तेलंगाना... पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त

नई दिल्ली। एक लम्बे संघर्ष के बाद तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा तो मिल गया पर अब भी कई आशंकाएं इसके साथ जुडी हुई हैं। यूं तो केन्द्र सरकार और कांग्रेस चाहती तो वे अपनी सूजबूझ से, संवेदनशीलता से इस मुददे को शान्त कर सकती थी जिससे न देश की शांति भंग होती और न ही हिंसा का जो विभत्स नृत्य इस विवाद ने दिखाया वो देश को देखना पड़ता रास्ते और भी निकाले जा सकते थे।

बहरहाल अगर आप यह सोच रहे हैं कि राज्यसभा में पारित हो चुके बिल पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद सब ठीक हाे जायेगा, तो हम यहां फिल्म ओम शांति ओम का डायलॉग याद दिलाना चाहेंगे- पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त....

जो भी हुआ अब समय उससे आगे बढ़ के सोचने का है। वक्त के साथ इस विवाद से मिलने वाले ज़ख्म भी भर जाएगें पर मुश्किले अभी और भी हैं. सिर्फ राज्य का बंटवारा कर देने से समस्या का अन्त नहीं हुआ। यूपीए सरकार का लोकसभा चुनाव के इतने समीप आकर यह निर्णय एक चुनावी हथकण्डा है या नहीं यह एक अलग आलोचना का मुददा है पर यह तो तय है कि कांगे्रस ने राजनीतिक -दृष्टि से अपने हित में जो दाव खेली है उसका परिणाम आन्ध्रा और तेलंगाना दोनों के लिये कई शंकाएं प्रकट कर देता है़।

जो भी हो सरकार को यह समझ जाना चाहिए कि इस विवाद को केवल विशेष वित्तीय प्रबंध से सुलझा पाना संभव नहीं है। आज भले ही सरकार मानती हो कि तेलंगाना का बंटवारा करके उसने उचित कदम उठाया है पर इस विभाजन से सिर्फ दो प्रान्त भौगोलिक रुप अलग नहीं हुए बलिक इस विभाजन ने दो संस्कृतियों में, दो समुदायों में परस्पर आत्मीयता की भी सभी संभावनाओं को मिटा दिया है। जातीयता की यह पाट अब इतनी खिंच गई है कि दोनो पक्ष एक दूसरे के शत्रु बन गए हैं। ऐसे में इनसे किसी भी प्रकार की साझेदारी और समझौते की उम्मीद करना बहुत मुश्किल है।

जी हां ये वो शंकाएं हैं जो आगे चलकर समस्याओं के रूप में देश के सामने उत्पन्न होने वाली हैं। स्लाइडर में तस्वीरों में कार्टून के सामने पढ़ेें वो समस्याएं व सवाल-

महत्वकाक्षांओं को पूरा कर पाएगी?

महत्वकाक्षांओं को पूरा कर पाएगी?

1. क्या सरकार तेलंगाना में बसे हुए सीमान्ध्र के लोगों और आन्ध्रप्रदेश के लोगों जो अभी तेलंगाना में हैं उनकी समस्याओं को, महत्वकाक्षांओं को पूरा कर पाएगी?

क्या सरकार इनके भय को कम कर पाएगी?

क्या सरकार इनके भय को कम कर पाएगी?

2. सीमान्ध्र और आन्ध्रप्रदेश के ये लोग जिन्होंने अपने सामने हिंसा का विकराल-दृश्य देखा है, क्या सरकार इनके भय को कम कर पाएगी, क्या सरकार इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी को पूर्ण रुप से निभा पाएगी?

राजधानी बनाने का फैसला

राजधानी बनाने का फैसला

3. वैसे तो सरकार तेलंगाना में आन्ध्रा के अवशिष्ट भाग को विशेष दर्जा देने की और पिछडें वर्ग को विशेष विकास पैकज देने की बात कर रही है पर अब भी सवाल हैदराबाद में बसे उन लोगों की जिंदगी और आजिविका की सुरक्षा का है जो गैर तेलंगानाई हैं और वो भी तब जब हैदराबाद को दस साल के लिये आन्ध्रा और तेलंगाना दोनों की राजधानी बनाने का फैसला किया गया है।

कोई विशेष प्रबंध किया है?

कोई विशेष प्रबंध किया है?

4. यूं तो सरकार की योजना है कि हैदराबाद के राज्यपाल को विषेश कानून और व्यवस्था की शक्तियाँ दी जाएगीं जिससे सीमान्ध्र के लोग जिन्हें बाहरी कहा गया है की सुरक्षा तथा पूरे हैदराबाद की सुरक्षा और बेहतर ढग से हो पाएगी। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि जैसे सरकार इस राजधानी के लिये विशेष प्रबंधन कर रही है क्या इस नए राज्य के प्रशासन के लिए भी सरकार ने कोई विशेष प्रबंध किया है?

केन्द्र सरकार का नियंत्रण होगा?

केन्द्र सरकार का नियंत्रण होगा?

5. क्या हैदराबाद के प्रशासनिक निर्वाचन की प्रक्रिया लोकतांत्रिक ढग से होगी या इस पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण होगा?

हैदराबाद की मांग

हैदराबाद की मांग

6. सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या हैदराबाद को सीमान्ध्र लोगों की मांग के तौर पर पंजाब और हरियाणा की राजधानी चण्डीगढ की तर्ज पर ही केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया जाएगा?

कामयाब होगा?

कामयाब होगा?

7. क्या एक राजधानी के रुप में हैदराबाद तेलंगाना और आन्ध्रा के बीच में संतुलित तालमेल बैठाने में कामयाब होगा?

तेलंगाना के विवाद

तेलंगाना के विवाद

8. तेलंगाना के विभाजन के बाद से संसाधनों का, सुरक्षा का बंटवारा, वहां के लोगों की राज्य स्तरीय पहचान का मुददा सरकार के लिए, वहां के बाश‍िन्दों के लिए परेशानी का एक सबब बन सकता है, क्योंकि तेलंगाना के विवाद के बाद से जो छवि उभरी है उससे यह उम्मीद लगाना बहुत मुश्किल है कि दोनो पक्षों के लोग किसी भी समझौते के लिए आसानी से राज़ी होंगे।

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