पश्चिम बंगालः बीजेपी में क्या सब सही नहीं चल रहा?
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को ज़बरदस्त झटका देते हुए राज्य की 42 में से 18 सीटों पर कब्ज़ा जमाने के बाद से ही बीजेपी को बंगाल में सत्ता का दूसरा सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है.
तेजी से बदलते राजनीतिक समकीरणों में वाम दल और कांग्रेस करीब हाशिए पर चले गए हैं. लेकिन क्या जिस बीजेपी के तृणमूल कांग्रेस का विकल्प होने का दावा किया जा रहा है उसमें अंदरखाने सब कुछ ठीक-ठाक है?
दिल्ली में एक सप्ताह तक चली सांगठनिक बैठक से और उसके बाद छन कर आने वाली खबरों पर भरोसा करें तो ऐसा नहीं लगता.
हालांकि, पार्टी के तमाम नेता इसे तृणमूल कांग्रेस, ममता बनर्जी और उनके राजनीतिक सलाहकार पी.के. यानी प्रशांत किशोर की साज़िश करार दे रहे हैं. लेकिन पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की मानें तो प्रदेश नेतृत्व के प्रति असंतोष लगातार गहरा रहा है.

कुछ नेताओं का ही बोलबाला
असंतुष्ट गुट के नेताओं का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष औऱ उके खासमखास रहे दो-तीन नेता ही पार्टी से संबंधित तमाम फैसले कर रहे हैं. इन मामलों में दूसरे नेताओं या सांसदों की राय नहीं ली जाती.
इन नेताओं ने दिल्ली में बीते सप्ताह हुई बैठक में भी खुल कर अपना दुखड़ा रोया था. बैठक खत्म होने से पहले ही मुकुल राय जैसे वरिष्ठ नेता की कोलकाता वापसी ने भी इन अटकलों को मज़बूती दी.
हालांकि, बाद में राय ने प्रेस कांफ्रेंस में सफाई दी कि वे बीजेपी में थे, हैं और रहेंगे. दूसरी ओर, केंद्रीय नेतृत्व ने मुकुल राय को शुक्रवार को फिर दिल्ली बुलाया है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कहीं आग लगी है तभी तो धुआं उठ रहा है. पार्टी का एक तबका इस बात से भी नाराज़ बताया जाता है कि दिलीप घोष अपने पसंदीदा नेताओं को ही बैठक के लिए दिल्ली ले गए थे.
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बैठक में ज़ाहिर हुई नाराज़गी
बीजेपी के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "बैरकपुर के सांसद अर्जुन सिंह ने दिल्ली की बैठक में बिना लाग-लपेट के अपनी बात रखी थी. उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और महासचिव (संगठन) सुब्रत चटर्जी के खिलाफ खुल कर नाराजगी जताई थी. सिंह ने साफ कह दिया था कि यह दोनों नेता सबको साथ लेकर चलने पर भरोसा नहीं रखते."
उस नेता के मुताबिक, सिंह ने साफ कहा कि घोष और उनके सहयोगी खासकर तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर पार्टी में आने वाले नेताओं को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं. उन्होंने अपनी मिसाल देते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस के गुंडों और पुलिस की ओर से परेशान किए जाने के बावजूद प्रदेश बीजेपी नेताओं ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया है.
बैठक में मौजूद एक नेता बताते हैं, "राज्य के एक अन्य सांसद ने शिकायत की कि प्रदेश नेतृत्व काम के आदमी को खाली बिठा कर अपनी पसंद के लोगों को आगे बढ़ा रहा है."
हालांकि, सांसद अर्जुन सिंह इन खबरों को निराधार बताते हैं. उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पार्टी में कोई मतभेद नहीं है. यह सब प्रशांत किशोर का उड़ाया हुआ है. मुझे न तो किसी से नाराजगी है और न ही कोई असंतोष. मैं पार्टी की तमाम योजनाओं में शामिल हूं."

