तमिलनाडु: वाचाती का 30 साल पुराना बलात्कार का मामला और इंसाफ का लंबा सफर

1992 में तमिलनाडु के वाचाती गांव की अठारह महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था. 2011 में एक स्पेशल ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में 215 सरकारी अफ़सरों को दोषी ठहराया था.

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वाचाती केस एक नज़र में

  • घटना का दिन - 20 जून 1992
  • पीड़ितों की संख्या - 217 ( 94 महिलाएं और 28 बच्चे)
  • बलात्कार की शिकार महिलाएं - 18
  • दोषी करार दिए गए अफ़सर - 215 (दोषियों में वन विभाग, पुलिस और रेवेन्यू विभाग के अफ़सर शामिल)
  • बलात्कार के दोषी अफ़सर - 17
  • 1995 में एफ़आईआर दर्ज हुई, इसी साल ट्रायल कोर्ट का गठन
  • 2011 तक सुनवाई के दौरान 54 अफ़सरों की मौत
  • 2011 को ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला आया
  • आने वाले कुछ हफ्तों में इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट का फ़ैसला आ सकता है

"उन्होंने हमारे साथ रेप किया, हमें बुरी तरह मारा-पीटा. हमें पूरे गांव से रोने और चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थी." - ये 20 जून 1992 की रात को वाचाती गांव में घटी एक घटना का ब्योरा है जो एक रेप सर्वाइवर दे रही हैं.

वो कहती हैं, "मैं उस वक्त़ सिर्फ 13 साल की थी. मैं उनके सामने रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा. मैं नहीं जानती उनके भर में भाई-बहन होंगे या नहीं या फिर उनके घर में कोई लड़की होगी कि नहीं."

वाचाती हमला और रेप केस भारत की अदालतों में चलने वाले सबसे लंबे मुकदमों में से एक है.

1992 में तमिलनाडु के वाचाती गांव की अठारह महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था. उस वक्त तमिलनाडु सरकार के अफ़सरों ने गांव पर छापा मारकर वहां के सैकड़ों गांववालों को बुरी तरह पीटा था.

गांववालों पर चंदन की लकड़ी की तस्करी में शामिल होने का शक़ था. लिहाज़ा उन्हें सबक सिखाने के लिए पुलिस और वन विभाग के अफ़सरों के साथ कई सरकारी अफ़सर गांव पहुंचे थे.

वाचाती पश्चिम तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में सिथेरी पहाड़ियों के नीचे बसा आदिवासी गांव है. सिथेरी की पहाड़ियां चंदन के पेड़ों के लिए मशहूर हैं.

20 जून 1992 को इस गांव की 18 महिलाओं का बलात्कार हुआ, उनके साथ मार-पीट हुई. ये दरिंदगी लगातार दो दिनों तक चलती रही.

उस दिन क्या हुआ था?

वाचाती गांव आदिवासियों का है और यहां के लोग दलित वर्ग में आते हैं.

20 जून 1992 को वाचाती में आदिवासी और दलित समुदाय के कम से कम 100 ग्रामीणों की पिटाई की गई. उनके घरों को लूटा गया, उनके मवेशी छीन लिए गए.

2011 में एक स्पेशल ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में 269 में से 215 सरकारी अफ़सरों को दोषी ठहराया.

पुलिस और वन विभाग के अफ़सरों को 'दलितों पर अत्याचार' के आरोप में दोषी ठहराया गया. सुनवाई के दौरान जिन लोगों को दोषी ठहराया गया था उनमें से 54 की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी.

स्पेशल ट्रायल कोर्ट ने 2011 में इस केस में जिन दोषी अफ़सरों को जेल की सज़ा सुनाई थी उन्होंने इसके ख़िलाफ़ अपील की थी. अब मद्रास हाई कोर्ट इस पर अपना फै़सला सुना सकता है.

वाचाती गांव में बरगद के नीचे बैठी रेप सर्वाइवर महिलाओं के एक समूह की उस घटना को याद करते हुए बताया, "हमें गाली दी गई. उन लोगों ने हमें पहले पीटा और हमारे साथ बलात्कार किया. क़ानूनी लड़ाई लड़ते हुए हमें 30 साल हो गए हैं लेकिन उस दिन बहा हमारा खू़न आज भी हमें बहता हुआ लग रहा है. वो मंज़र आज भी हमारे दिलो-दिमाग़ पर छाया हुआ है."

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वाचाती की घटना एक टर्निंग प्वाइंट

1990 के दशक में तमिलनाडु सरकार चंदन तस्कर वीरप्पन को पकड़ने के लिए सिथेरी पहाड़ियों से सटे गांवों और सत्यमंगलम के जंगलों में कई अभियान चला रही थी.

इन अभियानों के दौरान ग्रामीणों से अक्सर कड़ी पूछताछ की जाती थी, उन्हें कई तरह की यातनाएं भी दी जाती थीं.

