अखिलेश-आजम ने सांसदी की जगह क्यों बचाकर रखी विधायकी?
नई दिल्ली, 22 मार्च: समाजवादी पार्टी के प्रमुख और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और जेल में बंद उनके सहयोगी आजम खान ने लोकसभा की सीटें छोड़कर विधानसभा की सदस्यता बरकरार रखने का फैसला किया है। सपा सुप्रीमो का यह फैसला काफी सोच-समझकर और दूर की राजनीति को देखते हुए लिया गया है, जिसमें सत्ताधारी भाजपा के मुकाबले प्रदेश की राजनीति में कोई मजबूत दूसरी विपक्षी पार्टी नहीं बची है। अखिलेश यादव के बारे में पहले यह अटकलें थीं कि वह आजमगढ़ की संसद सदस्यता रखेंगे और करहल सीट से स्वामी प्रसाद मौर्य को विधानसभा में भेजकर गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। लेकिन, शायद शुभचिंतकों ने उन्हें इससे भी दूर की सोच के हिसाब से काम करने की सलाह दी है।

विपक्ष में जोरदार भूमिका निभा सकते हैं
यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी सत्ता से काफी दूर रह गई है, लेकिन ये बात भी उतनी ही सही है कि सूबे में पार्टी की राजनीतिक ताकत काफी बढ़ी है। 47 विधायकों से बढ़कर पार्टी के पास अपने 111 विधायक हो गए हैं और वोट शेयर भी करीब 22% से बढ़कर 32.06% हो गया है। ऐसे में लोकसभा में पांच सांसदों वाली सपा की अगुवाई करके अखिलेश यादव जितना भी कर सकते थे, विधानसभा में विपक्ष का नेता बनकर उनके पास कहीं ज्यादा देश के सबसे बड़े राज्य में करने का मौका है। वह पांच साल तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहकर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सड़क से लेकर सदन तक घेर सकते हैं। उनके शुभचिंतकों की ओर से भी लगातार यही सलाह दिए जा रहे थे। लखनऊ में रहकर अखिलेश 2024 की भी तैयारी कर सकते हैं, जहां पिछली दो बार से उनकी पार्टी 5 सीटों पर ही सिमट रही है।

कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना
अखिलेश यादव जिस सपा की कमान संभाल रहे हैं, उसके कार्यकर्ता रह-रहकर यूपी में कई बार सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। इसबार समाजवादी पार्टी ने जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग की थी, उससे उनके कार्यकर्ता मान बैठे थे कि अखिलेश का दोबारा मुख्यमंत्री बनना तय है। पार्टी कार्यकर्ताओं का ये उत्साह चुनाव पूर्व कुछ अप्रिय तस्वीरों का भी गवाह बन चुका है। ऐसे में अखिलेश यादव को यह डर सताना स्वाभाविक है कि सत्ता से पांच साल की निश्चित दूरी कार्यकर्ताओं के जोश को पूरी तरह तोड़ सकता है। यदि वे यूपी में रहकर राजनीति करेंगे तो कार्यकर्ताओं को लगेगा कि भविष्य खत्म नहीं हुआ है। 2024 और 2027 में फिर से तस्वीर बदली जा सकती है। क्योंकि, पांच साल तक कार्यकर्ताओं को छोड़ने से उनके छिटकने का खतरा बढ़ना तय है।
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बसपा के घटते जनाधार पर नजर
कांग्रेस को अगर फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए गंभीर खिलाड़ी ना मानें तो बीते चुनाव में सबसे बुरा हाल मायावती की बहुजन समाज पार्टी का रहा है। 2017 के मुकाबले पार्टी का लगभग फिक्स वोट बैंक 22.23% से घटकर 12.88% रह गया है। उसके विधायकों की संख्या भी 19 से घटकर कांग्रेस भी कम 1 रह गई है। माना जा रहा है कि बसपा का करीब 10% जो वोट कम हुआ है, उसका बड़ा हिस्सा सपा में गया है। ऐसे में अखिलेश ने सूबे की राजनीति में भाजपा का मुकाबला करने वाले एकमात्र गंभीर खिलाड़ी बने रहने का भी मौका छोड़ दिया तो मायावती के वोटरों का पूरी तरह से बीजेपी में शिफ्ट होने का जोखिम बढ़ सकता है।