उनका कहना था कि अगर कहीं कोई मतभेद हुआ भी तो उसे पार्टी के भीतर ही उचित फोरम में सुलझा लिया जाएगा. लेकिन फिलहाल ऐसी कोई बात नहीं है.
बीजेपी के पश्चिम बंगाल प्रभारी और वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय भी प्रदेश ईकाई में मतभेद की खबरों को प्लांटेड करार देते हैं.
बीबीसी से फोन पर बातचीत में उनका कहना था, "ममता की ओर से नियुक्त पी.के. की एजंसी अपने सियासी फायदे और बीजेपी को बदनाम करने के लिए ऐसी फर्जी खबरें प्लांट करा रही है. ममता आम लोगों में यह संदेश देना चाहती हैं कि बीजेपी में सत्ता पाने से पहले ही मतभेद बढ़ रहे हैं."
वह आरोप लगाते हैं कि सरकार ने पहले तो नौकरशाही का सिर्फ राजनीतिकरण ही किया था, अब उसका अपराधीकरण भी कर दिया है. हत्या को आत्महत्या में बदला जा रहा है. विजयवर्गीय कहते हैं, "हम ऐसे अधिकारियों पर नज़र रख रहे हैं. अगले साल पार्टी के सत्ता में आने के बाद उन पर कार्रवाई की जाएगी."

पार्टी की तैयारियां
दिल्ली की बैठक में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारियों का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि पार्टी ने अपनी रणनीति तैयार कर ली है. इसके तहत एक अगस्त से तमाम जिलों में वर्चुअल औऱ एक्चुअल मीटिंग का दौर शुरू हो जाएगा.
एक्चुअल मीटिंग में मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के अलावा कार्यकर्ताओं की संख्या को भी ध्यान में रखा जाएगा. हम कोरोना के मौजूदा दौर में तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल करेंगे.
ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ पार्टी के मुद्दे क्या होंगे? इस सवाल पर विजयवर्गीय बताते हैं, "चिटफंड, भ्रष्टाचार और सिंडीकेट जैसे मुद्दों के अलावा कोरोना के चलते लागू लॉकडाउन का पालन नहीं होना भी मुद्दा रहेगा. अल्पसंख्यक इलाक़ों में लॉकडाउन का सरेआम उल्लंघन किया जाता रहा है. सरकार की लापरवाही, गैर-जिम्मेदाराना रवैया और तुष्टिकरण की नीति की वजह से ही बंगाल में कोरोना ने विकराल रूप ले लिया है."

क्या कहते हैं दिलीप घोष
तमाम कथित असंतुष्टों के निशाने पर रहे प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष आखिर इस मुद्दे पर क्या कहते हैं?
घोष ने बीबीसी से कहा, "यह सब पार्टी को बदनाम करने की तृणमूल कांग्रेस की साजिश है. उसे जब लग रहा है कि बीजेपी सत्ता के करीब है तो इन हथकंडों का सहारा लेकर हमें बदनाम करने और पार्टी के कार्यकर्ताओं के मन में भ्रम पैदा करने का प्रयास कर रही है. मीडिया का इस्तेमाल करते हुए कभी मुकुल रॉय के साथ मेरे मतभेद की बात कही जाती है तो कभी बाबुल सुप्रियो और अर्जुन सिंह के साथ. अभी यह सब जारी रहेगा. इट इज पार्ट आफ द गेम."
वह बताते हैं कि दिल्ली की बैठक में 140 विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों और समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की गई. अब बाकी सीटों पर विचार के लिए 10 अगस्त के बाद फिर बैठक होगी. तमाम इलाक़ों में आम लोग आतंक में जी रहे हैं. विधानसभा क्षेत्रों में पांच-पांच लोगों के वर्चुअल प्रशिक्षण का काम भी एक अगस्त से शुरू हो जाएगा.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पार्टी के तमाम नेता लाख सफाई दें, कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है. बिना आग के धुआं नहीं उठ सकता.
एक पर्यवेक्षक सुनील सेनगुप्ता कहते हैं, "बीजेपी में पहले भी कई बार टिकटों के बंटवारे समेत कई मुद्दों पर असंतोष की छिटपुट सुगबुगहाट होती रही है. लेकिन यह पहला मौका है जब केंद्रीय नेताओं के सामने असंतोष खुल कर सतह पर आ गया है. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को समय रहते इस समस्या से निपटना होगा."
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