बंगाल में 'खेला'! 60 विधायकों की बगावत के बाद अब ममता की 'दिल्ली टीम' खतरे में? क्या 28 सांसद भी बदलेंगे पाला

West Bengal TMC political Crisis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आ गया है जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। पिछले 15 सालों तक बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी के पैर के नीचे से अचानक सियासी जमीन खिसक गई है। हालिया विधानसभा चुनाव में हार के बाद अभी पार्टी संभल भी नहीं पाई थी कि 24 घंटे के भीतर वो सब कुछ हो गया जिसकी कल्पना खुद ममता दीदी ने भी नहीं की होगी।

जिस बागी विधायक को ममता बनर्जी ने तीन दिन पहले गुस्से में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था, उसी नेता ने आधी से ज्यादा टीएमसी तोड़ दी। टीएमसी के 80 में से 60 विधायकों का समर्थन जुटाकर वह विधानसभा में 'नेता प्रतिपक्ष' की कुर्सी पर बैठ गया है। अब सबसे बड़ा डर यह है कि विधानसभा के बाद क्या ममता की 'टीम दिल्ली यानी उनके सांसदों में भी बड़ी टूट होने वाली है? आइए इस पूरे सियासी बवंडर का आसान भाषा में पोस्टमार्टम करते हैं।

West Bengal TMC political crisis

▶️बागी बने बॉस: ऋतब्रत बनर्जी को मिला दफ्तर, ममता देंगी अदालत में चुनौती (Ritabrata Banerjee Becomes LoP)

03 जून की शाम बंगाल की राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गई। टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने 58 विधायकों के साथ विधानसभा स्पीकर रथींद्र बसु के सामने परेड की। बाद में दो और विधायकों ने उन्हें समर्थन दे दिया, जिससे यह संख्या 60 तक पहुंच गई। लोकतंत्र के गणित के हिसाब से स्पीकर ने बिना देर किए ऋतब्रत बनर्जी को मुख्य विपक्षी दल के नेता (Leader of Opposition) के रूप में मान्यता दे दी और उन्हें विधान भवन में आधिकारिक कमरा भी अलॉट कर दिया।

ममता गुट का पलटवार: ममता बनर्जी के बेहद करीबी नेता कुणाल घोष ने इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि जो विधायक खुद पार्टी से निकाला जा चुका हो, वह टीएमसी विधायक दल का नेता कैसे बन सकता है? उन्होंने दावा किया कि कई विधायकों के दस्तखत दोनों गुटों की चिट्ठी पर हैं।

कानूनी लड़ाई की तैयारी: टीएमसी का आधिकारिक गुट अब स्पीकर के इस फैसले को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। लेकिन जमीन पर सच्चाई यह है कि बागी गुट ने विधानसभा के भीतर ममता बनर्जी को तगड़ा झटका दे दिया है।

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West Bengal TMC political crisis ritabrata banerjee

▶️भतीजे से नाराजगी और 'कॉरपोरेट कल्चर' ने डुबोई लुटिया

आखिर ऐसा क्या हुआ कि दीदी के सबसे भरोसेमंद विधायक ही उनके खिलाफ खड़े हो गए? इस बगावत की स्क्रिप्ट के पीछे कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि घर का ही एक नाम है- अभिषेक बनर्जी। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों और विधायकों का साफ कहना है कि यह बगावत ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके भतीजे और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की तानाशाही के खिलाफ है।

पार्टी के पुराने नेताओं का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी ने टीएमसी को एक राजनीतिक दल के बजाय 'कॉरपोरेट कंपनी' की तरह चलाना शुरू कर दिया था। ममता बनर्जी जहां जमीन पर लोगों से मिलकर राजनीति करती थीं, वहीं अभिषेक ने I-PAC नामक चुनावी मैनेजमेंट कंपनी को सब कुछ सौंप दिया। इस कंपनी के कर्मचारी ब्लॉक स्तर से लेकर सांसदों तक की जासूसी करते थे।

टिकट किसको मिलेगा और किसे नहीं, यह जमीन के नेताओं से पूछने के बजाय कंप्यूटर के डेटा से तय होने लगा। नेताओं का कहना है कि दीदी से मिलना तो आसान था, लेकिन अभिषेक के आलीशान बंगले के बाहर विधायकों को घंटों सड़क पर इंतजार करना पड़ता था। इसी अपमान और नजरअंदाज किए जाने के अहसास ने इस विद्रोह को जन्म दिया।

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▶️अब दीदी की 'दिल्ली टीम' पर मंडराया खतरा, क्या टूटेंगे सांसद?

