ताजमहल: शाहजहां और मुमताज़ महल का निकाह और वो पांच साल..

शाहजहां और मुमताज
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शाहजहां और मुमताज

नवरोज़ का जश्न था. नए साल की ख़ुशी में मीना बाज़ार को सजाया गया था.

महल की महिलाएं दुकानें सजा कर ज़ेवर, मसाले और दूसरी चीज़ें बेच रही थीं ताकि इससे होने वाली आमदनी से ग़रीबों की मदद की जा सके.

चूंकि महिलाएं बिना नक़ाब के थीं, इसलिए केवल शहंशाह जहांगीर या शहज़ादे ही वहां आ सकते थे. शहज़ादे ख़ुर्रम भी वहां आए.

एक दुकान पर उन्होंने एक लड़की को क़ीमती पत्थर और रेशम बेचते हुए देखा. कोमल और नाज़ुक हाथों से वह बहुत ही सुंदर कपड़े को तह लगा रही थी.

एक पल के लिए दोनों की आंखें चार हुईं. ख़ुर्रम का दिल तेज़ी से धड़का. आवाज़ सुनने के लिए पूछा, ये पत्थर कैसा है? पत्थर उठाते हुए लड़की ने तुनक कर कहा, कि "जनाब, ये क़ीमती हीरा है. क्या आपको इसकी चमक से अंदाज़ा नहीं हुआ? इसकी क़ीमत दस हज़ार रुपये है."

जब ख़ुर्रम क़ीमत चुकाने के लिए तैयार हो गए तो लड़की हैरान रह गई. वो बोले, "अब जब इस पर आपका हाथ लगा है, तो यह क़ीमत कुछ भी नहीं."

लड़की ने शर्मा कर नज़रें झुका लीं. ख़ुर्रम ने कहा, "अगली मुलाक़ात तक मैं इसे दिल के पास रखूंगा."

लड़की को एहसास हुआ कि अब यह खेल नहीं रहा. उसने कांपती आवाज़ में पूछा, "और यह (मुलाक़ात) कब होगी?"

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ख़ुर्रम ने फुसफुसाते हुए कहा "जिस दिन हमारे दिल मिलेंगे, और फिर मैं सितारों की तरह चमकते हुए असली हीरे आप पर न्यौछावर करूंगा."

कैरोलीन अर्नोल्ड और मेडेलीन कोमुरा ने अपनी किताब 'ताजमहल' में इस घटना का विवरण लिखते हुए बताया कि यह लड़की अर्जुमंद बानो थी.

उनके दादा मिर्ज़ा ग़यास बेग (जिन्हें एतमाद-उद-दौला यानी 'शासन का स्तंभ' भी कहा जाता है) मुग़ल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान शाही दरबार में शामिल हुए और बाद में (प्रधान) मंत्री बने.

उनकी फूफी महर-उन-निसा ने साल 1611 में बादशाह जहांगीर से शादी की और नूरजहां के नाम से मशहूर हुई.

मुइन-उल-आसार में लिखा है कि पिता और दादा ने अर्जुमंद की सुंदरता, समझ और दूरदर्शिता को देखते हुए उच्च स्तर की शिक्षा दी.

माँ की परवरिश ने इसमें चार चाँद लगा दिए. जब पढ़ाई लिखाई पूरी हुई, तो हर तरफ़ उसकी सुंदरता की चर्चा थी और घर-घर में उनके ज्ञान और विनम्रता का ज़िक्र था.

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'पादशाह नामा' में खुर्रम की शादी का जिक्र

रेणुका नाथ ने अपनी किताब 'नोटेबल मुग़ल एंड हिंदू वुमन इन द सिक्सटींथ एंड सेवेंटींथ सेंचुरीज़ ए.डी.' में लिखा है कि अर्जुमंद ज्ञान के क्षेत्र में आगे थीं और एक प्रतिभाशाली और सभ्य महिला थीं.

