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Lok Sabha Chunav: मिर्जापुर में अपने दम पर हैट्रिक लगा पाएंगी अनुप्रिया, या मोदी मैजिक के भरोसे लड़ रहीं चुनाव

Uttar Pradesh Lok Sabha Election: उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 2014 में जिस तरह की कामयाबी मिली थी, उससे उसे देश की राजनीति बदलने में मदद मिली। पार्टी 80 में से 71 सीटें जीती और उसकी सहयोगी अपना दल (एस) को भी 2 सीटों पर सफलता मिली।

यूपी ने 10 साल पहले भाजपा को देश की राजनीति का सुपर पावर बना दिया था। तब राष्ट्रीय राजनीति में एक तरफ पार्टी की किस्मत चमकी, दूसरी तरफ तब उसकी सहयोगी पार्टी की एक युवा विधायक का भाग्य भी उसी तरह भाग्य चमक गया।

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अनुप्रिया के लिए कितना आसान, हैट्रिक का चांस?
अनुप्रिया पटेल एक दशक पहले यूपी की युवा एमएलए थीं और अब केंद्र सरकार की युवा चेहरा हैं। बीते 10 वर्षों में अपना दल (सोनेलाल) ने प्रदेश की राजनीति में बीजेपी की सबसे मजबूत सहयोगी के रूप में खुद को स्थापित किया है।

वह यूपी विधानसभा में बीजेपी और सपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन, सवाल है कि तीसरी बार मिर्जापुर में अनुप्रिया के लिए किस तरह की संभावनाएं दिख रही हैं।

जातीय समीकरण और कल्याणकारी योजना का भरोसा
अगर मोटे तौर पर देखें तो मिर्जापुर लोकसभा सीट का जातीय गणित एनडीए उम्मीदवार अनुप्रिया पटेल के पक्ष में नजर आता है। वहीं केंद्र सरकार की कुछ कल्याणकारी योजनाओं से भी उनको मदद मिलती दिख रही है। लेकिन,10 वर्षों के स्थानीय सांसद के तौर पर उनपर यह भी आरोप लगते हैं कि उन्होंने ज्यादातर अपनी कुर्मी जाति पर ही ध्यान दिया है।

मिर्जापुर में 49% आबादी ओबीसी की है और दलित-आदिवासी समुदाय की जनसंख्या भी 25% है। अपनी जाति के लोगों के लिए पक्षपाती होने के आरोपों के अलावा आदिवासियों के लिए महत्वपूर्ण जल जीवन मिशन को ठीक से लागू नहीं करने के भी आरोप उपर लगते हैं।

रविवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां उनके लिए चुनाव प्रचार करके गए हैं। यहां उन्होंने समाजवादी पार्टी पर उसके 2012 और 2014 के मेनिफेस्टो में पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की तरह ही मुसलमानों को आरक्षण देने का भी मुद्दा उठाया है। पीएम मोदी लगातार विपक्षी इंडिया ब्लॉक पर मुसलमानों के लिए ओबीसी, दलित और आदिवासियों की हकमारी का आरोप लगा रहे हैं।

सपा ने ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने का चला दांव
समाजवादी पार्टी ने पटेल की राह मुश्किल करने के लिए भाजपा के ही भदोही सांसद रमेश चंद बिंद को मौका दिया है। वह इसलिए सपा में चले गए क्योंकि पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। सपा की रणनीति ये है कि अगर यादव और मुसलमानों के साथ ही बिंद/निषाद/मछुआरा समुदाय का भी वोट जुड़ गया तो अबकी बार एनडीए के लिए चुनौती बढ़ाई जा सकती है।

मोदी मैजिक के भरोसे लड़ रहीं चुनाव?
लेकिन, जमीनी हालात कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। मसलन, ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार इसी समुदाय से आने वाली मंजू नाम की एक स्थानीय महिला से बात की गई तो उन्होंने अपना वह घर दिखाया, जो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बना है। वह बीजेपी के नाम पर वोट देने की बात कहती हैं।

हालांकि, समुदाय में इस बात को लेकर भाजपा के प्रति थोड़ी मायूसी जरूर दिख रही है कि उनका दर्जा ओबीसी से बदलकर अनुसूचित जाति नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सभी तरह की नाराजगियों पर भारी पड़ती दिख रही है।

पास के ही राम लखन निषाद तो उत्तर प्रदेश में आज एक्सप्रेसवे की बातें करके बच्चों की तरह उत्साहित हो जाते हैं। वह इसके लिए भाजपा की विकासवादी नीति के मुरीद बन गए हैं। वे कहते हैं, 'हमने कभी नहीं सोचा था कि हम ऐसी सड़कों पर चलेंगे! हमारे लिए यह बहुत बड़ी चीज है। हम विकास के लिए वोट डालेंगे।'

बीजेपी ने विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर को भी कॉरिडोर के रूप में विकसित करने पर ध्यान दिया है और स्थानीय स्तर पर यह मुद्दा भी उसके वोट बैंक को एक नई ताकत देता नजर आ रहा है।

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