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Indore News: उद्योगों की गंदगी ने 'कान्ह-सरस्वती' को किया बदहाल, करोड़ों की योजना पर फिरा पानी

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर है, जहां इंदौर लगातार स्वच्छता सर्वेक्षण में सात बार से नंबर वन आ रहा है। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के बीचों बीच बहने वाली कान्ह और सरस्वती नदी कई सालों से स्वच्छता की राह पर चलने का इंतजार कर रही है।

कान्ह और सरस्वती नदी पिछले कई सालों से औद्योगित गंदगी के साथ-साथ ड्रेनेज और सिवरेज के चलते गंदगी का शिकार हो रही है। प्राचीन समय में स्वच्छ और निर्मल नदी अब पूरी तरह से गंदी हो चुकी है, जहां इस नदी को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए अब तक हजारों करोड़ रुपए फूंक दिए गए हैं। बावजूद इसके नदी स्वच्छ और सुंदर नहीं हुई, बल्कि वक्त के साथ ये और गंदी हो चुकी है।

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कान्ह और सरस्वती का संबंध सीधे गंगा नदी से है, क्योंकी, इस नदी का जुड़ाव सीधे क्षिप्रा से है, और क्षिप्रा का जुड़ाव चंबल से है। वहीं चंबल जाकर यमुना में मिलती है, और यमुना जाकर गंगा में मिलती है। यही कारण है कि, निर्मल गंगा अभियान के तहत भी कान्हा और सरस्वती नदी को स्वच्छ करने की प्रयास किया जा चुके हैं, लेकिन बावजूद इसके हालात वैसे की वैसी ही हैं। कान्ह नदी के किनारे पर मंदिर बने हुए हैं, जहां मंदिर आने वाले श्रद्धालु भी गंदगी और बदबू से परेशान रहते हैं।

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कान्हा और सरस्वती नदी देव गुराडिया के आसपास स्थित पहाड़ों से निकलती है, जो इंदौर से सांवेर होती हुई उज्जैन के पास क्षिप्रा नदी में जाकर मिलती है। देव गुराडिया से निकलने के बाद यह नदी इंदौर पहुंचते ही प्रदूषित हो जाती है, जहां इंदौर से नदी में ड्रेनेज और सिवरेज के साथ-साथ औद्योगिक गंदगी मिल जाती है। वहीं इसके बाद जैसे ही नदी सांवेर पहुंचती है, यहां भी नदी में औद्योगिक गंदगी प्रवाहित कर दी जाती है, जिसके चलते यह नदी पूरी तरह से अब प्रदूषित हो चुकी है।

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कान्हा सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित मंदिर में दर्शन करने आने वाले ओम बागड़ी ने वन इंडिया हिंदी से खास बातचीत में बताया कि, कान्हा सरस्वती नदी इसका नाम है। कुछ दिन पहले इसका पानी साफ था, लगभग 40 साल पहले यह साफ हुआ करती थी। हम इस नदी में तैरना सीखे, और नहाते भी थे। नागरिकों का सहयोग चाहिए, बस इसीलिए सफाई नहीं हो पा रही, जो किनारे पर नागरिक रह रहे हैं, उनका सहयोग चाहिए। कान्हा नदी के नाम से इसका करोड़ों रुपया निकलता है, लेकिन नदी वैसे की वैसी ही आज तक साफ नहीं हुई।

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नदी किनारे पर स्थित मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्याम सिंह चौहान बताते हैं कि हम यह चाहते हैं की नदी की सफाई होना चाहिए नदी को स्वच्छ और सुंदर बनाया जाना चाहिए जैसा घाट यहां बना हुआ है एशिया में कहीं ऐसा घाट नहीं बना बाहर के लोग आते हैं यहां दर्शन करते हैं। पहले यहां बाहर के लोग आते थे, वह भी स्नान करते थे। हम भी यहां स्नान किया करते थे, लेकिन अब नदी पूरी तरह से गंदी हो चुकी है।

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सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी बताते हैं की, गंगा एक्शन प्लान का ब्रह्म वाक्य है, अविरल प्रवाह निर्मल गंगा, इस सिद्धांत पर कोई काम ही नहीं हुआ। नगर निगम को अब तक यह नहीं मालूम नदियां कितनी है। उप नदियां कितनी है, और सहायक नदियां कितनी है। वाटरशेड मैप पर अभी तक कभी भी प्लानिंग नहीं हुई। इंदौर में कान्ह नहीं है, सरस्वती बेसिन है। सरस्वती नदी नगर निगम सीमा से बाहर है। मास्टर प्लान के एरिया में जरूर है, अधिकतम इसमें इंदौर तहसील का इलाका है। नदी में जो काम हो रहा है। वह अंदाज से हो रहा है, और हवा में हो रहा है। इसी तरीके से काम हो रहा है, इसलिए आज भी हम जीरो पर खड़े हैं।

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सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोटवानी बताते हैं की, नदी को स्वच्छ करने में कितना पैसा लगा, इसका आकलन नहीं किया जा सकता। ना ही ये इसे कभी बताएंगे। स्मार्ट सिटी, सीवरेज जैसे अलग-अलग मद में साफ-सफाई के लिए खर्च किया गया है, लेकिन मोटे तौर पर देखा जाए तो अलग-अलग हेड में नदी को साफ करने के लिए लगभग 2000 करोड़ से ज्यादा का पैसा खर्च किया जा चुका है।

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MIC मेंबर राजेंद्र राठौर से जब नदी के मुद्दे पर बात की गई तो उन्होंने बताया कि, नगर निगम ने नदी में एसटीपी प्लांट लगाने का काम किया है। 12 से ज्यादा प्लांट लगाए नगर निगम की ओर से लगाए गए हैं। इस नदी को शुद्ध करने का काम लगातार किया जा रहा है, और भी काम जारी है। आने वाले समय में यह जरूर नदी का रूप लेगी, ऐसा हमारा विचार है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में कान्ह और सरस्वती नदी इंडस्ट्रियल वेस्ट और सिवरेज के चलते लगातार गंदी हो रही है, जहां इस नदी को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन, बावजूद इसके नदी स्वच्छ और सुंदर नहीं हो पा रही है। बहरहाल, अब इस नदी की तस्वीर कब तक बदलती है। ये आने वाला वक्त बताएगा।

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