20 जून को गांव पर पड़ा छापा ऐसे ही एक अभियान का हिस्सा था. पुलिस और वन विभाग के अधिकारी गांव में घुसकर लोगों से चंदन तस्करी के बारे में पूछताछ करने लगे.

पूछताछ के दौरान गांववालों और वन विभाग के अफ़सरों के बीच कहासुनी शुरू हो गई. इस मामले में गांववाले खुद को बेक़सूर बता रहे थे.

झगड़ा इतना बढ़ा कि दोनों तरफ से एकदूसरे पर हमले होने लगे. कुछ ही घंटों में वहां सैकड़ों पुलिसकर्मी, वन विभाग के अफ़सर और रेवेन्यू अफ़सर पहुंच गए. गांववालों का कहना है कि इन लोगों ने घरों में तोड़-फोड़ मचाई और 18 महिलाओं के साथ (जिसमें बच्चियां भी शामिल थीं) बलात्कार किया.

बलात्कार की शिकार एक महिला उन दिनों स्कूल में पढ़ती थीं. उन्होंने कहा कि इस घटना की वजह से उनका बचपन छिन गया. वो कहती हैं कि इस घटना की वजह से उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा.

उन्होंने बताया, "हम लोगों को तालाब के नज़दीक ले जाया गया. वहां से हमें रात को अफ़सर पुलिस थाने ले गए. हमें रात भर सोने नहीं दिया गया. जब मैंने उनसे दया की भीख मांगी और कहा कि मैं स्कूल में पढ़ती हूं, कम से कम मेरी उम्र पर रहम करें, तो उनमें से एक रेंजर ने मुझे गाली दी और कहा कि स्कूल में पढ़ कर क्या करोगी. मेरी बहन, चाचा, चाची, मां और मुझे वे लोग सेलम जेल ले गए."

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इस घटना पर उपन्यास लिख चुके लेखक और वकील ए. बालामुरगन ने कहते हैं, "इस तरह के सर्च ऑपरेशनों में बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन वाचाती की घटना के शिकार लोगों ने अपने ख़िलाफ़ हुए अत्याचार और रेप पर खुलकर आवाज़ उठाई और सीपीएम की मदद से सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुकदमे दर्ज किए."

"इन महिलाओं की आवाज़ ने सरकारी अधिकारियों के चेहरे को बेनकाब कर दिया था. इन्होंने ये बात साबित की कि सरकार आदिवासियों की सुरक्षा करने में नाकाम रही थी. वाचाती केस ने आदिवासियों को मुखर और मज़बूत किया था. वे अत्याचार के ख़िलाफ़ एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे."

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जुल्म की ख़ौफ़नाक दास्तान

जहां एक तरफ महिलाओं के एक समूह के साथ बलात्कार किया गया तो दूसरी तरफ कुछ महलाओं को लाठियों से बुरी तरह पीटा गया.

90 से ज्यादा महिलाओं और 20 बच्चों को एक महीने से ज्यादा वक़्त तक जेल में बंद रखा गया. कुछ महिलाएं तीन महीने बाद जेल से लौटीं.

हमने एक और रेप सर्वाइवर से बात की, जो उस वक़्त आठ महीने की गर्भवती थीं.

उन्होंने बताया, "उन्हें पता था कि मैं गर्भवती हूं फिर भी उन्होंने मुझे बुरी तरह पीटा. अफ़सर गंदी गालियां दे रहे थे. मैंने अपनी बड़ी बेटी माला को कसकर पकड़ रखा था. चूंकि गांव के कई सारे पुरुष जंगल में छिपे थे इसलिए हम लाचार थे. गांव में सिर्फ़ छोटे बच्चे और बुजुर्ग बचे थे इसलिए हम खुद को बचा नहीं सके. मैंने तीन महीने जेल में बिताए, मेरी बच्ची वहीं पैदा हुई. मैंने उसका नाम जेल रानी रखा था. लेकिन वो जिंदा नहीं बची."

इस महिला ने दिखाया कि इस घटना के बाद से वो किस कदर कमज़ोर हो गई हैं. बात करते हुए उनकी आवाज कांप रही थे, शरीर भी कांप रहा था. उनका चेहरा दर्द और डर से सूख गया था.

सभी 17 बलात्कार पीड़ितों का भी यही हाल था. हमले की डरावनी रात को याद करके वो आज भी सिहर उठती हैं.

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20 जून 1992 की रात के बाद गांववाले घरों से भाग गए थे. वो कई महीनों बाद वापिस लौटे लेकिन तब तक सब कुछ ख़त्म हो गया था.

गांव के कई घर जला दिए गए थे. उनके मवेशियों की मौत हो गई थी. कपड़े और सामान घरों से बाहर फेंक दिए गए थे. गांववालों को कुओं में भी मवेशी मरे पड़े मिले थे.