विधानसभा में अपनी ताकत दिखाने के बाद अब बागी गुट का अगला टारगेट दिल्ली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बागी गुट को असली 'तृणमूल कांग्रेस' का नाम और सिंबल (जोड़ा फूल) चाहिए, तो उन्हें संसद में भी अपनी ताकत साबित करनी होगी।

वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं। दलबदल कानून से बचने और पार्टी पर पूरी तरह दावा ठोकने के लिए बागियों को कम से कम दो-तिहाई यानी 19 से 20 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी।

सूत्रों की मानें तो अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली से लोकसभा और राज्यसभा के कई वरिष्ठ सांसद बेहद असहज महसूस कर रहे हैं। बागी गुट के नेता अब उन्हीं नाराज सांसदों से संपर्क साध रहे हैं। अगर विधायकों की तरह सांसदों ने भी पाला बदल लिया, तो ममता बनर्जी की राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षाओं पर हमेशा के लिए पानी फिर जाएगा।

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▶️क्या महाराष्ट्र की तर्ज पर छीन जाएगा पार्टी का नाम और निशान?

यह पूरी लड़ाई अब उसी रास्ते पर जा रही है जैसी कुछ समय पहले महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और एनसीपी (शरद पवार) के साथ हुई थी। वहां भी विधायकों और सांसदों के बड़े गुट ने खुद को असली पार्टी बताकर नाम और चुनाव चिन्ह पर कब्जा कर लिया था।

TMC विधायक की संख्या 80 है। जिसमें से 60 बागी हो गए हैं। TMC लोकसभा सांसदों की संख्या 28 हो गई है। बागी सांसदों की संख्या 19-20 (अनुमानित लक्ष्य) है। इस कानूनी पेंच को समझते हुए कुणाल घोष ने कहा कि स्पीकर सिर्फ विधानसभा के अंदर फैसला ले सकते हैं, लेकिन 'असली राजनीतिक दल' कौन है, इसका फैसला चुनाव आयोग (Election Commission) ही करेगा।

बागी गुट के नेता संदीपन साहा और जावेद अहमद खान का कहना है कि वे पार्टी छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि वे असली टीएमसी हैं। उन्होंने ममता बनर्जी को एक दिलचस्प ऑफर भी दिया है कि दीदी उनकी 'चीफ एडवाइजर' (मुख्य सलाहकार) बन जाएं और अभिषेक बनर्जी चुनाव में हार की जिम्मेदारी लें।

▶️मेयरों के इस्तीफे और मदन मित्रा का वो बंगाली गाना

इस बगावत का असर सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल के शहरी निकायों में भी हड़कंप मच गया है। बिधाननगर नगर निगम की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने 04 जून को अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के इस्तीफे को लेकर भी संशय बरकरार है। पार्टी के बिखरने की रफ्तार इतनी तेज है कि टीएमसी ने राज्य की अपनी सभी कमेटियों को भंग करके नए सिरे से समीक्षा शुरू कर दी है।

इस पूरे सियासी नाटक पर टीएमसी के सीनियर नेता मदन मित्रा ने अपने ही अंदाज में चुटकी ली। उन्होंने एक मशहूर बंगाली गाना गाते हुए बागियों पर तंज कसा- "अरे छो छो क्या शर्म की बात, भद्र की लड़की भागे ड्राइवर के साथ!" मित्रा ने कहा कि ड्राइवर में तो फिर भी थोड़ी शर्म होती है, लेकिन इन बागियों में वो भी नहीं है। यह कैसे मुमकिन है कि आप ममता बनर्जी को अपनी मां और नेता भी मान रहे हैं और उन्हीं की पार्टी के खिलाफ विपक्ष बनाकर बैठ गए हैं?

बहरहाल, मदन मित्रा भले ही इसे शर्म की बात कहें, लेकिन दिल्ली से लेकर कोलकाता तक ममता बनर्जी के लिए यह उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। अगर वो अपने सांसदों को बचाने में नाकाम रहीं, तो तृणमूल कांग्रेस का वजूद इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा।

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