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भारतीय महिलाओं को वोटिंग अधिकार क्यों नहीं देना चाहते थे अंग्रेज़?

महिलाओं का मताधिकार
STR/AFP/Getty Images
महिलाओं का मताधिकार

अमरीका को देश की महिलाओं को समान वोटिंग अधिकार देने में 144 साल लग गए. ब्रिटेन को महिलाओं को वोट देने का अधिकार देने में लगभग एक सदी का समय लगा.

स्विट्ज़रलैंड के कुछ इलाकों में महिलाओं को वोट दे सकने का अधिकार 1974 में जाकर मिला. लेकिन भारतीय महिलाओं को वोट देने का अधिकार उसी दिन मिल गया था जिस दिन इस देश का जन्म हुआ था.

साल 1947 में भारत की वयस्क महिलाओं को किस तरह चुनाव में वोट देने का अधिकार मिला, गहन शोध के बाद लेखिका डॉक्टर ओर्निट शनि ने इस विषय पर एक किताब लिखी है.

वो कहती हैं कि क़रीब 10 लाख लोगों की मौत और एक करोड़ 80 लाख़ लोगों के घरों की तबाही के लिए ज़िम्मेदार बंटवारे की आग में झुलस रहे एक देश में ये फ़ैसला लिया जाना उस वक्त "किसी भी औपनिवेशिक राष्ट्र के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी."

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महिलाओं को नहीं देना चाहते थे अधिकार

आज़ाद भारत में वोटरों की संख्या पांच गुना तक बढ़कर करीब 17 करोड़ 30 लाख तक पहुंच गई थी. इसमें से करीब 8 करोड़ यानी आधी आबादी महिलाओं की थी. इनमें से करीब 85 फीसदी महिलाओं ने कभी वोट ही नहीं दिया था. दुर्भाग्य करीब 28 लाख महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा देने पड़े क्योंकि उन्होंने अपने नाम ही नहीं बताए.

अपनी किताब 'हाओ इंडिया बिकेम डेमोक्रेटिक: सिटिज़नशिप ऐट द मेकिंग ऑफ़ द यूनिवर्सल फ्रैंचाइज़ी' में डॉ शनि ने औपनिवेशिक शासन के दौर में महिलाओं के मताधिकार के विरोध के बारे में लिखा है.

डॉक्टर शनि लिखती हैं कि ब्रिटिश अधिकारियों ने ये तर्क दिया था कि सार्वभौमिक मताधिकार "भारत के लिए सही नहीं होगा." ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में चुनाव सीमित तौर पर होते थे जिसमें धार्मिक, सामुदायिक और व्यावसायिक धाराओं के तहत बांटी गई सीटों पर खड़े उम्मीदवारों के लिए कुछ वोटरों को ही मतदान करने की इजाज़त थी.

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शुरुआत में महात्मा गांधी ने वोटिंग का अधिकार पाने में महिलाओं का समर्थन नहीं किया. उनका कहना था कि "औपनिवेशिक शासकों से लड़ने के लिए उन्हें पुरुषों की मदद करनी चाहिए."

इतिहासकार गेराल्डिन फ़ोर्ब्स लिखती हैं कि भारतीय महिला संगठनों को महिलाओं को मतदान का अधिकार पाने के लिए एक मुश्किल लड़ाई लड़नी पड़ी थी.

साल 1921 में बॉम्बे और मद्रास (आज की मुंबई और चेन्नई) पहले प्रांत बने जहां सीमित तौर पर महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिए गए. बाद में 1923 से 1930 के बीच सात अन्य प्रांतों में भी महिलाओं को वोटिंग का अधिकार मिला.

डॉ फ़ोर्ब्स अपनी किताब 'वूमेन इन मॉडर्न इंडिया' में लिखती हैं कि ब्रितानी हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने महिलाओं के लिए वोटिंग के अधिकार की मांग करने वाले कई भारतीय और ब्रितानी महिला संगठनों की मांग को नज़रअंदाज़ किया.

महिलाओं से भेदभाव और उनकी पर्दे में रहना इस फ़ैसले के पीछे उनकी आसान दलील थी.

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अधिकार से वंचित करने की कई दलीलें थीं

डॉ फोर्ब्स लिखती हैं, "साफ़ तौर पर ब्रितानी शासकों ने अल्पसंख्यकों के अधिकार के तौर पर केवल पुरुष अल्पसंख्यकों को ही अधिकार देने का वादा किया. महिलाओं के मामले में उन्होंने कुछ महिलाओं के अलग-थलग होने के बहाने, पूरी महिलाओं को उनका हक देने से इनकार कर दिया."

औपनिवेशिक प्रशासकों और विधायकों दोनों ने ही मताधिकार की सीमाओं को बढ़ाने का विरोध किया था. डॉ फोर्ब्स के अनुसार वोटिंग का विरोध करने वाले "महिलाओं को कमतर आंकते थे और सार्वजनिक मामलों में उन्हें अक्षम मानते थे."

कुछ लोगों का कहना था कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार देने से पति और बच्चों की उपेक्षा होगी. वो लिखती हैं कि "एक सज्जन ने तो यहां तक तर्क दिया कि राजनीतिक काम करने से महिलाएं स्तनपान कराने में असमर्थ हो जाएंगी."

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महिला अधिकारों के लिए लड़नेवाली मृणालिनी सेन ने 1920 में लिखा था, "ब्रितानी सरकार के बनाए सभी क़ानून महिलाओं पर लागू होते थे" और अगर उनके पास संपत्ति है तो उन्हें टैक्स भी देना होता था, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था.

