हो गया, चाहे उनकी जाति, लिंग, धर्म या मजहब कोई भी हो क्यों ना रहा हो।'

'समानता, सम्मान और शांति सिख धर्म की परंपरा'
अमेरिकी सांसद का कहना है कि उन्होंने निजी तौर पर सिखों की इस भावना को महसूस किया है और समानता, सम्मान और शांति के लिए सिख परंपरा को समझा है। उनके मुताबिक सिख समुदाय की मौजूदगी और उनके योगदानों ने देश भर में उनके पड़ोसियों को समुद्ध करने में सहायता की है। (इनपुट-पीटीआई) (तस्वीरें- फाइल)
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