Supreme Court EWS Reservation : आरक्षण की संवैधानिकता कैसे तय हुई, जानिए, पिछले 46 महीनों की टाइमलाइन
Supreme Court Economic Criteria Reservation : सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने गरीब 'सवर्णों' को 10 फीसदी आरक्षण को बरकरार रखा है। SC Economic Criteria Reservation timeline
Supreme Court EWS Reservation के पक्ष में है। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस यूयू ललित के अंतिम कार्यदिवस पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, गरीब 'सवर्णों' को 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान बरकरार रहेगा। बता दें कि करीब साढ़े तीन साल पहले 2019 में केंद्र सरकार ने 103वें संविधान संशोधन के तहत सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में तीन न्यायाधीश आरक्षण को बरकरार रखने के पक्ष में रहे, जबकि दो न्यायाधीशों ने इस पर असहमति जताई। वनइंडिया हिंदी की इस रिपोर्ट में जानिए, आर्थिक आधार पर आरक्षण मामले में गत साढ़े तीन साल से भी अधिक समय (लगभग 46 महीने) में क्या-क्या हुआ।
एक नजर आर्थिक आधार पर आरक्षण (EWS Reservation) का फैसला और गत 46 महीनों के प्रमुख पड़ावों पर-

आर्थिक आधार पर आरक्षण : कहां से हुई शुरुआत
9 जनवरी 2019 को, भारत की संसद में 103वां संविधान संशोधन हुआ। इसके बाद सरकार को केवल आर्थिक मानदंडों के आधार पर उच्च शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार के मामलों में आरक्षण के प्रावधान का अधिकार मिला। अधिनियम से संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन हुआ। 15(6) और 16(6) को सम्मिलित किया गया। 12 जनवरी 2019 को राष्ट्रपति की सहमति के बाद गजट नोटिफिकेशन हो गया और देशभर में आर्थिक आधार पर आरक्षण का रास्ता साफ हो गया। इस समय देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद थे।

सरकारों को मिला विशेष अधिकार
इस संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 15(6) के तहत सरकार शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण सहित नागरिकों के किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने में सक्षम बन गई।

EWS Reservation पहले से मिलने वाले आरक्षण से अलग !
प्रावधानों में कहा गया है कि इस तरह के आरक्षण किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किए जा सकते हैं। इसमें सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त दोनों और निजी संस्थान भी शामिल हैं। अनुच्छेद 30 (1) के तहत आने वाले अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को इससे बाहर रखा गया है। प्रावधानों में कहा गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) वर्ग को आरक्षण की ऊपरी सीमा 10% होगी। इसका मतलब 10% तक सीटें EWS श्रेणी में आने वाले नागरिकों के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। यह 10% की सीमा मौजूदा आरक्षणों की सीमा से अलग है।
नौकरी में भी आरक्षण !
अनुच्छेद 16(6) सरकार को नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान करने में सक्षम बनाता है। ये प्रावधान भी मौजूदा आरक्षणों के अतिरिक्त है।

EWS Reservation के खिलाफ SC में 40 याचिकाएं !
103वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। करीब 40 याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर की रिपोर्ट के मुताबिक संशोधन का विरोध कर रहे लोगों का तर्क था कि संशोधन संविधान की मूल भावना का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 14 के तहत समानता के मौलिक अधिकार के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया।

विरोध में कई तर्क दिए गए जिनमें प्रमुख हैं-
- इंद्रा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस (1992) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए आरक्षण केवल आर्थिक मानदंडों पर आधारित नहीं हो सकता है।
- एससी/एसटी और ओबीसी को आर्थिक आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
- 103वें संविधान संशोधन से इंद्रा साहनी केस में स्थापित नियम, जिसमें कहा गया कि आरक्षण 50% सीमा से अधिक नहीं होगा, इसका उल्लंघन होता है।
- सरकारी सहायता प्राप्त नहीं करने वाले शैक्षणिक संस्थानों पर आरक्षण लागू करना समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

आरक्षण का वर्तमान नियम क्या है ?
वर्तमान में, केंद्र सरकार के कानूनों के तहत शिक्षा और सार्वजनिक नियुक्तियों में 49.5% सीटें आरक्षित हैं। इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रमशः 15%, 7.5% और 27% कोटा है।

20 महीने बाद SC की संविधान पीठ में पहुंचा केस
सामान्य आरक्षण से अलग साल 2019 में ही EWS Reservation का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था, लेकिन पांच दिनों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संविधान पीठ को सौंपने के मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। 5 अगस्त 2020 को कोर्ट ने इस मामले को पांच जजों की बेंच को रेफर करने का फैसला किया।

EWS आरक्षण मामले की सुनवाई कब
30 अगस्त, 2022 को, सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर के पहले सप्ताह से EWS Reservation वाले मामले में सुनवाई का फैसला लिया। CJI उदय उमेश ललित के नेतृत्व में 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण प्रदान करने वाले 2005 के अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका के साथ-साथ इस मामले की भी सुनवाई की जाएगी। एससी ऑब्जर्वर की रिपोर्ट के मुताबिक 6 सितंबर को CJI की बेंच ने कहा, कोर्ट तय करेगी कि पहले EWS आरक्षण मामले की सुनवाई कब की जाए ?

कोर्ट के समक्ष तीन प्रमुख सवाल
8 सितंबर को सीजेआई यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल की दलीलों के आधार पर तय किया कि वे किन बिंदुओं पर सुनवाई करेंगे। कोर्ट के समक्ष तीन प्रमुख सवाल थे-
- क्या आरक्षण केवल आर्थिक मानदंडों के आधार पर दिया जा सकता है?
- क्या संविधान संशोधन के मुताबिक सरकार निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान कर सकती है, भले ही इन संस्थाओं को सरकारी सहायता न मिलती हो ?
- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को EWS रिजर्वेशन के दायरे से बाहर रखने के कारण क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण अमान्य और असंवैधानिक माना जाएगा ?

आर्थिक आधार पर आरक्षण का रास्ता साफ, लेकिन...
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 27 सितंबर, 2022 को संविधान पीठ ने कहा, Supreme Court EWS Reservation मामले में फैसला सुरक्षित रखती है। सीजेआई यूयू ललित की रिटायरमेंट के मौके पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने ऐतिहासिल निर्णय सुनाया। इसके बाद आर्थिक आधार पर आरक्षण का रास्ता साफ हुआ। हालांकि, खुद चीफ जस्टिस इस आरक्षण से असहमत हैं।

रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
Supreme Court Upper Cast Reservation को निरस्त करने के पक्ष में नहीं है। चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ में 3:2 के बहुमत से फैसला हुआ। पीठ ने आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन को संवैधानिक और वैध करार दिया। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा, रिजर्वेशन संवैधानिक है और ये बरकरार रहेगा। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है। न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी का कहना है, उनका फैसला न्यायमूर्ति माहेश्वरी के साथ सहमति में है और उन्होंने कहा कि सामान्य वर्ग में ईडब्ल्यूएस कोटा वैध और संवैधानिक है। सामान्य वर्ग के गरीबों को फायदा होगा। समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।

आरक्षण से असहमत CJI यूयू ललित
सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस एस रवींद्र भट ने तीन जजों से असहमति जताई। जस्टिस एस रवींद्र भट ने कहा है कि 103वां संशोधन भेदभाव पूर्ण है, इसलिए मैं असहमत हूं। जस्टिस रवींद्र भट ने कहा कि 10 फीसदी आरक्षण में एससी/एसटी/ ओबीसी को अलग करना भेदभावपूर्ण है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। आर्थिक आधार पर आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 40 याचिकाएं दायर की गई थीं।
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