वह अरबी और फ़ारसी भाषाओँ में माहिर थी और कविताएँ लिख सकती थी. वाल्डेमर हैनसेन के अनुसार, वह अपनी शिष्टता और अच्छे व्यवहार के लिए मशहूर थीं.

शहंशाह जहांगीर ने उनके बारे में ज़रूर सुना होगा क्योंकि वह अपने बेटे शहाबुद्दीन मोहम्मद ख़ुर्रम के सुझाव पर मंगनी के लिए आसानी से राज़ी हो गए थे.

मासर-उल-अमरा के अनुसार, जहांगीर ने शालीनता और कुलीनता का सम्मान करते हुए अर्जुमंद बानो बेगम से ख़ुर्रम की मंगनी की और रस्म के अनुसार ख़ुद अपने हाथ से अंगूठी पहनाई.

मोहम्मद अमीन कज़वीनी ने 'पादशाह नामा' में लिखा है कि जहांगीर की प्रिय पत्नी नूरजहां ने अपनी भतीजी के साथ शहज़ादा ख़ुर्रम की शादी तय करने में ख़ास दिलचस्पी ली.

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मंगनी और शादी के दरमियां

दरबारी ज्योतिषियों द्वारा शादी के लिए चुनी जाने वाली शुभ तिथि के लिए मंगनी के बाद पांच साल तक इंतज़ार करना पड़ा. साल 1607 में होने वाली मंगनी के बाद साल 1612 में यह शादी ख़ूब शानो शौकत से हुई.

मुइन-उल-आसार में लिखा है कि 'शादी समारोह एतेमाद-उद-दौला मिर्ज़ा ग़यास के घर पर हुआ और उससे जुड़ी सारी रस्में वहीं निभाई गईं. जहांगीर ने ख़ुद दूल्हे की पगड़ी पर मोतियों का हार बांधा और मेहर की रकम 5 लाख रुपये तय की गई. ख़ुर्रम की उम्र बीस साल एक महीने आठ दिन थी और बेगम की उम्र उन्नीस साल और एक दिन थी.'

चंद्रपंत के अनुसार, शहज़ादा ख़ुर्रम ने 'उन्हें उस समय की तमाम महिलाओं में रंग और रूप और चरित्र में सबसे ख़ास क़रार दिया और उन्हें मुमताज़ महल की उपाधि दी.'

उनकी मंगनी और शादी के बीच के वर्षों के दौरान, ख़ुर्रम ने साल 1610 में अपनी पहली पत्नी, शहज़ादी कंधारी बेगम से शादी की, और मुमताज़ से शादी के बाद, साल 1617 में, तीसरी पत्नी, एक मुग़ल दरबारी की बेटी इज्जुन्निसा बेगम (अकबराबादी महल) को बनाया. दरबारी इतिहासकारों के अनुसार, दोनों विवाह एक राजनीतिक गठबंधन थे.

दरबारी इतिहासकार मोतमिद ख़ान 'इक़बालनामा जहांगीरी' में कहते हैं कि जो निकटता, गहरा प्यार और तवज्जो मुमताज़ महल के लिए थी, वो अन्य पत्नियों के लिए नहीं थी.

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शाहजहां की उपाधि

इसी तरह, इतिहासकार इनायत ख़ान ने टिप्पणी की कि "उनकी सारी ख़ुशी इस प्रसिद्ध महिला (मुमताज़ महल) पर केंद्रित थी, इस हद तक कि दूसरी पत्नियों के लिए उस प्यार का एक हज़ारवां हिस्सा भी नहीं था जो मुमताज़ महल के लिए था."

ज़फ़रनामा शाहजहां में लिखा है, कि "साल 1628 में 36 वर्ष की आयु में शहाबुद्दीन मोहम्मद ख़ुर्रम ने शाहजहां की उपाधि धारण की और गद्दी पर बैठे. आसिफ़ ख़ान (प्रधान) मंत्री बने. ख़ुशी मनाई गई. एक करोड़ अस्सी लाख रुपये नक़द व माल के रूप में और चार लाख बीघा ज़मीन और एक सौ बीस गांव दान और ईनाम दिए."

