कर्नाटक हारे, अब त्रिपुरा में बढ़ी भाजपा की टेंशन, हिमंत सरमा-माणिक साहा में बिप्लब किसे बता रहे हैं 'बाहरी'?
भाजपा में अब आंतरिक संकट खुलकर सामने आने लगे हैं। कर्नाटक के बाद मणिपुर को लेकर पार्टी टेंशन में थी और अब त्रिपुरा में पूर्व सीएम बिप्लब देब ने पार्टी की चिंता बढ़ा दी है।

बीजेपी कर्नाटक में अभी-अभी बुरी तरह हारी है। मणिपुर में भी जातीय तनाव के बाद बीजेपी की सरकार की टेंशन बढ़ी हुई है। अब त्रिपुरा से भी जो बातें निकल कर सामने आ रही हैं, उससे लगता है कि इसी साल वहां दोबारा सरकार में वापसी के बाद भी पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।
त्रिपुरा बीजेपी में 'बाहरी' पर विवाद!
त्रिपुरा बीजेपी में विवाद की सुगबुगाहट पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के राज्यसभा सांसद और हरियाणा के प्रभारी बिप्लब कुमार देब की वजह से हुई है। उन्हें पिछले साल सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी और उनकी जगह माणिक साहा मुख्यमंत्री बने थे। अब देब प्रदेश भाजपा में 'बाहरी' के दखल को लेकर उंगलियां उठा रहे हैं।
हिमंत बिस्वा सरमा को 'बाहरी' बता रहे हैं बिप्लब?
बिप्लब देब इस मसले पर अगरतला में अपने करीबी नेताओं के साथ चर्चा भी कर चुके हैं और यह भी कह चुके हैं कि वह इसके बारे में पार्टी की लीडरशिप को भी बता चुके हैं। त्रिपुरा के पूर्व सीएम जिस 'बाहरी' की बात कर रहे हैं, उससे उनका इशारा असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर भी हो सकता है।
पूर्वोत्तर भारत में भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं हिमंत सरमा
गौरतलब है कि सरमा को बीजेपी नेतृत्व ने सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व में सत्ता में दोबारा वापसी के बाद भी असम का मुख्यमंत्री बनाया था। इसकी वजह ये है कि सरमा सिर्फ असम में ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत में कमल खिलाने के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते हैं। वह बीजेपी की अगुवाई वाले उत्तर पूर्व लोकतांत्रिक गठबंधन (NEDA) के संयोजक भी हैं।
पूर्वोत्तर में भाजपा का कमल खिलाने में सरमा का अहम रोल
बीजेपी की अगुवाई में जहां पूरे देश में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन है (NDA) है, वहीं पूर्वोत्तर के लिए NEDA बनाया गया है। इसके दम पर सरमा आज पूरे पूर्वोत्तर भारत में बीजेपी के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेता बने हुए हैं। अगर देब का इशारा सरमा की ओर है तो यह भाजपा के लिए बड़ी चिंता की बात हो सकती है। क्योंकि, बीजेपी ने नॉर्थ-ईस्ट से कांग्रेस का सफाया किया है, तो उसमें सरमा का रोल महत्वपूर्ण है।
बिप्लब के मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व भी सतर्क
बिप्लब देब ने प्रदेश में जिस 'बाहरी' दखल का मुद्दा उठाया है, उसको लेकर केंद्रीय नेतृत्व भी सतर्क हुआ है और उन्हें दिल्ली बुलाकर उनकी बात सुनी है। तथ्य यह भी है कि त्रिपुरा में भाजपा सत्ता में वापस जरूर हुई है, लेकिन उसका वोट प्रतिशत कम हुआ है और आदिवासी इलाकों में उसके हाथ से कई सीटें निकली भी हैं।
क्या माणिक साहा को 'बाहरी' बता रहे हैं बिप्लब?
सूत्र बताते हैं कि देब प्रदेश में अपने समर्थकों की उपेक्षा से नाराज हैं। ऊपर से सोनोवाल को तो मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया है, लेकिन इस मामले में बिप्ल्ब अभी तक खाली हाथ ही रह रहे हैं। ऐस में अगर वह अपने समर्थकों की उपेक्षा की बात कर रहे हैं, तो उनका इशारा मुख्यमंत्री माणिक साहा की ओर भी हो सकता है।
कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए हैं माणिक साहा
तथ्य यह है कि माणिक साहा भी कांग्रेस से भाजपा में आए हैं और यह भी तथ्य है कि 2022 में पार्टी ने उन्हें देब की जगह ही सीएम बनाया था। अपने सौम्य शख्सियत की वजह से चर्चित साहा के नेतृत्व में ही पार्टी को सत्ता में वापसी भी मिली है। हाल में वह यह भी कह चुके हैं कि उन्होंने त्रिपुरा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2024 के लोकसभा चुनाव में दो 'कमल' देने की ठान रखी है।
गौरतलब है कि त्रिपुरा में लोकसभा की दो सीटें हैं। पश्चिमी त्रिपुरा और पूर्वी त्रिपुरा और अभी भी दोनों सीटों से भारतीय जनता पार्टी के ही सांसद हैं। ऐसे में बिप्ल्ब देव का इशारा माणिक साहा की ओर होने की संभावना ज्यादा हो सकती है, जिनका अब प्रदेश में भाजपा संगठन और सरकार दोनों पर दबदबा हो चुका है, जिससे देब खुद को भी उपेक्षित महसूस कर सकते हैं।












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