Coronavirus के चलते मुश्किल में यौनकर्मी, SC ने राशन और कैश उपलब्ध कराने के लिए दिया निर्देश

नई दिल्ली। कोविड-19 महामारी के चलते यौनकर्मियों के सामने आई मुश्किलों के मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सरकार यौन कर्मियों को पहचान पत्र पर जोर दिए बिना राशन और नकद राशि देने के बारे में जानकारी दें।

Supreme Court

एक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एन नागेश्वर राव और हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि इस मामले पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। इसके साथ ही बेंच ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल आरएस सूरी और राज्य की ओर से पेश वकील को यौनकर्मियों को बिना पहचान पत्र पर जोर दिए शीघ्र ही राशन और नकद हस्तांतरण के तरीके के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

96% यौनकर्मियों की कमाई छिनी
एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और तेलंगाना में 1.2 लाख यौन कर्मियों पर किए गए सर्वे में जानकारी सामने आई है कि कोरोना महामारी के चलते 96 प्रतिशत यौनकर्मियों के पास जीविका के लिए कमाई का कोई साधन नहीं है।

मामले में कोर्ट की सहायता के लिए कोर्ट मित्र बनाए गए वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने कहा कि यौनकर्मियों की दुर्दशा को हल किया जा सकता है। अगर उन्हें बिना पहचान पत्र पर जोर दिए राशन और नकद राशि मुहैया कराई जाये।

देश में 9 लाख से अधिक यौनकर्मी
शीर्ष अदालत दरबार महिला समन्मय समिति द्वारा दायर उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें एनजीओ ने कोरोना वायरस ( ) के चलते यौनकर्मियों के सामने आई आपात स्थिति को उजागर करने के लिए कोर्ट का रुख किया था। एनजीओ द्वारा देश भर में 9 लाख महिला और ट्रांसजेंडर समुदाय के यौनकर्मियों के लिए राहत के उपाय की मांग की गई थी।

एनजीओ ने शीर्ष कोर्ट से कहा कि "यौनकर्मियों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीने का अधिकार है क्योंकि वे भी इंसान हैं और उनकी समस्याओं पर ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन यौनकर्मियों को सामाजिक कलंक के कारण COVID-19 जैसी महामारी के दौर में हाशिए पर छोड़ दिया गया है। ऐसे में उन्हें समर्थन की आवश्यकता है।'

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