मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष को क्या हासिल होगा?
नई दिल्ली: तेलुगू देशम पार्टी और कांग्रेस ने संसद में पीएम मोदी की अगुआई वाली सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दिया, जिस पर शुक्रवार को लोकसभा में बहस होगी। लेकिन इसके कितने मायने हैं जब टीडीपी और कांग्रेस दोनों जानते हैं कि एनडीए सरकार के पास बहुमत है। वहीं, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी दावा किया कि सरकार गिराने के लिए जरूरी संख्या उनके पास है। जबकि सदन में चर्चा के लिए बीजेपी भी कमर कस चुकी है और उसका कहना है कि एनडीए के पास जरूरी बहुमत है और वो विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को गिरा देगी।
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विपक्ष अपने सारे हथकंडे अपना रहा है
दरअसल, विपक्ष की कोशिश है कि लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ एक फ्रंट तैयार किया जाए। विपक्ष अपने सारे हथकंडे अपना रहा है कि पीएम मोदी और बीजेपी को कमजोर किया जाए। हालांकि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव में कितना सफल हो पाता है, ये तो वक्त बताएगा। लेकिन कांग्रेस इसको लेकर विश्वास से भरी नजर आ रही है। सोनिया गांधी ने भी कहा था कि कौन कहता है कि उनके पास संख्या नहीं है।

'विपक्ष के पास जरूरी नंबर नहीं'
535 सदस्यीय लोकसभा में बीजेपी के 274 सांसद हैं और उनकी सरकार को कोई खतरा नजर नहीं आ रहा है। 2014 लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 44 सीटें कांग्रेस ने जीतीं थी। अविश्वास प्रस्ताव लाने वाली टीडीपी के पास 16 सीटें जीतीं। 2014 में जेडीएस- 2, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी 6, आरजेडी 4, तृणमूल कांग्रेस 34, सीपीआईएम 9 सीटें, समाजवादी पार्टी को 5 मिली थीं। हालांकि, बीजू जनता दल और AIADMK ने अभी तक रुख अपना साफ नहीं किया है। फिलहाल, बीजेपी को सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाकर हराना विपक्ष के लिए टेढ़ी खीर ही साबित होता हुआ दिखाई दे रहा है।

विपक्ष बीजेपी के खिलाफ एक फ्रंट बनाने की कोशिश में
लेकिन विपक्ष इस अवसर का इस्तेमाल बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तनाव और मूल्य वृद्धि जैसे मुद्दों को उठाने के लिए करना चाहता है। 'मुस्लिम पुरुषों की पार्टी कांग्रेस' वाला बयान भी बहस का मुद्दा हो सकता है। वहीं, बीजेपी पीएम मोदी के नेतृत्व में न केवल विपक्ष का जवाब देना चाहेगी बल्कि प्रधानमंत्री के भाषण के माध्यम से लोगों को एक संदेश देने और अविश्वास प्रस्ताव को गिराकर विपक्ष को करारा झटका देने की कोशिश करेगी। पीएम मोदी उस बयान का भी हवाला दे सकते हैं जिसमें उन्होंने सभी मुद्दों पर बात करने पर सहमति जताई थी और सदन को सुचारू रूप से चलाने की अपील की थी।
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