West Bengal:TMC के लिए नई टेंशन, ममता बनर्जी के करीबी मंत्री फिरहाद हकीम की कुर्सी संकट में
नई दिल्ली- ममता बनर्जी सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री सुवेंदु अधिकारी के पार्टी से इस्तीफे के बाद से तृणमूल विधायकों और नेताओं को दल से इस्तीफा देने की झड़ी लग चुकी है। ऐसे में मुख्यमंत्री के बेहद करीबी मंत्री और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम की कुर्सी पर भी संकट के बादल मंडराने शुरू हो गए हैं। टीएमसी सरकार के मुस्लिम चेहरे हकीम ऑफिस ऑफ प्रॉफिट केस में फंसे हुए हैं और चुनाव आयोग इसपर जल्द ही फैसला लेने की तैयारी कर रहा है। गौरतलब है कि इस समय टीएमसी के कई विधायकों और सांसदों ने बगावत करना शुरू कर दिया है, जिससे ममता बनर्जी बहुत ही तनाव में हैं।

ममता के मंत्री की विधायकी पर खतरा
ऐसे में जब पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है, तृणमूल सरकार (Trinamool Government) के मंत्री फिरहाद हकीम (Firhad Hakim) से जुड़े ऑफिस ऑफ प्रॉफिट केस में चुनाव आयोग (Election Commission of India) जल्द ही कोई फैसला लेने वाला है। हकीम पर आरोप ये है कि वह मंत्री पद पर रहते हुए और सीटिंग विधायक होने के बावजूद कोलकाता नगर निगम (Kolkata Municipal Corporation) के बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर्स (BoA) की अध्यक्षता कर रहे हैं। यही नहीं बंगाल के राज्यपाल भी जानना चाहते हैं कि क्या उनका दोनों पदों पर होना ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (office of profit) का मामला है, जिसके चलते वह विधायकी के लिए अयोग्य ठहराए जा सकते हैं?
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मेयर और मंत्री दोनों पद पर हैं हकीम
इस मामले में चुनाव आयोग दो बार सुनवाई कर चुका है और बंगाल सरकार से कोलकाता नगर निगम के फंडिंग मॉडल का विस्तृत ब्योरा मांगा है, जिसकी हकीम अध्यक्षता कर रहे हैं। अंतिम सुनवाई दो दिन पहले ही 16 दिसंबर को हुई है। चुनाव आयोग ने राज्य सरकार से जिन बातों की जानकारी मांगी थी, उनमें ये था कि निगम पर सरकार का कितना नियंत्रण है, उसे राशि कौन आवंटित करता है, वह कैसे कार्य कर्ता है और वेतन आदि कैसे दिए जाते हैं। इस बात की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने कहा है कि अगली सुनवाई में आयोग अपना फैसला सुना सकता है। फिरहाद हकीम अभी कोलकाता के मेयर ( Mayor of Kolkata) भी हैं और उनके पास शहरी विकास और निगम मामलों के मंत्री की भी जिम्मेदारी है।

हकीम के बचाव में ममता सरकार
दरअसल, संविधान के आर्टिकल 191 (Article 191) के तहत एक विधायक के लिए किसी भी 'लाभ के पद' (office of profit) पर होने पर रोक है, चाहे वह केंद्र या राज्य सरकार के अधीन पद हो। सिर्फ वही पद लाभ का पद नहीं माना जा सकता, जिसे राज्य की विधायिका ने उसके दायरे से अलग रखा हो। बंगाल सरकार (Bengal government) की दलील यही रही है कि हकीम जिस पद पर हैं, वह लाभ के पद से अलग रखे गए 130 पदों में शामल है। हकीम के वकील का भी यह कहना है कि उनका पद लाभ के पद के दायरे में नहीं आता।

सीएम ममता के बेहद करीबी हैं हकीम
फिरहाद हकीम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बेहद करीबी मंत्री और टीएमसी नेता माने जाते हैं। हालांकि, उनके बारे में कहा जाता है कि वो ममता की मुस्लिम 'परस्त' राजनीति का समर्थन नहीं करते। पिछली बार वो तब सुर्खियों में आए थे, जब 2016 के विवादित नारदा स्टिंग (Narada sting operation) में उनका नाम आया था। हकीम का मुद्दा पहले से ही बंगाल की राजनीति में गर्मा चुका है, क्योंकि भाजपा इस मामले में टीएमसी सरकार पर पक्षपात और तुष्टिकरण का आरोप लगा चुकी है। गौरतलब है कि हकीम कोलकाता के पहले मुस्लिम मेयर भी हैं।

तीन विधायक छोड़ चुके हैं पार्टी और इंतजार में ?
दरअसल, अगर फिरहाद हकीम का मामला चुनाव आयोग ने फंसा दिया तो टीएमसी और ममता बनर्जी के लिए बहुत ही बड़ा झटका हो सकता है। वह पहले से ही पूर्व ट्रांसपोर्ट मंत्री सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) की बगावत से परेशान हैं। क्योंकि, उनके पार्टी छोड़ते ही ऐसा करने वाले विधायकों की कतार लग गई है। बैरकपुर के विधायक (Barrackpore MLA) शीलभद्र दत्ता (Shilbhadra Dutta) और पंडाबेश्वर (Pandabeswar) के विधायक जीतेंद्र तिवारी (Jitendra Tiwari) पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे चुके हैं। ये तो पश्चिम बर्दमान जिले के जिलाध्यक्ष भी थे। तिवारी ने हाल ही में फिरहाद हकीम पर ही स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए मिले केंद्र सरकार के 2,000 करोड़ रुपये के फंड को रोकने का भी आरोप लगाया था। यही नहीं टीएमसी सांसद सुनील मंडल (Sunil Mandal) और बंगाल के वन मंत्री राजीब बनर्जी (Bengal forest minister Rajib Banerjee) भी अब पार्टी के खिलाफ अपनी भावनाओं का इजहार करने लगे हैं।
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