विधानसभा में अखिलेश-आजम की जुगलबंदी
विधानसभा चुनाव में सपा की सोशल इंजीनियरिंग ने काफी काम किया है। लेकिन, यह बात फिर से साबित हुई है कि समाजवादी पार्टी के कोर वोटर यादव और मुसलमान ही बने हुए हैं। अखिलेश की तरह कई आरोपों में जेल में बंद उनकी पार्टी के बड़े नेता आजम खान ने भी रामपुर लोकसभा की सदस्यता छोड़ी है, क्योंकि दोनों को यकीन है कि उनका अपना कोर वोट बैंक इतना एकजुट है कि आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में अपने नुमाइंदों को फिर से संसद भेजना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। विधानसभा में भी अखिलेश-आजम की जुगलबंदी, कोर वोट बैंक को मजबूती से जोड़े रखने का काम आएगा। क्योंकि, बीजेपी भी यादवों के एक वर्ग के वोट को लगातार उम्मीद भरी नजरों से देख रही है।

गठबंधन को मजबूत बनाए रखना
सपा को पूर्वांचल में ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन करना काफी फायदेमंद लग रहा है। लेकिन, पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल से गठबंधन उतना सफल नहीं रहा है, जितना की दावा किया जा रहा था। इलाके की 126 सीटों में से 85 यानि 67 फीसदी फिर भी बीजेपी जीत गई है। इससे भी बुरा हाल लखीमपुर खीरी इलाके में हुआ है, जहां केंद्रीय मंत्री के बेटे की गाड़ी से कथित रूप से किसान आंदोलनकारी को कुचले जाने के आरोपों की बदौलत विपक्ष ने बहुत बड़ा नरेटिव सेट करने की कोशिश की थी। लेकिन, वहां की सारी सीटें बीजेपी जीत गई। यही नहीं स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता को भाजपा से तोड़कर लाने का भी फायदा नहीं दिखा, जो अपनी सीट भी हार गए। बदली परिस्थितियों में राजभर की फिर से पलटी मारने की एक खबर भी उड़ चुकी है, हालांकि उन्होंने इसका खंडन किया है। ऐसे में माहौल में पहले लोकसभा चुनाव तक और फिर 2027 तक सभी सहयोगियों को साथ रखना भी उनके लिए बड़ी चुनौती है, जिसका सामना यूपी की राजनीति करके ज्यादा आसानी से किया जा सकता है।

शुभचिंतकों की ओर से भी मिल रही थी सलाह
पत्रकार से फिल्मकार बने विनोद कापड़ी के दो ट्वीट का विश्लेषण कर लें तो अंदाजा लग सकता है कि शुभचिंतकों की ओर से अखिलेश यादव को क्या सलाह दिए जा रहे थे। 12 मार्च को एक खबर आई थी कि अखिलेश करहल सीट से इस्तीफा दे सकते हैं। इसपर कापड़ी ने ट्वीट किया था, 'आपको यूपी जीतना है पर वहां रहना नहीं है। आपको यूपी का मुख्यमंत्री बनना है, लेकिन विधानसभा में नहीं जाना है। यदि अखिलेश यादव करहल से इस्तीफा दे कर विधानसभा में विपक्षी नेता के तौर पर नहीं बैठना चाहते हैं तो उन्हें 2027 भी भूल जाना चाहिए !' लेकिन, जब अखिलेश लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को अपना इस्तीफा सौंप आए तो यही कापड़ी ने फिर ट्विटर पर खुशी जाहिर करते हुए लिखा, 'उत्तर प्रदेश में बने रहने के लिए उत्तर प्रदेश में बने रहना बहुत जरूरी। अखिलेश यादव का परिपक्व फैसला।'












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