UGC के नए नियमों पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का आया बड़ा बयान, बोले- 'कोई भेदभाव या दुरुपयोग नहीं होगा'
UGC New Rule: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियमों को लेकर देश भर में बवाल मच गया है और शिक्षण संस्थानों में नई बहस छिड़ गई है। UGC नियमावली पर मचे बवाल के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान आया है। शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान ने मंगलवार को मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए स्पष्ठ किया कि इस कानून के तहत किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि नियमों का कोई दुरुपयोग नहीं कर पाएगा।
शिक्षा मंत्री प्रधान ने स्पष्ट किया कि नए नियमों का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि किसी का उत्पीड़न। उन्होंने कहा "मैं बहुत विनम्रता से आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी का उत्पीड़न होने नहीं दिया जाएगा। भेदभाव के नाम पर किसी को भी कानून का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं रहेगा।"

शिक्षा मंत्री ने कहा- 'किसी के ऊपर भी अत्याचार या भेदभाव नहीं किया जाएगा'
प्रधान ने जोर दिया कि कानून का निष्पक्ष पालन यूजीसी, केंद्र और राज्य सरकारों का सामूहिक दायित्व है, और यह व्यवस्था पूरी तरह भारतीय संविधान के दायरे में है। निर्दोष छात्रों के फंसने की आशंकाओं पर, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विषय सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है। उन्होंने भरोसा दिलाया, "मैं सभी को आश्वस्त महसूस कराना चाहता हूं कि किसी के ऊपर भी अत्याचार या भेदभाव नहीं किया जाएगा।"
UGC का क्या है वो नियम जिस पर मचा है बवाल?
गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026' लागू किया है। इसका मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), महिला, और दिव्यांग छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के साथ भेदभाव को समाप्त करना है।
इन नियमों के तहत, प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में नौ सदस्यीय 'समानता समिति' (इक्विटी कमेटी) का गठन अनिवार्य है। इसमें संस्थान प्रमुख, तीन प्रोफेसर, एक कर्मचारी, दो सामान्य नागरिक, दो विशेष रूप से आमंत्रित छात्र और एक समन्वयक शामिल होंगे। यह समिति संस्थानों में समानता सुनिश्चित करने और शिकायतों का समाधान करेगी।
विरोध की प्रमुख वजह क्या है?
- UGC नियमों के अनुसार, समानता समिति में कुल नौ सदस्य होंगे।
- इनमें कम से कम पाँच सीटें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन और महिलाओं के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित होंगी।
- इस आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व पर चिंताएं उठी हैं।
- इसी चिंता ने विरोध और प्रदर्शन की स्थिति को बढ़ावा दिया है।
UGC के नए नियमों के विरोध में उठाए जा रहे ये सवाल
- आलोचकों का कहना है कि समानता समिति में सामान्य वर्ग (सवर्ण) के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं है, जिससे भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायतों की जाँच करते समय उनके दृष्टिकोण का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जा सकता।
- समिति में प्रतिनिधित्व की कमी के कारण सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक एकतरफा कार्रवाई या निर्णय का शिकार हो सकते हैं।
- नियमों के आधार पर यह धारणा बनाई जा रही है कि एक वर्ग हमेशा शोषित है और दूसरा शोषक, जिससे शैक्षणिक परिसरों में अविश्वास और तनाव का माहौल बन सकता है।
- कई सवर्ण संगठनों की चिंता है कि नियमों के तहत झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को अनावश्यक परेशान किया जा सकता है।












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