वो कहती हैं, "ये कुछ इस प्रकार था कि मानो ब्रितानी शासक महिलाओं से कह रहे हों कि न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की बजाय वो खुद ही स्थिति से निपटें."

भारत के आख़िरी औपनिवेशिक क़ानून, भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत देश के 3 करोड़ लोगों को वोट देने का अधिकार दिया गया. ये देश की कुल वयस्क आबादी का पांचवां हिस्सा था. इसमें महिलाओं की संख्या कम थी.

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पुरुषों पर निर्भर थी महिला की पात्रता

बिहार और उड़ीसा प्रांत (उस दौर में ये दो राज्यों एक ही प्रांत में आते थे) की सरकार ने मतदाताओं की संख्या कम करने और महिलाओं से मतदान का अधिकार छीनने की कोशिश की.

डॉ शनि लिखती हैं कि सरकार का मानना था, "अगर महिला तलाक़शुदा या विधवा है या उसके पास संपत्ति नहीं है तो उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाना चाहिए."

लेकिन जब अधिकारी भारत के पूर्वोत्तर में बसे खासी पहाड़ियों में उन समुदायों के संपर्क में आए जहां मातृसत्ता को माना जाता है, तो उन्हें महिलाओं के मामले में एक अपवाद देखने को मिला. इस समुदाय में संपत्ति महिलाओं के नाम पर होती है.

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अलग-अलग प्रांतों ने भी महिलाओं के नाम शामिल करने से संबधित अपने-अपने नियम बनाए. मद्रास में अगर कोई महिला पेंशनधारी विधवा थी, किसी अधिकारी या सैनिक की मां थी या उसके पति टैक्स देते थे या संपत्ति के मालिक थे तो उसे मतदान करने का अधिकार दिया गया.

देखा जाए तो वोट देने की महिला की पात्रता पूरी तरह से उसकी पति की संपत्ति, योग्यता और सामाजिक स्थिति पर निर्भर थी.

डॉ शनि बताती हैं, "महिलाओं को वोट देने का अधिकार देना और उन्हें सही मायनों में वोटर लिस्ट में लेकर आना औपनिवेशिक शासन में काम कर रहे नौकरशाहों की कल्पना से परे था."

"इसका एक कारण उस वक्त की विदेशी सरकार का यहां की अशिक्षित जनता में भरोसे की कमी और गरीबों, ग्रामीण और अशिक्षितों को अधिकर देने के संबंध में उनकी नकारात्मक सोच का नतीजा थी."

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आज़ाद भारत में बदले हालात

लेकिन जब आज़ाद भारत ने ये तय किया कि वो देश के वयस्कों को वोट करने का यानी अपनी सरकार खुद चुनने का अधिकार देगी तो चीज़ें बदलने लगीं.

डॉ शनि लिखती हैं, "मतदाता सूची तैयार करने का काम नवंबर 1947 में शुरू हुआ. साल 1950 की जनवरी तक जब भारत को उसका अपना संविधान मिला तो उस वक्त तक सार्वभौमिक मताधिकार और चुनावी लोकतंत्र की सोच पुख्ता हो चुकी थी."

लेकिन साल 1948 में जब मसौदा मतदाता सूची की तैयारी की बारी आई तो उसमें अनेक समस्याएं थीं.

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कुछ प्रांतों के अधिकारियों ने महिलाओं के नामों को लिखने में काफी दिक्कतें पेश आने के बारे में बताया. कई महिलाओं ने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया और अपना नाम बताने की बजाय खुद को किसी की पत्नी, मां, बेटी या किसी की विधवा के रूप में पेश किया.

सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और महिलाओं का पंजीकरण उनके नाम से ही किया जाएगा.

पूर्व की औपनिवेशिक नीतियों से हटकर भारत सरकार ने कहा कि महिला को किसी अन्य की संबंधी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मतदाता के रूप में पंजीकृत किया जाएगा.

सरकार ने मीडिया का सहारा लेकर इस संबंध में प्रचार करने का काम शुरू किया और महिलाओं को अपनी खुद की पहचान के साथ नाम लिखवाने के लिए उत्साहित किया. महिला संगठनों ने भी महिलाओं से अपील की कि वो अपने हितों की रक्षा करने के लिए खुद मतदाता बनें.

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देश की पहली संसद के लिए अक्तूबर 1951 से फ़रवरी 1952 के बीच में हुए चुनावों में मद्रास की एक सीट से चुनाव लड़ने वाले एक उम्मीदवार ने कहा था, "मतदाता केंद्र के बाहर वोट देने को लिए महिला और पुरुष ग्रामीण धैर्य से घंटों इंतज़ार कर रहे थे. वो कहते हैं कि पर्दे में आई मुसलमान महिलाओं के लिए अलग वोटिंग बूथ की व्यवस्था की गई थी."

ये अपने आप में एक बड़ी जीत थी.

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आज भी जारी है लड़ाई

बेशक, महिलाओं के हक़ों की लड़ाई आज भी जारी है. साल 1966 से भारत की संसद के निचले सदन में 33 फ़ीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाला एक बिल कड़े विरोध के कारण अब तक अटका हुआ है.

आज पहले से कहीं अधिक महिलाएं मतदान कर रही हैं और कभी-कभी पुरुषों से भी अधिक संख्या में वो मतदान कर रही हैं, लेकिन वो चुनाव में उम्मीदवार के रूप में वो कम ही नज़र आती हैं.

2017 में जारी की गई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार संसद में महिलाओं की संख्या की सूची में 190 देशों में भारत का स्थान 148 है. 542 सदस्य वाले संसद के निचले सदन में सिर्फ 64 सीटों पर ही महिलाएं हैं.

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