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दुनिया के 1% अमीरों ने पृथ्वी पर कार्बन प्रदूषण में दोगुना योगदान कियाः ऑक्सफैम

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नई दिल्ली। एक नए शोध में हुए खुलासे में कहा गया है कि दुनिया की आधी आबादी यानी 310 करोड़ लोगों की तुलना में महज एक फीसदी सबसे अमीर लोग दोगुने से अधिक पृथ्वी पर कार्बन प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। यह खुलासा ऑक्सफैम द्वारा सोमवार को किए शोध ने प्रदर्शित किया गया है। वर्ष 1990 के बाद से सिर्फ 6.3 करोड़ लोग यानी एक फीसदी कार्बन बजट का नौ फीसदी का योगदान किया है।

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महामारी में कार्बन उत्सर्जन में कमी के बावजूद पृथ्वी कई डिग्री गर्म हुई

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दरअसल, कोरोना महामारी के कारण कार्बन उत्सर्जन में तेजी से कमी के बावजूद दुनिया इस सदी में कई डिग्री गर्म होने की स्थिति में है, जो गरीब और विकासशील देशों के लिए आसन्न प्राकृतिक आपदाओं और विस्थापन के खतरे का दिखाता है।

1990 और 2015 के बीच वार्षिक उत्सर्जन 60 फीसदी से अधिक हो गया था

1990 और 2015 के बीच वार्षिक उत्सर्जन 60 फीसदी से अधिक हो गया था

ऑक्सफैम के नेतृत्व में हुए विश्लेषण से पता चला है कि 1990 और 2015 के बीच, जब वार्षिक उत्सर्जन 60 फीसदी से अधिक हो गया था, तो समृद्ध राष्ट्र पृथ्वी के कार्बन बजट का लगभग एक तिहाई योगदान करने के लिए जिम्मेदार थे। कार्बन बजट संचयी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की सीमा है जो मानव जाति विनाशकारी प्रतिपादन से पहले उत्पादन कर सकता है और तब तापमान में वृद्धि अपरिहार्य हो जाती है।

1990 के बाद 1% लोगों ने CO2 बजट का 9 फीसदी का योगदान किया

1990 के बाद 1% लोगों ने CO2 बजट का 9 फीसदी का योगदान किया

स्टॉकहोम पर्यावरण संस्थान द्वारा ऑक्सफैम के लिए किए गए शोध में पाया गया कि वर्ष 1990 के बाद से सिर्फ 6.3 करोड़ लोग यानी एक फीसदी कार्बन बजट का नौ फीसदी का योगदान किया है। एक-चौड़े कार्बन असमानता पर प्रकाश डालते हुए विश्लेषण में कहा गया है कि एक फीसदी लोगों के कार्बन उत्सर्जन की वृद्धि दर दुनिया के आधे हिस्से के लोगों की तुलना में तीन गुना अधिक थी।

आर्थिक असमानता ही नहीं,यह गरीबी में कमी की दर को धीमा कर देती है

आर्थिक असमानता ही नहीं,यह गरीबी में कमी की दर को धीमा कर देती है

पॉलिसी, एडवोकेसी और रिसर्च प्रमुख टिम गोर ने कहा कि यह केवल समाज में विभाजनकारी चरम आर्थिक असमानता ही नहीं है, बल्कि यह गरीबी में कमी की दर को धीमा कर देती है, लेकिन एक तीसरा नुकसान यह भी है कि पहले से संपन्न लोंगों की बढ़ती हुई खपत के उद्देश्य कार्बन बजट को पूरी तरह से समाप्त कर देती है, इसका निश्चित रूप से सबसे बुरा असर सबसे गरीब और कम से कम जिम्मेदार लोगों पर पड़ता है।

पेरिस क्लाईमेट डील औद्योगिक लेबल को डिग्री नीचे प्रतिबद्ध करता है

पेरिस क्लाईमेट डील औद्योगिक लेबल को डिग्री नीचे प्रतिबद्ध करता है

वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने के लिए वर्ष 2015 का पेरिस क्लाईमेट डील देशों को पूर्व औद्योगिक लेबल को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे प्रतिबद्ध करता है, लेकिन तब से उत्सर्जन में वृद्धि जारी है और कई विश्लेषणों ने चेतावनी दी है कि हरित विकास को प्राथमिकता देने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था को फिर से अपनाए बिना कोविद -19 के कारण होने वाले प्रदूषण की बचत का जलवायु परिवर्तन पर महत्वहीन प्रभाव पड़ेगा।

 पृथ्वी पहले से ही अधिक सूखा, तूफान, जंगल में आग से जूझ रही है

पृथ्वी पहले से ही अधिक सूखा, तूफान, जंगल में आग से जूझ रही है

अब तक केवल 1 C वार्मिंग के साथ बढ़ते समुद्रों ने पृथ्वी पहले से ही अधिक और लगातार तीव्र सूखा, भयावह तूफान, जंगल में आग से जूझ रही है, उसे और अधिक शक्तिशाली बना दिया है। गोर ने कहा कि सरकारों को जलवायु परिवर्तन और असमानता की दोहरी चुनौतियों को किसी भी कोविद -19 रिकवरी की योजना के केंद्र में रखना चाहिए।

अत्यधिक असमान मॉडल ने सबसे गरीब आधी आबादी को लाभ नहीं दिया

अत्यधिक असमान मॉडल ने सबसे गरीब आधी आबादी को लाभ नहीं दिया

यह स्पष्ट है कि पिछले 20-30 वर्षों में आर्थिक विकास के गहन कार्बन उत्सर्जन और अत्यधिक असमान मॉडल ने दुनिया के सबसे गरीब आधी आबादी को लाभ नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि यह एक गलत द्वंद्व है कि हमें आर्थिक विकास और जलवायु संकट (फिक्सिंग) के बीच चयन करना है।

English summary
A new research reveals that just one per cent of the richest people are responsible for more than double the carbon pollution on Earth, compared to half of the world's population, ie 310 crore people. This disclosure has been demonstrated by research conducted by Oxfam on Monday.
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