अरविंद केजरीवाल पर फिर बड़ा हमला, पार्टी में नहीं है स्वराज
नई दिल्ली। जिस स्वराज के नाम पर आम आदमी पार्टी की बुनियाद रखी गयी थी वह अब नदारद हो गयी है। ये कहना किसी और का नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के ही एक अहम सदस्य का है। आप नेता राकेश गर्ग ने एक ब्लॉग लिखकर पार्टी में लोकतंत्र और स्वराज पर सवाल उठाये हैं।

ऐसी कमरोें में कैसे बनने लगी योजनाएं
गर्ग ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि AC कमरों और गाडियों का आराम छोड़कर जंतर मंतर पर बिना गद्दे और तकिये के बिताये वो दिन सचमुच यादगार है। ये वो दिन थे जब नींद 16 घंटे के बजाय 70 घंटे काम करने के बाद आती, और फिर 2 अगस्त की वो शाम जब अन्ना जी ने राजनैतिक विकल्प देने की घोषणा कर दी।
पत्नि ने तलाक देने तक की धमकी दे डाली
वहीं गर्ग लिखते हैं कि टीवी पर खबर देखते ही पत्नी का फ़ोन आया. उसने कहा "तुरंत वापस आ जाओ, हमें बेवकूफ बनाया गया है। आन्दोलन के नाम पर हमारी भावनाओ से खेलकर ये लोग राजनीति कर रहे है"। याद होगा आपको मैंने बताया था, उसने मुझे तलाक की धमकी तक दे डाली थी। अगली मुलाकात में आपने पूछा था "अब क्या कहती है भाभी जी?" अब तक तो मैं उसे समझाता रहा लेकिन आज क्या जवाब दू?
मनीष सिसोदिया की जी हुजूरी नहीं कर सकता
मनीष जी ने मुझसे कहा था "अच्छे लोग अपनी जिम्मेदारियों से भागते है, और फिर शिकायत करते है की राजनीति गन्दी है। आपको जिम्मेदारी लेनी होगी डॉ साहब"। मनीष ने मुझे भावुक तर्कों के साथ राजस्थान प्रदेश का कार्यकारिणी बनाकर सचिव पद की जिम्मेदारी दी। उस वक्त मैंने कहा था कि "आजादी की लड़ाई का सिपाही हूं, गुलामी अपने सेनापति की भी नहीं करूँगा"।
मेरे तेवर मनीष ने उसी दिन ही भांप लिए होंगे। यदि जी हुजूरी करनी होती तो इतना संघर्ष ही क्यों करते? क्या हमें आज राजनीति में अपना भविष्य बनाने को आये, जी हुजूरी करने वाले लोगो की ही आवश्यकता रह गई? सवाल पूछने वालो की नहीं?
80 वर्ष के बुजुर्ग का खुलेआम अपमान हो रहा
आज शांति भूषण जी जैसे वरिष्ठ सदस्य का खुले आम अपमान हो रहा है। 80 साल की उम्र में क्या पार्टी के उस साधारण सदस्य को अपनी राय रखने का अधिकार नहीं? संविधान की धारा VI A (a) iv में हमने लिखा है की पार्टी के हर सदस्य को (जो जिम्मेदार पदों पर नहीं है) अपनी राय सार्वजनिक मंच पर रखने का अधिकार होगा। क्या हमारी पार्टी में अब भिन्न राय रखने वालो को गद्दार ही कहा जाएगा?
अब पार्टी में राय रखने में भय लगता है
मैं अरविंद के पास 12 हजार लोगो के दस्तखत लेकर आया था निवेदन करने की आप सुरक्षा लीजिये। आपने कहा था "इस आन्दोलन का एक लक्ष्य यह भी है की लोगो के मन से भय समाप्त हो, वो बोलने की हिम्मत जुटा सके" लेकिन वास्तविकता यह है की आज सच कहने में ही भय लगता है। आज जो आपसे सवाल करने की हिम्मत जुटाए उसे गद्दार, देशद्रोही और जाने किन किन नामो से आप की सोशल मीडिया टीम नवाजती है, क्या हम वास्तव में एक भय मुक्त समाज बना रहे है?
अरविंद को आलोचना नहीं पसंद
330 संस्थापक सदस्यों ने मिलकर पार्टी बनायीं. देश भर के 300 से अधिक जिलो में हमारी इकाईया हैं। 28 मार्च की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में औपचारिकताये पूरी होगी, 31 मार्च को इन सभी की सदस्यता समाप्त होगी और फिर उम्मीद है की सवाल पूछने वाले उस परिषद् के सदस्य नहीं होंगे। जानता हूं की आपको आलोचना पसंद नहीं लेकिन मुझे चापलूसी पसंद नहीं। आपकी तारीफ करने वाले तो करोडो है, सौ दो सौ तो सवाल पूछने वाले भी हो?
टोपी की लाज रख लो अरविंद
अंत में "आप" की सोशल मीडिया फ़ौज से हाथ जोड़कर निवेदन -राजनीती में भविष्य बनाने के लिए आये लोग सवाल नहीं पूछते। दिल्ली में इतनी बड़ी जीत मिलने के बाद सवाल पूछने का साहस कोई समझदार नेता नहीं कर सकता। ये हिम्मत तो वही कर सकते है जिन्हें अपने नहीं इस वैकल्पिक राजनीति के सपने की फ़िक्र हो। हमने आन्दोलन में अपनी भूमिका ऐसे ही निभाई। हमें न टिकट चाहिए, न पद, न कोई सम्मान।
बस एक निवेदन है इस टोपी की लाज रखे। सवाल पूछने वालो को अपमानित करने के लिए इतना निचे न गिरे की इस टोपी की गरिमा को चोट पहुंचें। जाने कितने परिवार स्वाहा हुए इस टोपी को बनाने में।
अरविंद आपको क्या हो गया है
अपने विचार निश्चित पार्टी के अंदरुनी मंच यानि राष्ट्रिय परिषद् में ही रखता। लेकिन दुर्भाग्य से उस मंच पर बोलने का मौका न पिछले 3 साल में मिला न आगे मिलने के आसार दिख रहे है। अरविन्द "आप" को क्या हो गया?












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