करुणानिधि और जयललिता के बीच इतनी नफ़रत क्यों थी
मुथुवेल करुणानिधि का जाना कई मायनों में एक युग का अंत होने जैसा है. इस युग में उनके और जयराम जयललिता के बीच एक कड़वाहट भरी दुश्मनी देखने को मिली है.
नेताओं के बीच दुश्मनी तो अक्सर देखने को मिलती ही है, लेकिन करुणानिधि और जयललिता की दुश्मनी का स्तर अलग था.
दोनों ही दक्षिण भारत की राजनीति के मजबूत नेता थे और दोनों ने राजनीतिक दुश्मनी उस हद तक निभाई जैसी बहुत कम देखने को मिलती है और दक्षिण भारतीय राजनीति में तो और भी मुश्किल.
बाक़ी नेताओं से अलग ये दोनों विधानसभा में कभी ज़्यादा मुस्कुराए नहीं या संसदीय मज़ाक नहीं किया. वो एक ही जगह थी जहां वो बहुत कम ही सही पर एक-दूसरे के सामने आए.
तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि के बीच तनवापूर्ण रिश्तों के चलते स्थितियां दूसरे राज्यों जैसी नहीं थी.
यहां अन्य राज्यों की तरह एक मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता का एक ही मंच साझा करना या राष्ट्रीय नेताओं के स्वागत के लिए आधिकारिक लंच या डिनर में शामिल होने का चलन नहीं रहा.
जयललिता पर लिखी गई एक किताब की लेखिका और तमिलनाडु पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वसंती कहती हैं, ''वो सिर्फ़ एक-दूसरे को नापसंद ही नहीं करते थे बल्कि दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह नफ़रत करते थे.''
जयललिता ने खाई थी क़सम
वसंती विधानसभा में मार्च 1989 में हुई एक घटना के बारे में बताती हैं. तब जयललिता ने विपक्ष की नेता के तौर पर मुख्यमंत्री करुणानिधि द्वारा उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने का मुद्दा उठाया था.
यह वो वक़्त था जब करुणानिधि ने बजट पेश करना शुरू ही किया था और जयललिता ने इसका विरोध शुरू कर दिया.
इसके बाद किसी ने करुणानिधि पर फाइल फेंकी और उनका चश्मा टूट गया. इसकी प्रतिक्रिया में ट्रेजरी बेंच से किसी ने जयललिता की साड़ी खींच दी.
वसंती बताती हैं, ''जयललिता ने इसे कभी माफ़ नहीं किया जाने वाला अपमान कहा था और क़सम खाई थी कि वो विधानसभा में तभी लौटेंगी जब करुणानिधि सत्ता से बाहर होंगे.''
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वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मालन कहते हैं, ''करुणानिधि के लिए जयललिता ऐसी नेता थीं जो द्रविड़ संस्कृति से नहीं आई थीं और न ही वो रैंक के आधार पर आगे बढ़ी थीं. (जब जयललिता के गुरु एमजी रामचंद्रन ने डीएमके से अलग होकर एआईएडीएमके बनाई तो वह प्रॉपेगैंडा सेक्रेटरी बनीं) साथ ही वो ब्राह्मण थीं और डीएमके हमेशा ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ लड़ती रही है.''
वसंती कहती हैं, ''तमिलनाडु में जो भी ग़लत हुआ करुणानिधि ने जयललिता को हमेशा उसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया. करुणानिधि ने जयललिता को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजा. फिर जब जयललिता सत्ता में आईं तो उन्होंने करुणानिधि को उनके घर से आधी रात को गिरफ़्तार करवा लिया.''
करुणानिधि और रामाचंद्रन का दौर
एमजी रामाचंद्रन (एमजीआर) और करुणानिधि के संबंधों में काफ़ी उतार-चढ़ाव रहा है. करुणानिधि ने एक फ़िल्म में रोल दिलाने में एमजी रामाचंद्रन की मदद की थी. वहीं, एमजीआर ने करुणानिधि को मुख्यमंत्री पद के लिए समर्थन दिया था.
यह दोस्ती सालों तक बन रही, लेकिन जब एमजीआर ने पार्टी में ख़ुद को अलग-थलग होता देखा तो वो करुणानिधि से दूर हो गए.
दोनों के संबंधों में दरार आनी शुरू हो गई. उस वक़्त राजनीति में एमजीआर का क़द भी काफ़ी बड़ा हो गया था. उन्होंने पार्टी में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और इस तरह डीएमके से एआईएडीएमके का जन्म हुआ.
मालन कहते हैं, ''करुणानिधि एमजीआर को पहले ही एक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखने लगे थे. लेकिन, जब एमजीआर ने करुणानिधि को हरा दिया तो ये प्रतिद्वंद्विता कम हो गई. वो कभी साथ नहीं दिखे लेकिन एमजीआर की तबीयत ख़राब होने पर करुणानिधि ने उनके ठीक होने की कामना करते हुए पत्र लिखा था जो दोनों के बीच के जुड़ाव को दिखाता है. वह अलग तरह का रिश्ता था. वहीं, जयललिता के साथ बात बिल्कुल उलट थी.''
लेकिन, क्या करुणानिधि और जयललिता की दुश्मनी से राज्य को फ़ायदा हुआ?
मालन जवाब देते हैं, ''हां, क्योंकि ये राज्य को प्रतिस्पर्धी राजनीति की तरफ़ लेकर गया. डीएमके और एआईएडीएमके के बीच की प्रतिद्वंद्विता इतनी गहरी थी कि डीएमके के 1967 से सत्ता में आने के बाद से कोई राष्ट्रीय पार्टी राज्य में जगह नहीं बना सकी.''
एमजीआर ने मिडडे मिल की फिर से शुरुआत की जो कांग्रेस के मुख्यमंत्री के कामराज ने अपने कार्यकाल में शुरू किया था. समय के साथ करुणानिधि और जयललिता के बीच प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई कि दोनों चुनावों से पहले अपने घोषणापत्रों में मुफ़्त में सामान बांटने लगे.
मालन कहते हैं, ''अगर एक पार्टी मीडडे मिल में हर हफ़्ते एक अंडे देने की बात करती तो दूसरी दो अंडे देने की योजना लेकर आ जाती. इस तरह स्कूल जाने वाले बच्चों को हर हफ़्ते पांच अंडे दिए जाने लगे. इसी तरह एक ने कलर टीवी देने की बात कही तो दूसरे ने मिक्सर ग्राइंडर. इस तरह बात लैपटॉप देने तक भी पहुंच गई.''
वहीं, पड़ोसी राज्य कर्नाटक के नेताओं का मानना है कि अगर दोनों नेताओं के बीच इस तरह की दुश्मनी न होती तो एक दशक से ज़्यादा पुराना कावेरी विवाद सुलझ चुका होता.
नाम न बताने की शर्त पर कर्नाटक के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ''करुणानिधि कर्नाटक के साथ परस्पर सहमति से ये मसला सुलझा लेते, लेकिन जयललिता अपने गृह राज्य कर्नाटक के मुक़ाबले तमिलनाडु के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखाना चाहती थीं. वहीं, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज उर्स या जेएच पटेल दोनों ही निष्पक्ष मानसिकता के थे.''
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