Lok Sabha Chunav: निष्कासन पर सहानुभूति लूट लेंगी महुआ मोइत्रा? या 'राजमाता' के सामने नहीं गलेगी दाल?

West Bengal Lok Sabha Election: बंगाल में कृष्णानगर लोकसभा सीट पर इस बार का मुकाबला टीएमसी की फायर ब्रांड लीडर महुआ मोइत्रा के लिए आसान होगा यह कहना बहुत मुश्किल है। जिस तरीके से तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अपनी चहेती नेता के लिए जोड़ लगाया है वह अपने आप में एक संकेत है।

पिछले साल लोकसभा की सदस्यता से निष्कासित टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा का पाला इस बार स्थानीय राज परिवार की अमृता रॉय से पड़ा है, जो आज भी इलाके में टीएमसी नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए भी 'राजमाता' हैं।

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कृष्णानगर में मुख्य चुनावी मुद्दे
बंगाल की अन्य सीटों की तरह कृष्णानगर में भी सीएए, धार्मिक असहिष्णुता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे हैं। लेकिन, यहां मुख्य मुकाबला महुआ की लोकसभा से कथित 'गैर-कानूनी निष्कासन' और स्थानीय राजघराने की 'राजकीय विरासत' के बीच ही होता नजर आ रहा है।

स्थानीय राजघराने से हैं भाजपा प्रत्याशी
बीजेपी उम्मीदवार अमृता रॉय राजा कृष्णा चंद्र रॉय के घराने की बहू हैं। अंग्रेजों से भी पहले इस परिवार का क्षेत्र में राज था और इसने अपनी प्रतिष्ठा आज भी काफी हद तक बनाकर रखी है। वैसे बीजेपी के लिए यह सीट अनजान नहीं और 1999 में यहां से जीतकर वह सबको चौंका भी चुकी है।

2019 में कितनी बड़ी रही थी महुआ मोइत्रा की जीत?
2019 के लोकसभा चुनाव में महुआ यहां बीजेपी के कल्याण चौबे से सिर्फ 63,128 वोटों से जीती थीं। महुआ का निष्कासन संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेने के आरोपों में हुआ है। लेकिन, उनकी सबसे बड़ी ताकत ममता हैं, जो उनके निष्कासन को 'लोकतंत्र की हत्या' बता रही हैं और उनके लिए प्रचार कर रही हैं।

2019 में यहां टीएमसी की महुआ को 6,14,872, बीजेपी के कल्याण चौबे को 5,51,654, सीपीएम के शांतनु झा को 1,20,222 और कांग्रेस के इंताज अली शाह को 38,305 वोट मिले थे। मतलब, 'राजमाता' की वजह से इस समीकरण में बदलाव की भारी गुंजाइश बनने की संभावना है।

महुआ की ताकत और टीएमसी की चुनौती क्या है?
टीएमसी प्रत्याशी के एक कार्यक्रम के बाद पार्टी के एक स्थानीय नेता जनार्दन हलदर ने कहा, 'आप मतदाताओं के बीच मोइत्रा की लोकप्रियता देख सकते हैं। वे उन्हें प्यार करते हैं, उनका आदर करते हैं। इन लोगों के लिए 'राजमाता' (अमृता रॉय) से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उनकी शाही विरासत भुला दी गई है। अपने प्रचार के दौरान वो कभी इन गांवों में नहीं आईं। हम जीत के प्रति आश्वस्त हैं और हमारा मार्जिन बढ़ेगा।'

लेकिन, महुआ के चुनाव प्रचार का कंट्रोल उनके कुछ प्रोफेशनलों के हाथों में है। पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए सीधा प्रत्याशी से संपर्क होना भी बहुत बड़ी चुनौती है। बंगाल की राजनीति के लिए यह बहुत विशेष परिस्थिति है। हालांकि, आधिकारिक रूप पार्टी कार्यकर्ता चुनाव की रणनीति से जरूर जुड़े हुए हैं।

पीएम मोदी भी कर चुके हैं अमृता रॉय के लिए प्रचार
महुआ के सिर पर सीधे ममता का आशीर्वाद है तो पश्चिम बंगाल के जिन दो उम्मीदवारों से नामांकन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे फोन करके बात की है, उसमें अमृता राय भी शामिल हैं। वह इलाके में चुनाव सभाएं भी कर चुके हैं। कृष्णानगर में 13 मई को चुनाव है।

महुआ सांसद बनने लायक नहीं हैं- कृष्णानगर बीजेपी के नेता
बीरपुर-2 पंचायत के गोलाईदोरी गांव के बीजेपी बूथ अध्यक्ष शंकर बैरागी के मुताबिक, 'बाकी मुद्दे बाद में, लेकिन टीएमसी उम्मीदवार के खिलाफ हमारी लड़ाई ये है कि वह नैतिकता के आधार पर संसद से निष्कासित हुई हैं और इससे साबित हो गया है कि वह सांसद बनने लायक नहीं हैं। हम लोगों में यही संदेश लेकर जा रहे हैं।'

टीएमसी और बीजेपी में कहां किसका पलड़ा भारी?
कृष्णानगर लोकसभा के तहत सात विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनमें से टीएमसी को मुस्लिम-बहुल तीन क्षेत्रों- कालीगंज, नकाशीपारा और छपरा में बढ़िया समर्थन मिलने की उम्मीद है। लेकिन, तेहट्टा, पलाशीपारा, कृष्णानगर उत्तर और कृष्णानगर दक्षिण जैसी चार सीटों पर बीजेपी, टीएमसी को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।

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मुस्लिम वोट बंटने के डर से आशंकित हैं ममता
2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी इनमें से 6 सीटें जीती थी और एक पर बीजेपी से मुकुल रॉय ने कब्जा किया था। लेकिन, इस बार लेफ्ट की ओर से एसएम सादी को उम्मीदवार बनाया गया है, जो पलाशीपारा के पूर्व विधायक भी हैं। कांग्रेस और लेफ्ट में गठबंधन की वजह से ही इस बार टीएमसी को मुसलमान वोट बंटने का डर सता रहा है, जिसे रोकने के लिए ममता बनर्जी को चुनाव सभाओं में बार-बार अपील करनी पड़ रही है।

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