#MeToo: सांसद, एडिटर, राजीव के प्रवक्‍ता, मोदी के मंत्री रहे एमजे अकबर का पूरा प्रोफाइल

नई दिल्‍ली। मुबशर जावेद अकबर जिन्‍हें दुनिया एमजे अकबर के नाम से जानती है। देश के जाने-माने पत्रकारों में शुमार रहे एमजे अकबर ने बुधवार को केंद्रीय विदेश राज्‍य मंत्री पद से इस्‍तीफा दे दिया। 17 अक्‍टूबर तक उन पर 20 महिलाएं यौनशोषण के आरोप लगा चुकी हैं। एमजे अकबर इस समय भाजपा के सदस्‍य हैं। MeToo मूवमेंट के तहत अब तक सबसे ज्‍यादा महिलाओं ने अगर किसी शख्‍स पर आरोप लगाए हैं तो वह हैं- एमजे अकबर। यह बात सच है कि एमजे अकबर आज बीजेपी में हैं, लेकिन वह कांग्रेस में भी रह चुके हैं। वह भी छोटे-मोटे पद पर नहीं, एमजे अकबर एक समय राजीव गांधी के प्रवक्‍ता थे।

अकबर के दादा हिंदू थे, जिन्‍होंने इस्‍लाम कबूल कर लिया था

अकबर के दादा हिंदू थे, जिन्‍होंने इस्‍लाम कबूल कर लिया था

एमजे अकबर का जन्‍म 11 जनवरी 1951 को हुआ। उनके दादा रहमतुल्‍ला धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने थे। वह हिंदू थे, लेकिन उनकी शादी मुस्लिम महिला से हुई थी। एमजे अकबर ने एक नॉवेल लिखा है, जिसका नाम है- ब्‍लड ब्रदर्स। यह नॉवेल उनके निजी जीवन से प्रभावित है। इस कहानी कुछ इस प्रकार है: कैसे एक बिहारी हिंदू मुसलमान बन जाता है। नॉवेल के मुताबिक, अकबर के पिता बंटवारे के वक्‍त पाकिस्‍तान चले जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद वापस भारत लौट आते हैं। कुछ महीने बाद ही उनके घर में पुत्र का जन्‍म होता है, जिसका नाम रखा गया- मोबशर जावेद अकबर यानी एमजे अकबर। अकबर की शुरुआती शिक्षा कोलकाता बॉयज स्‍कूल में हुई, इसके बाद उन्‍होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। नॉवेल में अकबर लिखते हैं कि उनके पिता कांग्रेस के सदस्‍य थे और चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार भी किया करते थे।

बिहार के किशनगंज से कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे अकबर

बिहार के किशनगंज से कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे अकबर

1989 लोकसभा चुनाव से पहले एमजे अकबर ने जर्नलिज्‍म छोड़कर राजनीति में आने का फैसला लिया था। अकबर ने बिहार के किशनगंज से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था, जो वह जीत भी गए थे। राजीव गांधी के प्रवक्‍ता थे, लेकिन उस चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्‍छा नहीं रहा था। हालांकि, एमजे अकबर की स्थिति पार्टी में मजबूत थी। राजीव गांधी से उनकी करीबी थी, इसलिए एमजे अकबर का रुतबा कायम रहा। 1991 में राजीव गांधी की हत्‍या हो गई। राजीव गांधी के बाद अकबर राजनीति में असहज महसूस करने लगे और 1992 में कांग्रेस पार्टी छोड़कर वापस पत्रकारिता में लौटे।

इस तरह बीजेपी के करीब आ गए एमजे अकबर

इस तरह बीजेपी के करीब आ गए एमजे अकबर

1990 के दशक में भारतीय जनता पार्टी जोर पकड़ने लगी थी। इसी दौरान एमजे अकबर मशहूर अंग्रेजी अखबार द एशियन एज की स्‍थापना की। यही वो समय था जब एमजे अकबर बीजेपी के शीर्ष नेताओं के करीब आने लगे। हालांकि, उनका अखबार हिंदुत्‍ववादी पॉलिटिक्‍स की आलोचना करता था, लेकिन इसके बाद भी लालू कृष्‍ण समेत टॉप बीजेपी लीडर्स के साथ अकबर के रिश्‍ते अच्‍छे रहे। 2004 में कांग्रेस किसी प्रकार से सत्‍ता में वापसी करने में कामयाब रही। आने वाले वर्षों में अकबर की स्थिति द एशियन एज में कमजोर होने लगी और उन्‍हें पद से हटा दिया गया। इसके बाद कुछ समय के लिए उन्‍होंने इंडिया टुडे में काम किया और द संडे गार्जियन नाम का अखबार भी शुरू किया। पत्रकारिता में लौटने के बाद अकबर का रुतबा वैसा नहीं था जैसा द टेलिग्राफ की लॉन्चिंग के वक्‍त उनका कद हुआ करता था।

2014 में मोदी के करीब आ गए एमजे अकबर

2014 में मोदी के करीब आ गए एमजे अकबर

2014 में एमजे अकबर नरेंद्र मोदी के करीब आ गए और पत्रकारिता को अलविदा कहकर वह एक बार फिर औपचारिक तौर पर राजनीति में आ गए। बीजेपी ज्‍वॉइन करने पर अकबर को पार्टी प्रवक्‍ता बनाया गया। हालांकि, बीजेपी में भी अकबर को नापंसद करने वालों नेताओं की लंबी लिस्‍ट है, लेकिन वह विरोध को दरकिनार करने में कामयाब रहे और विदेश राज्‍य मंत्री बना दिए गए।

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