Telangana Election Results: तेलंगाना में रिजल्ट के बाद की राजनीतिक तस्वीर क्या होगी? 5 संभावनाएं

Telangana Vidhan Sabha Election Result 2023: तेलंगाना में मतदान के दिन तक कांग्रेस के नेता 199 सीटों वाली विधानसभा में 70 सीटें आने की स्थिति में भी विधायकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित नजर आ रहे थे। कर्नाटक से पार्टी की नव-निर्वाचित 'एमएलए रेस्क्यू' टीम बुला ली गई थी।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक परिणामों में वही तस्वीर उभर कर सामने आई है। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उसे 64 सीटें मिली हैं। लेकिन, 70 के आंकड़े से काफी दूर रह गई है, जो वह अपने लिए सुरक्षित मान रही थी।

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कांग्रेस-बीआरएस में वोट शेयर में मात्र 2% का मार्जिन
खासकर जिस तरह से कांग्रेस और सत्ताधारी भारत राष्ट्र समिति के वोट शेयर में करीब 2% का अंतर है, उसको लेकर बीआरएस को हार का तो मलाल है, लेकिन वह प्रदेश की राजनीतिक सीन से नकारी नहीं गई है।

तेलंगाना के भविष्य की राजनीतिक तस्वीर ?
ऐसे में समझते हैं कि तेलंगाना में आने वाले दिनों में राजनीतिक तस्वीर क्या हो सकती है-

70 से दूर रहेगी कांग्रेस
कांग्रेस ने राज्य में बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार कर लिया है। लेकिन,वह 119 सीटों में से 70 का आंकड़ा नहीं पार कर सकी है। ऐसे में कांग्रेस सरकार तो बना लेकिन, मजबूत विपक्ष को देखते हुए उसके स्थायित्व पर सवालिया निशान लगा रह सकता है। इसकी आशंका कांग्रेस के अंदर खाने ही सामने आ चुका है। इसके लिए वनइंडिया की यह रिपोर्ट देखी जा सकती है।

पहली संभावना
अगर तेलंगाना में कांग्रेस और उसकी सहयोगी सीपीआई बहुमत के आंकड़े से पिछड़ती तो त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल का रोल अहम हो सकता था। परंपरा के अनुसार वह सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस को सरकार बनाने का न्योता दे सकते थे। लेकिन, यह नौबत नहीं आई है।

दूसरी संभावना

तेलंगाना में 39 सीटों के साथ भारत राष्ट्र समिति मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है। इसके बाद बीजेपी 8 और एआईएमआईएम 7 सीटों पर जीती है। सीपीआई एक सीट जीती है, जो कांग्रेस की सहयोगी है।

कांग्रेस को इसी स्थिति की चिंता सताती रही है और उसके नेताओं के दिल में हॉर्स ट्रेडिंग का डर बैठा हुआ है।

राजनीति में कोई किसी का स्थाई दुश्मन नहीं होता
इधर बीआरएस और एआईएमआईएम में पहले से ही रणनीतिक तालमेल रही है। बीजेपी के नेताओं ने चुनाव के दौरान बीआरएस के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर जोरदार हमले किए हैं। लेकिन, 'राजनीति में कोई किसी का स्थाई दुश्मन नहीं होता' का तर्क यहां की सियासी फिजा कभी भी बदल सकती है। ऐसी आशंका खुद कांग्रेस के नेताओं के मन में ही नजर आ चुका है।

जम्मू और कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के साथ भाजपा का गठबंधन और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का कांग्रेस के सामने पूर्ण सरेंडर इसके ऐतिहासिक उदाहरण हैं।

तीसरी संभावना

वैसे भाजपा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के सहयोग पर टिकी बीआरएस की सरकार भी स्थाई होती, यह बहुत बड़ा सवाल बना रहता। इस समीकरण की वजह से तीनों ही दलों में भयानक आंतरिक असंतोष उभरने की संभावना पैदा हो सकती थी, खासकर बीजेपी और एआईएमआईएम में।

चौथी संभावना
भारतीय जनता पार्टी तेलंगाना में लंबी लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में है। इस वजह से एक विकल्प ये हो सकता था कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए वह विश्वास मत के दौरान वॉकऑउट करके बीआरएस की सरकार बनवा सकती थी। लेकिन, यह सरकार टिकाऊ होती इसकी संभावना नहीं थी।

पांचवीं संभावना
अंतिम संभावना में एक यह भी थी कि भाजपा ऐसी सरकार को किसी तरह से लोकसभा चुनाव तक खींच सकती थी। उसके बाद राष्ट्रपति शासन में लोकसभा चुनावों के साथ ही राज्य विधानसभा के लिए भी फिर से चुनाव करवाया जा सकता था।

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