एक ग्रामीण ने बताया "हम कुएं से पानी नहीं ले सकते थे क्योंकि वो पीने लायक नहीं था. जानवरों को कुंओं में डाल दिया गया था और वो सड़ गए थे. दोबारा ज़िंदगी शुरू करने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था. मेरे लिए अपने तीन बच्चों का पेट भरना मुश्किल हो गया था. उन्होंने अनाज में कांच के टुकड़े मिला दिए गए थे. हमारे बर्तन तोड़ दिए गए थे और कपड़े भी जला दिए गए थे. मुझे लग रहा था कि इससे तो जेल अच्छी है, कम से कम वहां हमें कुछ खाने को तो मिल जाता था."

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केस की सुनवाई में इतनी देर क्यों?

आदिवासियों की इंसाफ की लड़ाई में मदद करने वाले माकपा नेता षणमुगम कहते हैं, "इस गांव का लगभग हर व्यक्ति इस हमले का शिकार था. इन्हें सामान्य जिंदगी शुरू करने में लगभग एक दशक लग गया."

उन्होंने कहा "कई महिलाएं आज भी उस दिन के बारे में बात करने से डरती हैं. कई महिलाओं को अदालत में पेश किए जाने पर मजिस्ट्रेट के सामने मुंह बंद रखने की धमकी दी गई. उनसे कहा गया था कि अगर मुंह खोला तो सारी जिंदगी जेल में सड़ना पड़ेगा."

"हमने गांव में इस हमले के ख़िलाफ़ एक के बाद एक कई विरोध प्रदर्शन किए थे. लिहाज़ा इससे आदिवासी महिलाओं में भी थोड़ा आत्मविश्वास पैदा हुआ और वो हमारे सामने सामूहिक बलात्कार के बारे में बात करने लगीं."

"जब हमने मद्रास हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की तो उसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि सैकड़ों सीनियर अफ़सर इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते. इसके बाद हमने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट को याचिका की सुनवाई का निर्देश दिया. फिर ये केस सुना जाने लगा."

"सीबीआई की ओर से इस मामले में 269 अधिकारियों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दाखिल किए जाने बाद एक स्पेशल कोर्ट का गठन किया गया. लेकिन 20 साल की सुनवाई के दौरान अभियुक्तों में से 54 अधिकारियों की मौत हो चुकी थी."

2011 में कोर्ट ने अपना फै़सला सुनाया. मामले में 215 अफ़सर दोषी ठहराए गए. इनमें से 12 को दस साल की कैद की सज़ा दी गई, पांच को सात साल की जेल की सज़ा मिली और बाक़ी 198 अफ़सरों को दो से दस साल तक की कैद की सज़ा मिली."

सजा के खिलाफ अपील

वाचाती मामले में जो 215 अफ़सर दोषी ठहराए गए थे उनमें से कुछ ने खुद को बेकसूर बताया था.

उनका कहना है कि उन पर अपनी ड्यूटी निभाने की वजह से आरोप लग रहे हैं. उन्होंने तो अपनी ड्यूटी निभाते हुए ग्रामीणों को वीरप्पन की तस्करी नेटवर्क का हिस्सा बनने से रोका था.

एडवोकेट गांधीकुमार मद्रास हाई कोर्ट में ऐसे 43 अफ़सरों के केस लड़ रहे हैं. निचली अदालत के आदेश के 110 पन्ने अपने हाथ में लिए हुए वो कहते हैं उनके मुवक्किल इस मामले से बेदाग निकल आएंगे.

वो कहते हैं, "सीबीआई ने ऐसे कई अधिकारियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की है जो उस दिन ड्यूटी पर नहीं थे. मेरा एक मुवक्किल मेडिकल लीव पर था. लेकिन उन पर अभियोग चलाया गया और उन्हें दो साल की सज़ा सुनाई गई. उनका कहना है कि रेप पीड़िताओं की ओर सुनाई गई कई घटनाएं संदिग्ध लग रही हैं."

इंसाफ़ का लंबा इंतजार

आज 30 साल बाद वाचाती गांव जून 1992 की उस भयावह घटना से बहुत आगे निकल चुका है. अब यहां फूस की छतें काफ़ी कम दिखती हैं. गांव में अधिकतर लोगों के पास अब खपरैल की छतों वाले मकान हैं और लगभग हर बच्चा स्कूल जाता है.

एक-दो जनरल स्टोर की दुकानें भी दिखती हैं. कुछ युवा ट्रेंडी बाइक लिए गांव में घूमते दिख हैं. ज्यादातर गांववालों के हाथों में आज मोबाइल फ़ोन है. लगभग हर घर में टेलीविज़न है.

गांव के कई लोग बेहतर जीवन का सपना लिए आसपास के शहरों में बुनाई मिलों में काम कर रहे हैं.

सबसे बड़ी बात तो है कि वाचाती गांव के पांच युवकों ने हाल ही में प्रतियोगिता परीक्षा पासकर पुलिस सेवा में जूनियर रैंक की नौकरी शुरू की है.

लेकिन गांव के बीच खड़ा विशाल बरगद का पेड़, जो उस क्रूर दिन का गवाह था आज भी वहीं खड़ा है. आज वह आदिवासी बस्ती की महिलाओं, पुरुषों और नए युवाओं के लिए चौपाल बन गया है.

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