आखिरकार हम अपने दुश्‍मन से लड़ रहे हैं-चुशुल में शहीद तिब्‍बती सैनिक के थे आखिरी शब्‍द

नई दिल्ली। 30 अगस्‍त को पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच लाइन ऑफ एक्‍चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर जो कुछ हुआ, उसके बाद से ही माना जा रहा है कि भारतीय सेना आक्रामक मुद्रा में है। 29-30 अगस्‍त की रात पीपुल्‍स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के जवान पैंगोंग त्‍सो के दक्षिण में चुशुल सेक्‍टर में कब्‍जे की कोशिशें कर रहे थे। इस दौरान हुए संघर्ष में स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) ने चीनी जवानों को मुंहतोड़ जवाब दिया। इस पूरी कार्रवाई में तिब्‍बत के रहने वाले तेनजिन न्‍यामा भी शहीद हो गए। तेनजिन ने आखिरी बार अपने घर पर वीडियो कॉल के जरिए बात की थी। उनके आखिरी शब्‍द थे, 'आखिरकार हम अपने दुश्‍मन से लड़ रहे हैं।' हांगकांग से निकलने वाले साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्‍ट ने एक स्‍पेशल स्‍टोरी के तहत उनकी बहादुरी के बारे में बताया है।

1987 में बने थे एसएफएफ का हिस्‍सा

1987 में बने थे एसएफएफ का हिस्‍सा

51 वर्षीय तेनजिन न्‍यामा की फैमिली सन् 1966 में तिब्‍बत से भारत आई थी। सन् 1987 में जब उनकी उम्र सिर्फ 18 साल थी तो वह लेह स्थित इंडियन आर्मी के एक बेस पर पहुंच गए थे। उन्‍होंने यहां पर सेना से अनुरोध किया कि उन्‍हें उन तिब्‍बती सैनिकों के साथ शामिल किया जाए जो सीक्रेट फोर्स में शामिल हो रहे हैं। उनका परिवार मानता है कि वह एक बहादुर इंसान थे। उनकी मां दावा पालझोम की उम्र 76 साल है और उन्‍हें तेनजिन की तरफ से कही हुई हर बात याद है। एसएफएफ के 51 साल के कंपनी लीडर तेनजिन ने अपने घर पर अचानक ही वीडियो कॉल की थी। उनका घर लेह के तहत आने वाले एक छोटे से कस्‍बे चोगलाम्‍सार में है। यह एलएसी पर एक फॉरवर्ड पोजिशन है।

मां से कहा था, मेरे लिए प्रार्थना करना

मां से कहा था, मेरे लिए प्रार्थना करना

उनके 54 साल के भाई तेनजिन न्‍यावो ने बताया कि न्‍यामा उस समय थोड़ा परेशान से लग रहे थे। यह बात उन्‍हें ज्‍यादा परेशान करने वाली नहीं थी। तेनजिन और उनकी कंपनी ऐसी जगह पर थी जहां से बस कुछ ही किलोमीटर पर सेना, चीन को जवाब देने में व्‍यस्‍त थी। उन्‍होंने अपने भाई से कहा कि मां को बता दें कि 'एलएसी के हालात बहुत ही मुश्किल हैं।' उन्‍होंने घर पर वीडियो कॉल में कहा था, 'यहां पर अब कुछ भी हो सकता है।' न्‍याइमा के तीन बच्‍चे हैं जिसमें से सबसे छोटे बच्‍चे की उम्र 5 वर्ष है। लेकिन पत्‍नी से उनकी बात नहीं हो सकी थी। न्‍याइमा ने यह कहते हुए फोन रख दिया, 'हमारे लिए प्रार्थना करिएगा।' कुछ ही घंटों बाद न्‍याइमा की मृत्‍यु हो गई और सारी प्रार्थनाएं बेकार हो गई। जुलाई में न्‍याइमा आखिरी बार घर आए थे।

भारत की सुरक्षा कर्ज चुकाने जैसा

भारत की सुरक्षा कर्ज चुकाने जैसा

भाई की मानें तो उन्‍हें बाद में पता लगा कि एसएफएफ ने चुशुल में पहाड़‍ियों को कब्‍जे में करने में बहुत बड़ा रोल अदा किया था। कुछ ही देर बाद न्‍याइमा ने फिर घर पर कॉल किया। न्‍याइमा फिर पेट्रोलिंग पर चले गए। उनके भाई कहते हैं, 'जो तिब्‍बती एसएफएफ की यूनिट में हैं, वो सभी इसे एक मौके के तौर पर देखते हैं कि उन्‍हें कभी अपना देश वापस मिल सकेगा या फिर वो भारत की सुरक्षा करके इसके प्रति अपने कर्ज को चुकाना चाहते हैं।' न्‍याइमा का शव तिरंगे और स्‍नो लाइन फ्लैग में लिपटा उनके घर पहुंचा था। यह भारत में बसे तिब्‍बती शरणार्थियों का झंडा है। न्‍याइमा के भाई ने बताया है कि वह साल 1999 में पाकिस्‍तान के साथ हुई जंग में भी हिस्‍सा ले चुके हैं।

हर तिब्‍बती अपनी जमीन के लिए लड़ना चाहता है

हर तिब्‍बती अपनी जमीन के लिए लड़ना चाहता है

भाई कहते हैं, 'भारत में बसा हर तिब्‍बती चीन के खिलाफ लड़ना चाहता है। यह लड़ाई सिर्फ भारत के लिए नहीं होगी बल्कि यह हमारी जमीन, हमारी पहचान के लिए भी होगी जो हमसे छीन ली गई थी।' न्‍याइमा जिस एसएफएफ के साथ थे उसे 7 विकास के तौर पर जाना जाता है। नवंबर 1962 में चीन के साथ पहली जंग खत्‍म होने के बाद ये स्‍पेशल फोर्स अस्तित्‍व में आई। उस समय इंटेलीजेंस ब्‍यूरो (आईबी) के डायरेक्‍टर बीएन मलिक को इसका पहला मुखिया नियुक्‍त किया गया। आपको जानकर हैरानी होगी कि 22 या 7 विकास में तिब्‍बती नागरिकों को शामिल किया जाएगा, यह फैसला तब अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी सीआईए और आईबी ने मिलकर लिया था। यह वह दौर था जब तिब्‍बत में गुरिल्‍ला मूवमेंट जारी था। काफी ऑफिसर्स और जवान तब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में थे।

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