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बिहार की तरह आसान नहीं होगा बंगाल जीतना, BJP के सामने आएगी ये चुनौती

नई दिल्ली- बिहार में मिली जीत के बाद पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा नेताओं का उत्साह चरम पर है। ऊपर से असदुद्दीन ओवैसी के वहां भी चुनाव लड़ने के ऐलान ने 27% मुस्लिम आबादी वाले राज्य में बीजेपी के मनोबल को और बढ़ा दिया है। भाजपा वहां ममता शासन को कुशासन साबित करने के लिए अपने कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्या को बड़ा मुद्दा बना रही है। बिहार की जीत के बाद दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में मनाए गए जश्न में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी ओर साफ संकेत दे दिया है। उन्होंने कहा है, 'चुनाव आते-जाते रहते हैं......लेकिन मौत के खेल से कोई मत नहीं पा सकेगा। ये दीवार पे लिखे हुए शब्द पढ़ लेना।'

Winning assembly election in West Bengal will not be as easy as Bihar, BJP will face this challenge

दरअसल, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट देखें तो 2019 में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्याएं ममता सरकार में हुई हैं। इसमें यह आंकड़ा 12 बताया गया है। हालांकि, भाजपा का आरोप है कि 2019 से टीएमसी के गुंडों ने उसके 250 कार्यकर्ताओं की हत्याएं कर दी हैं। दरअसल, जब भाजपा की कमान गृहमंत्री अमित शाह के हाथों में थी, तभी से बीजेपी वहां पर बहुत ही आक्रमकता के साथ राजनीतिक बदलाव के लिए संघर्ष कर रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका जबर्दस्त लाभ भी मिला है। इसके लिए पार्टी ने जमीन पर आधार मजबूत करने के लिए रथ यात्राएं निकालीं, मारे गए पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए 'सामूहिक तर्पण' और 'पिंड दान' जैसी धार्मिक परंपराओं का अनुष्ठान भी करवाया।

अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने वहां अपना ग्राफ किस कदर मजबूत किया है, यह इन आंकड़ों से जाहिर होता है- 2016 में 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल ने 44.9% वोट लेकर 211 सीटें जीता था। जबकि, भाजपा 10.2% वोट के साथ सिर्फ 3 सीट ही जीत सकी थी। लेकिन, केवल तीन साल में शाह कि सियासत में भगवा दल ने दीदी की राजनीतिक दबंगई को ऐसी चुनौती दी कि उनके होश फाख्ता होने शुरू हो गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 21 सीट जीतने का टारगेट लेकर चली और 40.2% वोटों के साथ 18 सीटें जीत गई। दो-तीन सीटों पर वह कम मतों के अंतर से पिछड़ गई। हालांकि, टीएमसी के वोट शेयर में मामूली कमी आई, लेकिन उसके मजबूत किले की दीवार में दरार स्पष्ट रूप से पड़ गई। पार्टी 43.3% वोटों के साथ भाजपा से चार सीटें ज्यादा यानि 22 ही जीत सकी।

अगर दोनों चुनावों का विश्लेषण करें तो वैसे तो बीजेपी ने लगभग हर दल के वोट बैंक में सेंध लगाई है, लेकिन उसने कांग्रेस और सीपीएम के साथ-साथ बाकी छोटे दलों की चूलें हिला दी हैं। मसलन, 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 12.3% वोट (44 सीट), सीपीएम को 19.7% वोट (26 सीट), अन्य को 12.9% वोट (10 सीट) मिली थी। लेकिन, तीन साल बाद ही भाजपा ने इनका हाल ऐसा कर दिया कि, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 5.6% वोट (2 सीट), सीपीएम को 6.3% वोट (0 सीट) और अन्यों को 4.5% वोट (0 सीट) मिल पाई।

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों से उत्साहित भाजपा इस बार बंगाल में 200 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी का जोश हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ओर से एआईएमआईएम के चुनाव लड़ने के ऐलान ने और बढ़ा दिया है। पार्टी को लगता है कि राज्य की 90 मुस्लिम प्रभावी सीटों पर इसके चलते पूरा राजनीतिक समीकरण उसी के पक्ष में उलट सकता है। कुछ हद तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चिंता से भी यह बात जाहिर होती है। वह बिना ओवैसी का नाम लिए कहती हैं, 'अल्पसंख्यक समुदाय के अंदर कुछ उग्रवादी हैं। उन्हें बीजेपी पैसे दे रही है। वह हैदराबाद के हैं। वे यहां पर मीटिंग कर रहे हैं और मुसलमानों से कह रहे हैं कि वह उनकी हिफाजत करेंगे। मेरे अल्पसंख्यक भाइयों और बहनों उनकी बातों के चक्कर में मत पड़ना।'

बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट का संगठन लगभग बर्बाद हो चुका है। इनके कैडर या तो दीदी के साथ चले गए हैं या फिर बीजेपी का झंडा उठा लिया है। जाहिर है कि इन परिस्थितियों में भाजपा जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में भगवा फहराने के लिए इससे और अधिक बेहतर मौके का इंतराज नहीं करना चाहती। लेकिन, उसके पास चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि बिहार की तरह ना तो उसके पास ममता बनर्जी के मुकाबले कोई सीएम का चेहरा है और ना ही कोई दूसरा सहयोगी। पार्टी में कई नेता टीएमसी से ही आए हैं, ऐसे में पार्टी के पुराने नेताओं से उनकी आंतरिक अनबन भी पार्टी को झेलनी पड़ रही है। 90 मुस्लिम प्रभावी सीटों वाले बंगाल में ममता को मात देना अपने आप में एक अलग चुनौती है।

लेकिन, ममता की ये चुनौतियां भाजपा के लिए बड़ा हथियार भी साबित हो सकती हैं। टीएमसी सरकार की 10 साल की एंटी इंकम्बेंसी, मुस्लिम वोटों को सेंध लगाने के लिए ओवैसी जैसे नेता की मौजूदगी।

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