इसी तरह का समारोह मुमताज़ महल ने आयोजित किया और जवाहरात, सोने और चांदी के फूल से शाहजहां की नज़र उतारी.

बादशाह ने दो लाख अशर्फ़ियां और कुछ लाख रुपये मुमताज़ महल को दिए और दस लाख रुपये सालाना वज़ीफ़ा तय किया. और (दूसरी) बेगम साहिबा को एक लाख अशर्फ़ी और चार लाख रुपये दिए गए और छह लाख रुपये सालाना घोषित किए गए. मेहर शाही मुमताज़ महल को सौंप दी गई. बहुत ज़्यादा आय वाली ज़मीने और संपत्तियां दी गईं.

जसवंत लाल मेहता लिखते हैं, कि "शाहजहां ने मुमताज़ को 'पादशाह बेगम' (महिला शहंशाह), 'मलिका-ए-जहां ' (विश्व की रानी) और मलिका-उज़-ज़मा' (ज़माने की रानी) और 'मलिका-ए-हिन्द' (हिंदुस्तान की रानी) की उपाधियां दी. शाहजहां ने उन्हें ऐसी सुख सुविधाएं दीं जो उनसे पहले किसी और मलिका को नहीं दी गईं."

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राजनीतिक सत्ता

उन्हें हज़रत कह कर संबोधित किया जाता था. किसी अन्य मलिका का निवास उतना सजा हुआ नहीं था जितना कि ख़ास महल (आगरा के किले का हिस्सा), जहां मुमताज़ शाहजहां के साथ रहती थी. इसे शुद्ध सोने और क़ीमती पत्थरों से सजाया गया था और इसमें गुलाब जल के फव्वारे थे.

वह हमेशा शाहजहां की विश्वसनीय साथी, विश्वासपात्र और सलाहकार थी. फिर भी उन्होंने अपने लिए राजनीतिक सत्ता नहीं चाही. मलिका के रूप में मुमताज़ महल का दौर, उनकी असामयिक मृत्यु के कारण केवल तीन साल का रहा.

मासर-अल-अमरा के अनुसार, मुमताज़ महल राष्ट्रीय मामलों में भी शाहजहां की सलाहकार थी, लेकिन नूरजहां की तरह, बादशाह को अपने तौर तरीक़े से चलवाने की कोशिश नहीं की थी.

मुमताज़ महल ने अपनी फूफी के कारण बड़ी बड़ी मुश्किलें उठाई, लेकिन शाहजहां को यही सलाह दी कि वह अपनी सौतेली माँ को ख़ुश रखने में कमी न करें.

इसलिए शाहजहां ने नूरजहां की वार्षिक पेंशन 38 लाख रुपये तय की और मान-सम्मान में कोई अंतर नहीं आने दिया. मुमताज़ महल अपनी नैतिकता के लिए ख़ास तौर से मशहूर थी. हर रोज़ सैकड़ों विधवाएं और हज़ारों ग़रीब लोग उनसे फ़ायदा उठाते थे.

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मुमताज़ महल की बेटी जहां आरा

शादी के 19 साल में उनके 14 बच्चे (आठ बेटे और छह बेटियां) पैदा हुए. उनमें से सात की मृत्यु जन्म के समय या बहुत कम उम्र में हो गई. गर्भवती होने के बावजूद, मुमताज़ महल ने अक्सर शाहजहां के साथ उनके प्रारंभिक सैन्य अभियानों में और बाद में उनकी अपने पिता के ख़िलाफ़ बगावत में भी दौरे किए.

अनंत कुमार ने 'मोनोमेंट ऑफ़ लव और सिंबल ऑफ़ मेटरनल डेथ: दि स्टोरी बिहाइंड दि ताजमहल' में लिखा है कि मुमताज़ महल की मौत 17 जून, 1631 को बुरहानपुर में, लगभग 30 घंटे तक चले लेबर पेन के बाद, अपने 14 वें बच्चे को जन्म देते हुए ज़्यादा खून बह जाने की वजह से हुई. उनके पति उस समय दक्कन में सैन्य अभियान पर थे. उनके शव को अस्थायी रूप से बुरहानपुर के एक बग़ीचे में दफ़नाया गया था.

मुमताज़ महल की मौत से शाहजहां को गहरा सदमा पहुंचा था. वेन बेगली का कहना है कि जब शोक के बाद सम्राट शहंशाह बाहर आए, तो उनके बाल सफ़ेद हो गए थे, उनकी पीठ झुकी हुई थी और उनका चेहरा मुरझाया हुआ था.

ऐनी मैरी श्मिल ने 'द ग्रेट मुग़ल एम्पायर: हिस्ट्री, आर्ट एंड कल्चर' में लिखा है कि मुमताज़ महल की सबसे बड़ी बेटी जहांआरा बेगम ने धीरे-धीरे अपने पिता को दुख से बाहर निकाला और दरबार में अपनी मां की जगह ले ली.

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औरंगज़ेब के हाथों में सल्तनत

दिसंबर 1631 में, उनके शव को उनके बेटे शाह शुजा, मलिका की दासी, निजी चिकित्सक और उनकी बेटियों जहांआरा बेगम और गोहरआरा बेगम की शिक्षिका सती-उन-निसा बेगम और सम्मानित दरबारी वज़ीर ख़ान के साथ आगरा लाया गया था.

वहां उन्हें यमुना नदी के किनारे एक छोटी सी इमारत में दफ़नाया गया. जनवरी 1632 में क़ब्र की जगह पर ताजमहल का निर्माण शुरू हुआ.

यह एक ऐसा काम था जिसे पूरा करने में 22 साल लगने थे. अंग्रेज़ी कवि सर एडविन अर्नोल्ड ने इसके बारे में कहा है कि 'यह वास्तुकला का एक टुकड़ा नहीं है, जैसा कि दूसरी इमारतें हैं, बल्कि एक शहंशाह के प्रेम का गौरवपूर्ण अहसास है जो जीवित पत्थरों में उभरता है.'

जाइल्स टिल्टसन के अनुसार, इसकी सुंदरता को मुमताज़ महल की सुंदरता के रूपक के तौर पर भी लिया जाता है और इस संबंध के कारण बहुत से लोग ताजमहल को 'स्त्री या फेमिनिन' कहते हैं.

शाहजहां ताजमहल में व्यस्त थे कि साल 1658 में उनके बेटे औरंगज़ेब ने अपने तीन भाइयों को मार कर, सल्तनत का शासन उनसे छीन लिया और साल 1666 में उनकी मृत्यु तक उन्हें आगरा के क़िले में क़ैद रखा.

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शाहजहां ने अपने जीवन के अंतिम दिन किसी से मिले बिना मुसम्मन बुर्ज से ताजमहल को देखते हुए बिताए.

उनका निधन हुआ तो उन्हें मुमताज़ महल के पास दफ़नाया गया.

ब्रिटिश लेखक रोडयार्ड किपलिंग ने ताजमहल की अपनी पहली यात्रा का वर्णन इस प्रकार किया है: ताज ने सैकड़ों नए रूप धरे. हर एक परिपूर्ण और हर एक विवरण से परे. यह आइवरी गेट था जिसके ज़रिये सभी अच्छे सपने आते हैं.'

बंगाल के कवि रवींद्रनाथ टैगोर भी इसी तरह मोहित हुए थे, 'सिर्फ़ इस एक आंसू के क़तरे को, इस ताजमहल को, वक़्त के गाल पर हमेशा हमेशा के लिए चमकने दो. ये शाहजहां का अपनी महबूब मुमताज़ महल के ग़म में बहाया जाने वाला आंसू है.'

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